मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और चुनाव आयोग के विशेष गहन संशोधन (SIR) प्रक्रिया को लेकर एक तरफ जहां देश भर में विपक्ष की ओर से विरोध प्रदर्शन तेज हो रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ विपक्षी खेमे में नेतृत्व और श्रेय को लेकर एक नया टकराव देखने को मिल रहा है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा पूरे देश के जन-आंदोलनों और नागरिक आवाजों को एकजुट करने के लिए शुरू किए गए 'सत्याग्रह' प्लेटफॉर्म के बाद, युवाओं के तेजी से उभरते संगठन कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने खुला मोर्चा खोल दिया है। CJP ने खुद को स्वघोषित 'उदारवादी और विपक्षी इकोसिस्टम' से दूर बताते हुए इस पर तीखा प्रहार किया है। यह विवाद महज दो संगठनों के बीच का नहीं है, बल्कि इस बात का संकेत है कि सीजेपी राजनीतिक दलों के झंडे तले आने को तैयार नहीं है और अपना खुद का वजूद बनाया चाहता है। क्या ये वर्चस्व की जंग है, इसे समझने की कोशिश करते हैं।
क्या है राहुल गांधी का 'सत्याग्रह' अभियान?
गांधी जयंती के मौके पर राहुल गांधी ने एक डिजिटल प्लेटफॉर्म और अभियान 'सत्याग्रह' लॉन्च किया था। राहुल गांधी की रणनीति देश भर में अलग-अलग मुद्दों (NEET पेपर लीक, बेरोजगारी, चुनाव आयोग का SIR विवाद, किसान आंदोलन) पर अलग-थलग लड़ रहे छात्र, युवा और नागरिक समूहों को एक साझा राजनीतिक मंच पर लाने की है। राहुल गांधी ने कहा कि बापू का रास्ता सच और अहिंसा का था। उन्होंने कहा, जो भी अकेले अन्याय के खिलाफ लड़ रहे हैं, वे अपनी कहानी इस प्लेटफॉर्म पर भेजें—नेता प्रतिपक्ष के रूप में मैं संसद से लेकर सड़क तक आपके साथ खड़ा रहूंगा।
CJP की खरी-खरी, 'नो पॉलिटिक्स'
राहुल गांधी की इस पहल और कांग्रेस के युवा संगठन (IYC) द्वारा समानांतर अभियान शुरू करने पर CJP के नेताओं अभिजीत दीपके, सौरभ दास और आशुतोष रांका ने कड़ा रुख अपनाया। CJP ने विपक्षी नेताओं और लिबरल इकोसिस्टम पर हमला बोलते हुए कहा कि ये लोग खुद को संविधान और लोकतंत्र की रक्षा का अकेला ठेकेदार समझते हैं। CJP संस्थापकों ने आरोप लगाया कि स्थापित राजनीतिक दल (विशेषकर कांग्रेस और उसके सहयोगी) जनता के असली मुद्दों से ज्यादा अपनी प्रमुखता और राजनीतिक श्रेय चमकाने में लगे रहते हैं। CJP नेताओं ने कटाक्ष करते हुए कहा कि विपक्षी दलों की लगातार नाकामियों के कारण ही आज युवाओं को सड़कों पर उतरना पड़ा है। इसलिए अब राजनीतिक दल उन्हें ज्ञान देने के बजाय उनके आंदोलन में एक समर्थक के रूप में पीछे खड़े हों, न कि उसे हाइजैक करने की कोशिश करें।
आशुतोष रांका और सौरभ दास ने कसा तंज
सीजेपी के नेताओं आशुतोष रांका और सौरभ दास ने "स्व-घोषित उदारवादी तंत्र" पर अभिजीत दीपके की निंदा करने और लोकतंत्र व संविधान के ठेकेदार की रक्षा करने का दिखावा करने का आरोप लगाया। रांका और दास दोनों ने ही कांग्रेस का नाम नहीं लिया, लेकिन दास ने भाजपा के अलावा 'किसी अन्य पार्टी' का स्पष्ट रूप से जिक्र किया, और कई कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं ने इन टिप्पणियों को अपने लिए कटाक्ष माना। सीजेपी और कांग्रेस नेताओं के बीच तीखी बहस से पता चलता है कि भाजपा सरकार और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को निशाना बनाने वाले विरोध प्रदर्शनों में किसे नाम, श्रेय और नेतृत्व मिलेगा, इस बात को लेकर मतभेद है। कांग्रेस और सीजेपी दोनों जिन मुद्दों को उठा रहे हैं, वे एक ही हैं।
असम में अभियान के दौरान दिखी तल्खी
दरअसल, यह टकराव राहुल गांधी द्वारा सत्याग्रह प्लेटफॉर्म लॉन्च करने से शुरू नहीं हुआ था। यह असम में सीजेपी के स्कूल ऑडिट अभियान के दौरान और भी स्पष्ट रूप से सामने आया। सीजेपी के सह-संयोजक आशुतोष रांका और 40 से अधिक स्वयंसेवकों को गुवाहाटी में एक बैठक से पहले हिरासत में लिया गया था। तब कांग्रेस प्रवक्ता रीतम सिंह ने कहा कि कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने उनकी रिहाई सुनिश्चित करने में मदद की। सिंह ने आरोप लगाया कि रांका ने फिर भी असम कांग्रेस अध्यक्ष गौरव गोगोई से मिलने से इनकार कर दिया क्योंकि सीजेपी को बताया गया था कि यह अभियान आम आदमी पार्टी की पहल है। रांका ने 3 अक्टूबर को X पर पोस्ट किया, 'एक पूरा 'स्व-घोषित उदारवादी' तंत्र अभिजीत दीपके की निंदा करने में सक्रिय हो गया, यह जानते हुए भी कि दीपके बहुत लंबे समय बाद लाखों भारतीयों का ध्यान मुद्दों पर आकर्षित करने में सक्षम हुए हैं। उन्होंने कांग्रेस का नाम लिए बिना यह पोस्ट किया।
कांग्रेस और CJP के बीच 'वर्चस्व की जंग'!
एक तरफ राहुल गांधी देश भर के सभी जन-आंदोलनों को अपने साथ जोड़कर एक बड़ा साझा चेहरा बनना चाहते हैं। वहीं दूसरी तरफ, CJP किसी भी राजनीतिक दल के चेहरे या झंडे के नीचे काम करने से साफ मना कर रही है। कांग्रेस और विपक्षी दल संसद और अपनी पार्टी के बैनर तले विरोध प्रदर्शन करने पर विश्वास रखते हैं। इसके विपरीत, CJP इसे पूरी तरह से आम नागरिकों का गैर-राजनीतिक और सड़क का आंदोलन बनाकर रखना चाहती है। विपक्षी गठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते कांग्रेस खुद को आंदोलन का स्वभाविक नेता मानती है। वहीं, CJP का आरोप है कि बड़ी राजनीतिक पार्टियां युवाओं के जमीनी संघर्ष का इस्तेमाल सिर्फ अपना राजनीतिक फायदा उठाने और क्रेडिट लेने के लिए करती हैं।
विपक्षी एकजुटता पर उठता बड़ा सवाल
यह रस्साकशी दिखाती है कि केंद्र सरकार और चुनाव आयोग के खिलाफ जारी इस बड़े आंदोलन में दो अलग-अलग धाराएं काम कर रही हैं। संसदीय विपक्ष (INDIA ब्लॉक) के दल कांग्रेस, टीएमसी और अन्य पार्टियां 6 अक्टूबर यानी आज संसद सदस्यों के साथ चुनाव आयोग का घेराव करने निकले हैं और 1 नवंबर को दिल्ली में बड़ी रैली की तैयारी कर रहे हैं। वहीं, स्वतंत्र नागरिक आंदोलन CJP के नेता मुंबई के शिवाजी पार्क से शुरू होकर 10 अक्टूबर को दिल्ली के जंतर-मंतर पर 'जंतर-मंतर 2.0' का आह्वान कर चुके हैं और ये युवा संगठन किसी भी राजनीतिक पार्टी के साथ मंच साझा करने से बच रहा है।
कुल मिलाकर राहुल गांधी का 'सत्याग्रह' अभियान जहां बिखरे हुए जनाक्रोश को एक संगठित राजनीतिक ताकत में बदलने का प्रयास है, वहीं CJP का पलटवार इस बात की चेतावनी है कि आज का युवा और नागरिक समाज किसी भी राजनीतिक दल की बी-टीम बनने या अपना श्रेय गंवाने को तैयार नहीं है। यह देखना दिलचस्प होगा कि 10 अक्टूबर के जंतर-मंतर प्रदर्शन और विपक्षी दलों के आंदोलनों के बीच यह वर्चस्व की जंग आगे क्या मोड़ लेती है।