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न हरदीप पुरी को मिला राज्यसभा का टिकट न BL वर्मा हुए रिपीट, BJP ने क्यों बदली पूरी टीम, भगवा पार्टी का क्या है 2027 का प्लान?

राज्यसभा चुनाव को लेकर भाजपा ने उत्तर प्रदेश में अपने उम्मीदवारों की सूची जारी कर बड़ा सियासी संकेत दिया है। पार्टी ने राज्य से आठ प्रत्याशियों के नाम घोषित किए हैं, लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें एक भी मौजूदा राज्यसभा सांसद को दोबारा मौका नहीं दिया गया है। केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी और बीएल वर्मा समेत पार्टी के कई मौजूदा सांसद इस बार टिकट की दौड़ से बाहर हो गए हैं।

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राज्यसभा चुनाव भाजपा की लिस्ट में कई सियासी संदेश। (फोटो- AI)
Authored by: शिव शुक्ला
Updated Oct 5, 2026, 18:30 IST
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उत्तर प्रदेश में राज्यसभा चुनाव के लिए भाजपा ने अपने आठ उम्मीदवारों के नाम घोषित कर दिए हैं। लेकिन इस सूची ने उम्मीदवारों से ज्यादा उन चेहरों को लेकर चर्चा पैदा की है, जिन्हें दोबारा मौका नहीं मिला। केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी, बीएल वर्मा, अरुण सिंह, सीमा द्विवेदी, नीरज शेखर, बृजलाल और गीता शाक्य जैसे मौजूदा या पूर्व राज्यसभा चेहरों की जगह भाजपा ने नए नामों पर भरोसा जताया है।

सबसे खास बात यह है कि उत्तर प्रदेश से राज्यसभा की जिन आठ सीटों पर भाजपा की जीत लगभग तय मानी जा रही है, पार्टी ने उनमें से किसी सीट पर मौजूदा सांसद को रिपीट नहीं किया। ऐसे में सवाल उठता है कि हरदीप पुरी समेत पुराने वरिष्ठ नेताओं को टिकट क्यों नहीं दिया गया और इस पूरी कवायद का 2027 के विधानसभा चुनाव से क्या संबंध है?

भाजपा ने किन लोगों को बनाया उम्मीदवार

भाजपा की ओर से घोषित नामों में धर्मपाल सिंह, राधाकांत ओझा, प्रकाश पाल, विद्यासागर सोनकर, गोपी कृष्ण पांडेय, प्रियंका सिंह रावत, राम प्रताप सिंह चौहान और श्रुति गंगवार शामिल हैं।

किसके कटे नाम

इस बार भाजपा ने यूपी की राज्यसभा सीटों को प्रदेश की राजनीतिक जरूरतों के हिसाब से इस्तेमाल करने का फैसला किया है। भाजपा ने बीएल वर्मा, अरुण सिंह, सीमा द्विवेदी, नीरज शेखर, बृजलाल और गीता शाक्य को भी दोबारा उम्मीदवार नहीं बनाया है। इन नामों को देखें तो भारतीय जनता पार्टी ने एक-दो सीटों पर बदलाव नहीं किया, बल्कि पूरी आठ सीटों पर नए चेहरों को उतारा है। भारतीय जनता पार्टी ने इस बार प्रदेश संगठन और सामाजिक समीकरण को ध्यान में रखते हुए नई टीम तैयार करने की कोशिश की है।

किन वर्गों को खासा प्रतिनिधित्व

ओबीसी उम्मीदवारों में लोधी, पाल और कुर्मी समुदायों का प्रतिनिधित्व है। वहीं सवर्ण वर्ग से दो ब्राह्मण और एक राजपूत चेहरा शामिल है।इससे संकेत मिलता है कि भाजपा राज्यसभा के जरिए भी प्रदेश के अलग-अलग सामाजिक समूहों तक राजनीतिक संदेश पहुंचाना चाहती है।

संगठन के नेताओं को क्यों आगे किया?

इस सूची की दूसरी बड़ी खासियत है कि कई उम्मीदवार सीधे भाजपा संगठन से जुड़े हुए हैं। इनमें प्रकाश पाल उत्तर प्रदेश भाजपा के ओबीसी मोर्चा के अध्यक्ष हैं। वहीं, राम प्रताप सिंह चौहान प्रदेश महामंत्री और पश्चिमी यूपी के क्षेत्रीय प्रभारी हैं। इसी तहर गोपी कृष्ण पांडेय लंबे समय से पार्टी के संगठनात्मक काम में सक्रिय हैं और विद्यासागर सोनकर भी संगठन और प्रदेश की राजनीति में लंबा अनुभव रखते हैं।

दो महिला चेहरों पर भी दांव

भाजपा की सूची में दो महिला उम्मीदवार भी हैं- प्रियंका सिंह रावत और श्रुति गंगवार। प्रियंका सिंह रावत बाराबंकी से पूर्व लोकसभा सांसद रह चुकी हैं। उन्होंने 2014 में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पीएल पुनिया को हराया था।

वहीं श्रुति गंगवार बरेली क्षेत्र में सक्रिय हैं और अर्बन को-ऑपरेटिव बैंक की अध्यक्ष हैं। वह झारखंड के राज्यपाल संतोष गंगवार की बेटी हैं। महिला प्रतिनिधित्व के साथ-साथ क्षेत्रीय प्रभाव को भी सूची में जगह दी गई है।

हरदीप पुरी,बीएल वर्मा का टिकट कटना क्यों अहम?

हरदीप सिंह पुरी केंद्र सरकार में वरिष्ठ मंत्री हैं और लंबे समय से राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय हैं। इसके बावजूद भाजपा की यूपी राज्यसभा सूची में उनका नाम नहीं है। वहीं, हरदीप पुरी के साथ ही बीएल वर्मा को भी राज्यसभा के लिए दोबारा उम्मीदवार नहीं बनाया गया है। बीएल वर्मा को 2020 में यूपी से ही उच्च सदन में भेजा गया था। वर्तमान में वे उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय तथा सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय में केंद्रीय राज्यमंत्री (MoS) हैं।

केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल इन दोनों शख्सियतों को टिकट न मिलने के बाद चर्चा शुरू हो गई है कि राज्यसभा से जाने के बाद हरदीप पुरी और बीएल वर्मा मोदी कैबिनेट से भी बाहर हो सकते हैं। हालांकि संभव है कि भाजपा उन्हें संगठन में या फिर किसी राज्य में बड़ी जिम्मेदारी भी दे सकती है।

भाजपा के लिए ऐसा है राज्यसभा का गणित

उत्तर प्रदेश में राज्यसभा की 10 सीटों के लिए 16 अक्टूबर को मतदान होना है। उत्तर प्रदेश विधानसभा की मौजूदा प्रभावी संख्या 397 है। जिसमें छह सीटें खाली हैं। ऐसे में 10 राज्यसभा सीटों के लिए चुनाव होने के कारण हर उम्मीदवार को जीत के लिए 37 प्रथम वरीयता वोटों की जरूरत होगी। ऐसे में पार्टियों के पास मौजूद कुल विधायकों के अलावा बचे हुए वोट सबसे महत्वपूर्ण हो जाते हैं। इसे ऐसे समझना होगा मान लीजिए कि किसी गठबंधन के पास 74 वोट हैं तो वह दो उम्मीदवारों को तो आसानी से जिता सकता है, लेकिन उसके बाद बचे वोट तीसरे उम्मीदवार के लिए पर्याप्त हैं या नहीं, ये बड़ा सवाल होगा।

यूपी विधानसभा में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले एनडीए के पास 289 विधायक हैं। इसमें बीजेपी के 256, अपना दल (एस) के 13, निषाद पार्टी के पांच, आरएलडी के नौ और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के छह विधायक शामिल हैं। इन आंकड़ों के आधार पर एनडीए सात उम्मीदवारों को जिताने की स्थिति में है। सात सीटों के लिए 259 वोट चाहिए, यानी उसके पास 30 वोट अतिरिक्त बचते हैं। आठवीं सीट के लिए उसे सात और वोटों की जरूरत होगी।

हालांकि,अगर जनसत्ता दल लोकतांत्रिक के दो और तीन निर्दलीय विधायकों का समर्थन भी एनडीए को मिलता है तो उसका आंकड़ा 294 तक पहुंच सकता है। ऐसी स्थिति में सात सीटों के बाद 35 वोट बचेंगे और आठवीं सीट के लिए सिर्फ दो अतिरिक्त वोटों की जरूरत रह जाएगी। ऐसे में क्रॉस वोटिंग भी देखने को मिल सकती है।

क्या 2027 में जातीय समीकरण सबसे बड़ा फैक्टर होगा?

उत्तर प्रदेश की राजनीति में जातीय समीकरण हमेशा महत्वपूर्ण रहे हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह रही है कि वह अपने पारंपरिक सामाजिक आधार को बनाए रखते हुए ओबीसी और दलित वोटरों के बीच अपनी पकड़ मजबूत करे। ओबीसी के तीन चेहरे और दलित समुदाय से दो उम्मीदवार भाजपा की उस कोशिश की ओर इशारा करते हैं, जिसमें वह 2027 से पहले सामाजिक समीकरण को और मजबूत करना चाहती है।

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