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'एक्शन मोड' में आया मक्का समझौता, सऊदी अरब की कैसे सुरक्षा करेंगे तुर्किये-पाकिस्तान? कहां फंस सकता है पेच

मक्का पैक्ट पर 7 अगस्त 2026 को हस्ताक्षर हुए। इस पर हस्ताक्षर होने बाद यह पहली बार है जब इस समझौता को लागू किया गया है। यह समझौता कहता है कि इसमें शामिल किसी एक देश पर भी हमला होता है तो इसे तीनों देशों पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये पर हमला माना जाएगा।

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मक्का पैक्ट में शामिल हैं सऊदी अरब, पाकिस्तान, तुर्किये। तस्वीर-AI
Written by: आलोक कुमार राव
Updated Oct 6, 2026, 14:37 IST
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Mecca Pact Activated: सऊदी अरब पर हूतियों के हमलों के बाद लगातार 'मक्का पैक्ट' लागू किए जाने के बारे में सवाल पूछे जा रहे थे। पूछा जा रहा था NATO के आर्टिकल 5 की तर्ज पर जब यह समझौता हुआ है तो इसे 'एक्टिव' क्यों नहीं किया जा रहा? अब इसका जवाब मिल गया है। पांच अक्टूबर को सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये इसे लागू करने पर सहमत हो गए। रियाद में तीनों देशों की हुई आपात बैठक में इसे लागू करने पर निर्णय हुआ। सऊदी अरब की सुरक्षा के लिए तुर्किये और पाकिस्तान ने अपने सैनिक रियाद भेजने का फैसला किया है। यहां इस बात का जिक्र करना जरूरी है कि पाकिस्तान के रक्षा उपकरण, वायु रक्षा प्रणाली, फाइटर जेट एवं सैनिक पहले से ही सऊदी अरब में मौजूद हैं। कुछ रिपोर्टों में कहा गया है कि पाकिस्तानी सैनिकों को यमन में तैनात किया गया है। मक्का पैक्ट लागू करने का फैसला ऐसे समय हुआ है जब पवित्र शहर मक्का-मदीना सहित सऊदी अरब के कई शहरों को निशाना बनाकर हूतियों द्वारा हमले किए जाने की रिपोर्टें आई हैं।

मक्का-मदीना सहित कई शहरों पर हूतियों के हमले

सऊदी अरब के विदेश मंत्रालय ने हूती विद्रोहियों पर मक्का-मदीना जैसे पवित्र स्थलों, राजधानी रियाद और अबहा, खमिस मुशैत, जिजान, नजरान, ताइफ और यानबू जैसे शहरों को निशाना बनाने का आरोप लगाया है। मंत्रालय का आरोप है कि दक्षिणी लाल सागर और बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य में सऊदी जहाजों को भी निशाना बनाया गया है। मंत्रालय ने राज्य में नागरिकों तथा नागरिक एवं आर्थिक प्रतिष्ठानों को लगातार निशाना बनाए जाने की कड़ी निंदा की है। मंत्रालय ने इसे आतंकवादी हमला बताया है। सऊदी ने कहा है कि वह अपने नागरिकों एवं प्रतिष्ठानों की सुरक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाएगा। इस बीच, यमन की गठबंधन सेना जिसे सऊदी अरब का समर्थन प्राप्त है, उसने हूतियों के ठिकानों पर हमले किए हैं। रिपोर्टों में कहा गया है कि गठबंधन सेना ने बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य के आसपास के कई महत्वपूर्ण इलाकों को फिर से अपने नियंत्रण में कर लिया है। अधिकारियों ने बताया कि उन्होंने बाब और हदीद शहरों को भी अपने नियंत्रण में ले लिया है।

7 अगस्त 2026 को हुए मक्का पैक्ट पर हस्ताक्षर

जाहिर है कि हूतियों पर हमले तेज हो गए हैं। एक्सपर्ट की राय है कि चारों तरफ से हमला कर हूतियों को एक विशेष इलाके में समेटना होगा, तब जाकर बाब अल मंदेब सुरक्षित हो पाएगा। मक्का पैक्ट पर 7 अगस्त 2026 को हस्ताक्षर हुए। इस पर हस्ताक्षर होने बाद यह पहली बार है जब इस समझौता को लागू किया गया है। यह समझौता कहता है कि इसमें शामिल किसी एक देश पर भी हमला होता है तो इसे तीनों देशों पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये पर हमला माना जाएगा और इस हमले का जवाब ये तीनों देश मिलकर देंगे। यह फैसला अचानक नहीं आया। मक्का समझौते का मूल सिद्धांत यही है। फिर भी सितंबर में हूती मिसाइल हमलों के बाद भी गठबंधन निष्क्रिय रहा, क्योंकि तुर्किये और पाकिस्तान क्षेत्रीय युद्ध में मध्यस्थ की अपनी भूमिका बचाए रखना चाहते थे।

mecca pact

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सऊदी की सुरक्षा कैसे होगी?

संयुक्त बयान में तैनाती का कोई ब्योरा नहीं है। पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के मुताबिक तीनों देश 'तय सैन्य बल और क्षमताएं' देंगे, जो 'स्वीकृत व्यवस्थाओं' और हर देश के अपने कानूनों के दायरे में होंगी। इसलिए अभी तस्वीर अनुमानों पर टिकी है। सऊदी अरब में पाकिस्तानी सेना की मौजूदगी पहले से है। उसके करीब 16 JF-17 विमानों का एक स्क्वाड्रन, रक्षा प्रणालियां और हजारों सैनिक सऊदी में तैनात बताए जाते हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार यह संख्या 8,000 से 13,000 के बीच है। एक रिपोर्ट में 25,000 सैनिकों के विस्तार की बात आई है। तुर्किये की ताकत उसके हथियारों और तकनीक में है। विश्लेषकों के मुताबिक तुर्किये यमन के भीतर लड़े बिना वह सऊदी की मिसाइल-इंटरसेप्शन, बुनियादी ढांचे और समुद्री मार्गों की सुरक्षा क्षमता बढ़ा सकता है। तुर्किये सऊदी को अपने ड्रोन भी दे सकता है। जमीनी मोर्चे पर यमन सरकार समर्थित सेनाओं का जवाबी हमला जारी है। सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने 100 लड़ाकू विमानों से हवाई हमले की पुष्टि की है, जबकि हूतियों ने रियाद हवाई अड्डे और रबीग रिफाइनरी पर हमले का दावा किया है, जिसकी रियाद ने पुष्टि नहीं की।

कहां अटक सकता है पेच?

पाकिस्तान और तुर्किये ईरान युद्ध में मध्यस्थता का रोल निभा रहे हैं। जैसे ही वे हूतियों के खिलाफ तैनात होंगे, ईरान उन्हें निष्पक्ष नहीं मानेगा। एक विश्लेषण में पूछा गया कि क्या सैनिक सऊदी से सीमा-पार हमलों में भी हिस्सा लेंगे, और यह सवाल अनुत्तरित रहा। यही रेखा सबसे नाज़ुक है। सितंबर के मध्य तक की रिपोर्टों में तुर्किये की संसदीय मंजूरी में देरी और साझा रक्षा योजनाओं के अंतिम न होने को बड़ी बाधा बताया गया था। पाकिस्तान को भी अपनी आंतरिक मंजूरी प्रक्रिया पूरी करनी थी, जबकि सऊदी शाही फरमान से मंजूरी दे सकता है। बयान में अपने कानूनों के अनुसार की शर्त इसी ओर इशारा करती है। ताजा स्थिति की पुष्टि अभी बाकी है। आलोचकों का तर्क है कि सऊदी ने मक्का समझौता लागू करने से पहले वॉशिंगटन का रुख किया। एक विश्लेषण के मुताबिक मक्का समझौते के पास मज़बूत पाठ है, पर उसे लागू करने वाला ढाँचा नहीं, जबकि अमेरिकी समझौते के पास ढाँचा है पर स्पष्ट पाठ नहीं। यानी साझा कमान, खुफ़िया साझेदारी और हथियार एकीकरण अभी बनने बाक़ी हैं।

हालात पर सतर्क निगरानी की जरूरत

पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय ने पहले इसे 'रक्षात्मक गठबंधन' बताते हुए तत्काल विस्तार से इनकार किया था, जबकि रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने अलग रुख दिखाया था। इस्लामाबाद की आर्थिक मजबूरियां और अंदरूनी राजनीति इस असमंजस को बढ़ाती हैं। हूती हमले पहले से ईरान की व्यापक लड़ाई से जुड़े हैं। बाब अल-मंदेब पर नियंत्रण की लड़ाई वैश्विक व्यापार को भी प्रभावित कर सकती है। भारत की नजर तीन बातों पर रहनी चाहिए। पहला, सऊदी में पाकिस्तानी सेना की बढ़ती भूमिका उसे खाड़ी में रणनीतिक वजन देती है। दूसरा, इयान ब्रेमर जैसे विश्लेषक पहले ही कह चुके हैं कि ऐसा समझौता भारत की सुरक्षा गणना बदल सकता है। खासकर अगर सऊदी भविष्य में पाकिस्तान के बचाव में आने को बाध्य हो। तीसरा, भारत के सऊदी अरब से भी गहरे रिश्ते हैं। समझौते पर भारत ने कहा था कि वह अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता पर इसके असर का अध्ययन करेगा। खाड़ी में रहने वाले लाखों भारतीयों और तेल आपूर्ति के लिहाज से भी यह स्थिति संवेदनशील है। फिलहाल घबराने की नहीं, सतर्क निगरानी की जरूरत है।

munir

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हूतियों से सीधे टकराव से बचना चाहेंगे PAK-तुर्किये

मक्का समझौता कागज से मैदान में उतर चुका है, पर इसकी असली कसौटी सैनिकों की संख्या नहीं होगी। असली सवाल यह है कि क्या यह गठबंधन सऊदी को भरोसेमंद सुरक्षा दे पाता है और साथ ही पाकिस्तान-तुर्किये को ईरान के साथ सीधे टकराव से बचाए रखता है। अगर तैनाती सीमित, रक्षात्मक और कूटनीति के साथ चली तो यह निवारक बन सकता है। अगर मोर्चा यमन के भीतर खिंचा, तो यही समझौता तीनों देशों को लंबी लड़ाई में खींच सकता है। इससे पाकिस्तान और तुर्किये दोनों बचना चाहेंगे। ज्यादा समस्या पाकिस्तान के लिए क्योंकि हूतियों के पास ड्रोन और मिसाइलें हैं जिनसे वे कराची या अन्य शहरों पर हमला कर सकते हैं। हूतियों के खिलाफ कार्रवाई पर पाकिस्तान में भी विरोध और बगावत हो सकता है। पाकिस्तान का यह कदम देश में ईरान समर्थक पाकिस्तानी शिया मुस्लिमों की नाराजगी बढ़ा सकता है।

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