The Paradise Movie Review: साउथ स्टार नानी की फिल्म द पैराडाइज रिलीज हो गई है। अगर आप भी इस फिल्म को देखने के प्लान कर रहे हैं, तो रिव्यू काफी काम आने वाला है। तो चलिए जानते हैं कि फिल्म में क्या अच्छा और क्या बुरा है।
फिल्म द पैराडाइज का रिव्यू
The Paradise Movie Review: साउथ स्टार नानी (Nani) की फिल्म द पैराडाइज (The Paradise) सिनेमाघरों में दस्तक दे चुकी है और इस बार एक्टर बिल्कुल अलग अंदाज में नजर आ रहे हैं। फिल्म में रॉ एक्शन, हिंसा, इमोशन और बदले की कहानी देखने को मिलती है। नानी ने अपने किरदार के लिए लुक से लेकर बॉडी लैंग्वेज तक पर काफी काम किया है। फिल्म का पहला हाफ दमदार एक्शन और शानदार विजुअल्स के साथ पकड़ बनाए रखता है, लेकिन इंटरवल के बाद कहानी थोड़ी बिखरती नजर आती है। तो आखिर करीब तीन घंटे की ये फिल्म आपका समय कितना वसूल करती है, आइए जानते हैं।
फिल्म की कहानी 1980 के दशक के सिकंदराबाद की है। यहां सवारा समुदाय के लोग रहते हैं, जिनके पास अपनी पहचान और सरकारी रिकॉर्ड में सही जगह नहीं है। ये लोग सालों से अपने हक और पहचान के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उनकी जिंदगी पर शिखंजा मलिक (Mohan Babu) का दबदबा है। इसी दुनिया में जडाल यानी नानी की एंट्री होती है। जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, वो अपने आसपास के लोगों और उनकी हालत को समझने लगता है। जडाल की जिंदगी में उसकी मां और सुब्बू यानी कायादू लोहार (Kayadu Lohar) का किरदार भी अहम है। इन रिश्तों की वजह से जडाल का एक अलग पहलू देखने को मिलता है। दूसरी तरफ शिखंजा मलिक का परिवार और उसका दबदबा कहानी को लगातार तनाव में रखता है। कहानी धीरे-धीरे बदले, हक और अपने लोगों के लिए खड़े होने की तरफ जाती है। यहां से फिल्म में एक्शन काफी बढ़ जाता है और जडाल का किरदार भी पूरी तरह बदलता नजर आता है।
सबसे पहली बात नानी की एक्टिंग। जडाल के रोल के लिए नानी ने अपने लुक और बॉडी पर काफी काम किया है। उनकी चाल-ढाल, दाढ़ी, बाल और पूरी बॉडी लैंग्वेज पहले वाली फिल्मों से काफी अलग दिखती है। एक्शन फिल्म की बड़ी ताकत है। खासकर पहला हाफ कई जगह काफी जोरदार है। मारधाड़ वाले सीन सिर्फ दिखावे के लिए नहीं लगते, बल्कि कहानी की दुनिया से जुड़े हुए महसूस होते हैं। फिल्म का वर्ल्ड बिल्डिंग भी अच्छा है। 1980 के दशक का माहौल, लोगों के कपड़े, घर, गलियां और पूरा सेटअप कहानी को एक अलग फील देता है। प्रोडक्शन डिजाइन पर काफी काम किया गया है। मोहान बाबू भी शिखंजा मलिक के रोल में अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हैं। उनका किरदार डर पैदा करने वाला है और उनकी एंट्री भी काफी असरदार है। राघव जुयाल (Raghav Juyal) भी विक्रम मलिक के रोल में अलग अंदाज में नजर आते हैं और उनके किरदार में एक अलग तरह की सख्ती देखने को मिलती है। सोनाली कुलकर्णी (Sonali Kulkarni) और कायादू लोहार भी अपने-अपने रोल में ठीक लगती हैं। अनिरुद्ध रविचंदर (Anirudh Ravichander) का म्यूजिक भी फिल्म के कुछ हिस्सों को अच्छा सपोर्ट देता है।
फिल्म की सबसे बड़ी दिक्कत दूसरा हाफ है। जिस तरह से पहला हाफ कहानी को धीरे-धीरे आगे बढ़ाता है और जडाल की दुनिया को समझने का मौका देता है, दूसरे हाफ में वही पकड़ कमजोर पड़ जाती है। कहानी आगे बढ़ाने के बजाय फिल्म बार-बार एक्शन और हिंसा की तरफ लौटती रहती है। फिल्म में इतनी ज्यादा मारधाड़ हो जाती है कि उसका असर कम होने लगता है। एक के बाद एक लड़ाई और टकराव आते रहते हैं, लेकिन हर सीन कहानी में कुछ नया जोड़ता हुआ नहीं लगता। जडाल और शिखंजा मलिक की भिड़ंत भी उतनी दमदार नहीं बन पाती, जितनी उम्मीद फिल्म का पहला हिस्सा जगाता है। शिखंजा मलिक को शुरुआत में काफी ताकतवर दिखाया जाता है, लेकिन आगे चलकर उसके किरदार को उतनी गहराई नहीं मिलती। फिल्म में कई किरदार ऐसे हैं, जिन्हें देखकर लगता है कि उनका रोल और बड़ा हो सकता था। फिल्म की कहानी पूरी तरह नई नहीं लगती।
अगर आपको रॉ एक्शन, खून-खराबा और मास एंटरटेनमेंट वाली फिल्में पसंद हैं, तो ‘द पैराडाइज’ आपको कई जगह पसंद आ सकती है। नानी का नया अवतार फिल्म देखने की एक बड़ी वजह है। लेकिन अगर आप ऐसी फिल्म चाहते हैं जिसमें एक्शन के साथ कहानी और किरदारों पर भी बराबर ध्यान दिया गया हो, तो यहां आपको कुछ कमी महसूस हो सकती है। खासकर दूसरा हाफ फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी बन जाता है। कुल मिलाकर, ‘द पैराडाइज’ का पहला हाफ जिस दमदार अंदाज में शुरू होता है, दूसरा हाफ उस लेवल को बनाए नहीं रख पाता। नानी की मेहनत, शानदार सेटअप और एक्शन के लिए फिल्म देखी जा सकती है, लेकिन कहानी से बहुत ज्यादा उम्मीद रखकर जाएंगे तो निराशा हो सकती है।