Haq movie Review: जंगली पिक्चर्स के अंतर्गत बनी फिल्म 'हक' (Haq) केवल मुस्लिम समुदाय के लिए ही नहीं बल्कि भारतीय समाज के लिए जरूरी है। डायरेक्टर सुपर्ण वर्मा (Suparn Varma) ने जिस तरह से एक जटिल विषय को बहुत ही साधारण अंदाज में पेश करके दिल को छू लेने वाला मैसेज दिया है, वो काबिल-ए-तारीफ है। फिल्म हक इमरान हाशमी (Emraan Hashmi) और यामी गौतम (Yami Gautam) की काबिलियत के साथ पूरा न्याय करती है और वर्तिका सिंह (Vartika Singh) के हुनर को पूरा सम्मान देती है।
Haq movie Review in Hindi: साल 1947 में भारत को अंग्रेजों से आजादी मिली थी, जिसके बाद देश के स्वतंत्रता सेनानियों और संविधान रचयिताओं ने देशवासियों से एक वादा किया था कि यहां हर किसी को समान अधिकार मिलेगा ताकि सभी भारत देश में सम्मानजनक जिंदगी बिता सकें और भेदभाव पूरी तरह से खत्म हो सके। भेदभाव खत्म करने की ये बात सिर्फ धर्म, जातियों और समुदायों के लिए ही नहीं बल्कि जेंडर्स यानि कि पुरुष-महिलाओं और बाकियों के लिए भी बोली गई थी लेकिन क्या हमने एक समाज के तौर पर देश के साथ किया ये वादा पूरा किया है? यही समझाने के लिए इमरान हाशमी-यामी गौतम और वर्तिका सिंह 'हक' जैसी थॉट प्रोवोकिंग मूवी लेकर आए हैं, जिसे धर्म के चश्मे से देखना न केवल महिलाओं और देशवासियों के साथ बल्कि देश के साथ भी गलत होगा।
फिल्में दो तरह की होती हैं एक जो आपसे कहती हैं कि दिमाग घर पर रखिए और थिएटर के अंदर खुद को एंटरटेन करिए और दूसरी वो जो अपने कंटेंट के दम पर आपको सोचने पर मजबूर करती हैं। जंगली पिक्चर्स के अंतर्गत बनी डायरेक्टर सुपर्ण वर्मा की 'हक' साल 1967 से शुरू होती है और हमें शाजिया बानो (यामी गौतम) - अब्बास (इमरान हाशमी) से मिलवाती है। घरवालों की रजामंदी से शादी कर रहे शाजिया और अब्बास की लवस्टोरी सोलफुल सॉग्स के साथ अनफोल्ड होती है और जल्द ही हमें अपनी दुनिया में ले जाती है। धीरे-धीरे इनकी शादीशुदा जिंदगी में आने वाले बदलाव हमें दिखाए जाते हैं और फिर होती है सायरा (वर्तिका सिंह) की एंट्री, जिसके साथ अब्बास ने पहली बीवी शाजिया को बिना बताए शादी कर ली है। इसके बाद पर्दे पर हमें शाजिया बानो के अधिकार और सम्मान की लड़ाई देखने को मिलती है, जिससे लड़ने के लिए अब्बास ने मजहब की चादर ओढ़कर आस्था को हथियार बनाया है। अब्बास के मजहब और शाजिया के कुरान में से किसे भारतीय संविधान का साथ मिलेगा, ये जानने के लिए आपको फिल्म हक देखनी होगी...
साल 1985 में भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के हक में एक लैंडमार्क फैसला दिया था, जिसने देश में नई चेतना पैदा की थी। इस फैसले से प्रेरित होकर एक ईमानदार फिल्म बनाने के लिए काफी रिसर्च और होमवर्क की जरूरत थी। डायरेक्टर सुपर्ण वर्मा और उनकी टीम ने सालों की मेहनत के बाद 'हक' की स्क्रिप्ट तैयार की, जिसमें तर्क के साथ समझाया गया है कि किसी भी धर्म की पवित्र पुस्तक में संविधान से अलग कुछ भी नहीं है। जो धर्म हमें सिखाते हैं, वही बात हमारा संविधान हमें बताता है। सुपर्ण वर्मा ने फिल्म के दौरान इस बात का ख्याल रखा है कि कहानी एक तरफा ना लगे और जो बात सालों पहले भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने देश को समझाने की कोशिश की थी, वो उसी भाषा में लोगों तक पहुंचे।
इमरान हाशमी और यामी गौतम अच्छे एक्टर्स हैं लेकिन अच्छे एक्टर्स को भी ऐसी स्क्रिप्ट्स की जरूरत होती है जो उन्हें लीजेंड के रूप में स्थापित कर सकें। सुपर्ण वर्मा की 'हक' इमरान-यामी के करियर की उन्हीं स्क्रिप्ट्स में से एक है, जो उन्हें भारतीय फिल्म इतिहास में अहम स्थान दिलाएगी। अब्बास और शाजिया के रोल को जिस तरह से इन्होंने निभाया उसके बाद यही कहा जा सकता है कि इनमें अभी बहुत सिनेमा बाकी है। अगर किसी बात की कमी है तो वो ऐसी स्क्रिप्ट्स की है, जो इनके हुनर के साथ न्याय कर पाएं। सुपर्ण वर्मा के डायरेक्शन की मदद से यामी गौतम और इमरान हाशमी ने खुद को रीडिस्कवर किया है। अगर इस साल के हर अवॉर्ड फंक्शन्स में ये दोनों ट्रॉफियों के साथ नजर आएं तो किसी को चौंकना नहीं चाहिए।
फिल्म 'हक' के साथ वर्तिका सिंह ने बॉलीवुड में डेब्यू किया है। बीते कुछ सालों के डेब्यूज उठाकर देखें तो ये साफ नजर आता है कि वर्तिका आईकैंडी नहीं बल्कि एक शानदार एक्ट्रेस के तौर पर अपनी पहचान बनाने के लिए इंडस्ट्री में आई हैं। सायरा के रोल को जिस मैच्योरिटी के साथ उन्होंने निभाया है, वो उनके हुनर की गवाही है। वर्तिका का किरदार सायरा बहुत ही लेयर्ड है, जिसे उन्होंने ईमानदारी से पेश किया है। 'हक' में दानिश हुसैन, राहुल मित्रा और शीबा चड्ढा के भी अहम रोल हैं, जो मल्टी डायमेंशन्स हैं। खास करके शीबा का रोल जो शाजिया की वो छड़ी है, जो उसे उसका हक दिलाने में मदद करती है और सुप्रीम कोर्ट की चौखट तक पहुंचाती है। इन सभी ने अपने-अपने किरदारों के साथ पूरा जस्टिस करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।
फिल्म 'हक' की बात इसके डायलॉग्स की तारीफ किए बिना पूरी नहीं हो सकती है। सुपर्ण वर्मा की टीम ने बहुत ही बारीकी से 'हक' के डायलॉग्स लिखे हैं जो कम शब्दों में अपना मैसेज देते हैं। अब्बास-शाजिया के बीच इजहार-ए-इश्क के सीन्स हो या फिर तकरार के, कोर्ट के अंदर वकीलों के बीच वाद-विवाद के सीन्स हो या फिर वर्तिका-शाजिया के बदलते रिश्तों की तस्वीर; सुपर्ण वर्मा की टीम की मेहनत साफ-साफ दिखाई देती है, जिसके लिए उन्हें एक सलाम तो बनता है।
अब आते हैं आखिरी फैसले पर कि फिल्म 'हक' देखनी चाहिए या नहीं? तो बॉलीवुड इंडस्ट्री पर पिछले कुछ सालों से ऐसे आरोप लगते रहे हैं कि वो कुछ हटकर नहीं बना रही है। इन आरोपों पर मिट्टी डालने और एक इंसान के तौर पर हमें अच्छा बनाने के लिए जंगली पिक्चर्स की 'हक' आई है, जिसमें यामी-इमरान-वर्तिका और शीबा जैसे एक्टर्स का शानदार काम है। सुपर्ण वर्मा के डायरेक्शन में बनी 'हक' केवल मुस्लिम ही नहीं बल्कि देश की हर महिला को उसके हक के बारे में जागरुक करने का काम करेगी और भारतीय मर्दों को उनकी जिम्मेदारी समझाएगी। ऐसी फिल्म को पूरे परिवार के साथ थिएटर में देखना बनता है क्योंकि समाज में बदलाव लाने का दम रखने वाला सिनेमा सम्मान पाने का "हक" रखता है। हम अपनी ओर से इस फिल्म के 5 स्टार देते हैं।