Gustaakh Ishq Movie Review: फिल्म गुस्ताख इश्क में विजय वर्मा और फातिमा सना शेख की शायरी भरी मोहब्बत दिल छूती है। खूबसूरत विज़ुअल्स, दमदार एक्टिंग और नसीर साहब की मौजूदगी कमाल की है, पर कमजोर स्क्रिप्ट और धीमी पेसिंग फिल्म को पूरी तरह उड़ने नहीं देती। अगर आप भी ये फिल्म देखने का प्लान कर रहे हैं, तो आप ये रिव्यू जरूर पढ़ें।
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Gustaakh Ishq Movie Review: बॉलीवुड में रोमांटिक ड्रामा की परंपरा को नया आयाम देने वाली फिल्म 'गुस्ताख इश्क' थिएटर्स में रिलीज हो चुकी है। निर्देशक विभु पुरी द्वारा बनाई गई इस फिल्म में विजय वर्मा, फातिमा सना शेख और नसीरुद्दीन शाह जैसे दिग्गज कलाकार है। फिल्म में एक ऐसी प्रेम कहानी है जो उर्दू शायरी की मिठास से सनी है, लेकिन पटकथा की कमजोरियां इसे पूरी तरह चमका नहीं पातीं। अगर आप भी इस फिल्म को देखने की प्लानिंग बना रहे हैं तो ये हमारा ये रिव्यू आपके बहुत काम आने वाला है। इस रिव्यू में हम आपको फिल्मी की अच्छी और खराब दोनों बातें बताने वाले हैं।
फिल्म की कहानी है एक जवान लड़के पप्पन की (विजय वर्मा), जो उर्दू शायरी की दुनिया में कदम रखता है। वो एक मशहूर शायर (नसीरुद्दीन शाह) से गुरुमंत्र लेने जाता है, और वहां उसकी मुलाकात होती है एक लड़की से (फातिमा सना शेख), जो उसी शायर की शागिर्द है। धीरे-धीरे नजरों का मिलना, शेर-ओ-शायरी का लफ्जों में बयां होना और वो पुरानी दिल्ली की गलियों जैसी नॉस्टैल्जिया सब कुछ मिलकर एक मोहब्बत की कहानी बुनता है। ये क्लासिक बिटरस्वीट लव स्टोरी है, जहां पैशन और दर्द साथ-साथ चलते हैं। लेकिन सर्कमस्टैंसेज आड़े आते हैं और इमोशन्स को टेस्ट करते हैं। कुल मिलाकर, ये फिल्म शायरी के जरिए मोहब्बत की तड़प दिखाती है, जो देखने वालों को पुराने गजल वाले मूड में डुबो देती है।
अब आते हैं फिल्म की अच्छी बातों पर, क्योंकि यहीं तो चमक है। सबसे पहले तो एक्टिंग की तारीफ बिना की कैसे चलेगी? विजय वर्मा का रोल बिल्कुल परफेक्ट लगता है वो सेंसिटिव, आर्टिस्टिक लवर है, जिसकी आंखों में सारी बातें समा जाती हैं। उसका बॉडी लैंग्वेज इतना रिस्ट्रेंड है कि लगता है, जैसे वो असल जिंदगी का ही कोई शायर हो। एक्सप्रेसिव आईज से वो इमोशन्स को ऐसे उकेरते हैं कि दिल पिघल जाता है। फिर फातिमा सना शेख ग्रेसफुल, वल्नरेबल, लेकिन क्वाइट स्ट्रॉन्ग। उनका किरदार इतना नेचुरल लगता है कि लगता है, वो खुद ही शायरी की दुनिया से निकली हो। दोनों के बीच केमिस्ट्री? वो तो ऑर्गेनिक है, सॉफ्ट है, पोएटिक है जैसे शब्दों की बारिश हो रही हो। नसीरुद्दीन शाह तो बस कमाल हैं, उनकी मौजूदगी ही फिल्म को इमोशनली और कल्चरली एंकर कर देती है। वो उर्दू शायर के रोल में इतनी डिग्निटी और ग्रेविटास लाते हैं कि लगता है, स्क्रीन पर असली हकीकत आ गई। सपोर्टिंग रोल में शरिब हाशमी भी न्यूएंस ऐड करते हैं, जो कहानी को बैलेंस देते हैं।
फल्म की खराब बातें भी हैं, जो इसे थोड़ा नीचे खींच लेती हैं। सबसे बड़ी प्रॉब्लम है स्टोरीलाइन की अनईवननेस कहानी कहीं तेज भागती है, कहीं लंगड़ाती हुई लगती है। प्लॉट में कुछ इंकंसिस्टेंसी है, जो परफॉर्मेंसेज को डाउन पुल करती है। इमोशनल डेप्थ हमेशा लैंड नहीं करती, क्योंकि रियलिटी फैंटेसी को बीच में काट देती है। क्लिशेज भी हैं वो स्टैंडर्ड लव स्टोरी वाले ट्विस्ट्स, जो नया कुछ नहीं लगते। पेसिंग में प्रॉब्लम है और ओवरऑल कन्विंसिंगनेस की कमी महसूस होती है। टेक्निकल साइड से तो सब ठीक है, लेकिन स्क्रिप्ट की कमजोरी साफ दिखती है। लगता है, फिल्म इमोशन्स को छूना चाहती है, लेकिन पूरी तरह से पकड़ नहीं पाती। अगर आप हाई-ऑक्टेन ड्रामा या मसाला एंटरटेनमेंट ढूंढ रहे हैं, तो ये मिस कर दो।
कुल मिलाकर, 'गुस्ताख इश्क' एक ऐसी फिल्म है जो लगभग हार्टफेल्ट बन जाती है, लेकिन स्टोरी की कमजोरियों से रुक जाती है। परफॉर्मेंसेज डीसेंट हैं, विज़ुअल्स ग्रैंड लेकिन इमोशनल इम्पैक्ट हमेशा स्ट्रॉन्ग नहीं। अगर आपको पोएटिक रोमांस पसंद है, तो थिएटर में जाकर देख लो शायद शायरी की लाइनें आपके दिल को छू जाएं। लेकिन एक्सपेक्टेशन्स कम रखना, वरना डिसअपॉइंटमेंट हो सकता है।