Bharat Bhhagya Viddhaata Movie Review: कंगना रनौत की 'भारत भाग्य विधाता' मुंबई हमले के दौरान कामा अस्पताल के कर्मचारियों की बहादुरी को दिखाती है। फिल्म प्रेरणादायक है, लेकिन फिल्म में काफी इनकंसिस्टेंसी है। अगर आप भी इस फिल्म को देखने का प्लान कर रहे हैं, तो ये रिव्यू जरूर पढ़ना चाहिए।
फिल्म भारत भाग्य विधाता का रिव्यू (Image Source: Bharat Bhhagya Viddhaata Movie)
Bharat Bhhagya Viddhaata Movie Review: बॉलीवुड एक्ट्रेस कंगना रनौत अपनी एक और नई फिल्म भारत भाग्य विधाता के साथ दर्शको के बीच आ गई हैं। कंगना रनौत की फिल्म भारत भाग्य विधाता आज यानी 12 जून को लंबे इंतजार के बाद बड़े पर्दे पर रिलीज हो गई है। ये फिल्म 26/11 मुंबई टेरर अटैक्स के दौरान कामा हॉस्पिटल में हुई घटनाओं पर बेस्ड है। फिल्म नर्सेस और हॉस्पिटल स्टाफ की बहादुरी को सलाम करती है जिन्होंने बिना हथियार के 300-400 मरीजों की जान बचाई। अगर आप भी इस फिल्म को देखने के प्लान बना रहे हैं, तो आपको बिना देर किए इस रिव्यू को आपको पूरा पढ़ लेना चाहिए। इस रिव्यू में हम आपको फिल्म की कमी और अच्छाई दोनों के बारे में बताने वाले हैं।
कहानी 26/11 अटैक्स के कुछ दिन बाद शुरू होती है। गीता गांधारे (कंगना रनौत) पुलिस के पास जाती है क्योंकि वो कामा हॉस्पिटल अटैक की एकमात्र गवाह है। फिर फ्लैशबैक में वो वो भयानक रात याद करती है। हॉस्पिटल में नर्सेस अपनी ड्यूटी कर रही होती हैं। गीता, त्रुप्ती, शीतल, बबिता, मोहिनी समेत बाकी स्टाफ दिन-रात मरीजों की सेवा में लगे रहते हैं। अचानक बाहर गोलीबारी शुरू हो जाती है। पहले तो सब सोचते हैं पटाखे फूट रहे हैं, लेकिन जल्दी ही पता चलता है कि टेररिस्ट अंदर घुस आए हैं। फिल्म दिखाती है कि ये नर्सेस कैसे 300 से ज्यादा मरीजों, प्रेग्नेंट महिलाओं और NICU के बच्चों को बचाने के लिए अपनी जान पर खेल जाती हैं। टेररिस्ट अजमल कसाब और अबू इस्माइल का सामना करते हुए वो एक-दूसरे का साथ देती हैं।
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत है इसका इंस्पायरिंग मैसेज। नर्सेस की बहादुरी को पहली बार इतने बड़े पर्दे पर दिखाया गया है। कंगना रनौत ने अपना 100% दिया है। उन्होंने महाराष्ट्रीयन नर्स का रोल बहुत सीरियसली लिया और कई सीन में उनकी इंटेंसिटी देखने लायक है। अटैक सीक्वेंस में टेंशन कमाल की है। बैकग्राउंड म्यूजिक दिल दहला देता है और कुछ मोमेंट्स शॉक वैल्यू वाले हैं। नर्सेस के बीच हंसी-मजाक वाले छोटे-छोटे सीन बहुत नेचुरल लगते हैं। सपोर्टिंग एक्टर्स खासकर स्मिता तांबे और रसिका आगाशे ने शानदार काम किया है। फिल्म में ज्यादा मसाला नहीं डाला गया है, जिसकी वजह से मूवी सिंपल बनी है। इंटरवल पॉइंट मजबूत है और सेकंड हाफ में एक्शन बढ़ जाता है। NICU के बच्चों को बचाने वाले सीन इमोशनल हैं।
फिल्म में काफी इनकंसिस्टेंसी है। कंगना का महाराष्ट्रीयन एक्सेंट कभी-कभी टूट जाता है जो ब्रेक लगाता है। स्क्रीनप्ले और डायलॉग्स हमेशा कन्विंसिंग नहीं लगते। कैरेक्टर्स की पर्सनल लाइफ पर ज्यादा काम नहीं किया गया, जिससे इमोशनल कनेक्शन कमजोर पड़ जाता है। फर्स्ट हाफ कैरेक्टर्स स्थापित करने में लग जाता है और दूसरा हाफ थोड़ा कमजोर लगता है। भाषा और स्क्रीनप्ले में कुछ जगह खालीपन सा लगता है। फिल्म कभी-कभी बहुत सरल और टेक्स्टबुक स्टाइल की हो जाती है। कुछ सीन रिपिटिटिव फील होते हैं और सिनेमैटिक तरीके से ये उतना एंगेजिंग नहीं बन पाती जितनी बन सकती थी। इंटेंशन अच्छा है लेकिन एग्जीक्यूशन में कुछ कमियां रह गई हैं।
अब सवाल आता है कि कंगना रनौत की इस फिल्म को देखे या नहीं देखें। अगर आप पैट्रियॉटिक फिल्में पसंद करते हो, 26/11 की कहानियां देखना चाहते हो और नर्सेस की अनकही बहादुरी जानना अच्छा लगता है तो ये फिल्म जरूर देख लेनी चाहिए। कंगना की परफॉर्मेंस और इंस्पायरिंग मोमेंट्स के लिए थिएटर जाना वर्थ है। ये फिल्म दिल को छूती है। लेकिन अगर आप टाइट, फास्ट पेस्ड और परफेक्टली मेड थ्रिलर चाहते हो तो थोड़ा सोच लेना चाहिए। ये इंस्पायरिंग है लेकिन थोड़ी इनकंसिस्टेंट भी है।