Muslim Candidates in Bengal: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव को लेकर गहमा-गहमी जारी है और इसे लेकर तपिश बढ़ती ही जा रही है। वहीं इस सबके बीच चर्चा हो रही है राज्य के मुस्लिम मतदाताओं की। बताते हैं कि राज्य में सौ से ज्यादा सीटों पर मुस्लिम मतदाता जीत हार तय करने में अहम भूमिका रखते हैं। इसे लेकर कैसे हैं समीकरण इनके बारे में जानें
पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तरी दिनाजपुर जैसे जिलों में मुस्लिम आबादी 50 फीसदी से भी अधिक है। सौ से ज्यादा सीटों पर मुस्लिम मतदाता जीत हार तय करने में अहम भूमिका रखते हैं। ममता बनर्जी की अगुवाई वाली तृणमूल कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की 291 सीटों के लिए अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है। उसने करीब 18 फीसदी यानी 47 सीटों पर मुस्लिम प्रत्याशी चुनाव में उतारे हैं।
जबकि बीजेपी ने अभी तक बंगाल विधानसभा चुनाव के लिए प्रत्याशियों की दो सूची जारी की हैं, इसमें एक भी मुस्लिम उम्मीदवार नहीं है।
जबकि मुर्शिदाबाद के बेलडांगा में बाबरी मस्जिद की नींव रखने वाले पूर्व टीएमसी नेता हुमांयू कबीर ने 182 सीटों में से 100 से ज्यादा सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवार देने का ऐलान किया है।
हुमायूं कबीर ने असदुद्दीन ओवैसी की ऑल इंडिया मजलिस इत्तेहादुल मुसलमीन (AIMIM) से गठबंधन भी किया है। बीजेपी ने कुल 255 उम्मीदवारों के नामों की घोषणा की है। 16 मार्च को पहली सूची में सुवेंदु अधिकारी समेत 144 प्रत्याशियों की घोषणा हुई। जबकि 19 मार्च को दूसरी सूची में रूपा गांगुली, निशीथ प्रमाणिक और रेखा पात्रा जैसे नाम है।
बंगाल में मुस्लिम वोटर्स कितने
बंगाल विधानसभा चुनाव में मुस्लिम आबादी एक निर्णायक वोट बैंक है। बंगाल की कुल 294 सीटों में से लगभग 100 से 110 सीटों पर मुस्लिम मतदाता जीत हार तय करते हैं। पिछले तीन बार से तृणमूल कांग्रेस बंगाल में धमाकेदार जीत दर्ज कर चुकी है और मुस्लिम वोटरों का करीब एकतरफा झुकाव टीएमसी की ओर रहा है। यही वजह है कि लेफ्ट और कांग्रेस और इंडियन सेकुलर फ्रंट जैसे दलों को चुनाव में एक भी सीट हासिल नहीं हो सकी।
ममता बनर्जी की पार्टी ने 2012 में कांग्रेस से गठबंधन के दौरान 38 मुस्लिम प्रत्याशी दिए थे। जबकि 2017 में उसने 57 टिकट दिए, जो संख्या 2022 में घटकर 42 पर आ गई। इस बार पार्टी ने 47 मुस्लिम उतारे हैं। तृणमूल ने इस बार कई मुस्लिम बहुल सीटों पर भी हिन्दू उम्मीदवार उतारे हैं।
बंगाल में मुस्लिम आबादी
पश्चिम बंगाल की मुस्लिम आबादी में 90% बंगाली भाषी मुस्लिम हैं, जो मुख्तया ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं। जबकि लगभग 10% उर्दू भाषी मुस्लिम हैं, जो कोलकाता, आसनसोल और इस्लामपुर जैसे शहरी क्षेत्रों में बसते हैं।
तृणमूल कांग्रेस की विधानसभा चुनाव में हैट्रिक!
ममता बनर्जी की पार्टी बंगाल की 294 में से 291 विधानसभा सीट पर चुनाव लड़ रही है।उसने 3 सीट भारतीय गोरखा प्रजातांत्रिक मोर्चा (BGPM) को दी हैं।ममता बनर्जी भवानीपुर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ रही हैं, उनके खिलाफ शुभेंदु अधिकारी इस सीट से ताल ठोकेंगे, बंगाल चुनाव में तृणमूल कांग्रेस के 291 प्रत्याशियों में से 52 महिलाएं, 95 एससी-एसटी और 47 मुस्लिम हैं।
बंगाल में मुस्लिम आबादी कितनी
बंगाल में मुस्लिम आबादी करीब 27 फीसदी है।जनगणना 2011 के अनुसार, बंगाल की कुल आबादी करीब 9.13 करोड़ है, जिसमें मुस्लिम आबादी 2.5 करोड़ के करीब है। चुनावी विश्लेषकों के अनुसार 2026 तक बंगाल में मुस्लिम आबादी बढ़कर 28 से 30% के बीच पहुंच गई है। बंगाल की अब आबादी 10.5 करोड़ से ज्यादा है, जिसमें मुस्लिम जनसंख्या 3 करोड़ से अधिक हो सकती है।
मुस्लिम बहुल जिले
मुर्शिदाबाद: 66.3%
मालदा: 51.3%
उत्तर दिनाजपुर: 50%
बीरभूम: 37%
दक्षिण 24 परगना : 35.5%
नादिया : 26.7%
भरतपुर सीट पर रोचक मुकाबला
मुर्शिदाबाद की भरतपुर विधानसभा सीट से टीएमसी ने मुस्तफिजुर रहमान को टिकट दिया है।तृणमूल कांग्रेस छोड़कर आम जनता उन्नयन पार्टी बनाने वाले हुमायूं करीब यहां से विधायक रहे हैं। हालांकि कबीर इस बार कबीर भरतपुर की बजाय मुर्शिदाबाद की रेजिनगर और नाओदा सीट से लड़ रहे हैं। हुमायूं करीब ने कांदी से कोलकाता के मेयर फिरहाद हकीम के पूर्व दामाद यासीन हैदर, बेलडांगा से सैयद अहमद कबीर जैसे दिग्गजों को प्रत्याशी बनाया है।
मालदा की रतुआ सीट से रायल इस्लाम, बैष्णवनगर से मुस्कुरा बीबी, मालतीपुर से अब्दुल मिनाज शेख, मानिकचक से अबू सैद और सुजापुर से नसीमुल हक चुनाव लड़ रहे हैं।बेहाला पूर्व से अनुपम रोहदागीर, भरतपुर से सैयद खुबैब अमीन, फरक्का से इम्तियाज मोल्ला और हरिहरपारा से बिजय शेख मैदान में होगे
2021 में टीएमसी का दबदबा
2021 का चुनाव निर्णायक साबित हुआ. 85 में से 75 सीटें टीएमसी के खाते में गईं,जो मुस्लिम वोटों के बड़े पैमाने पर उसके पक्ष में एकजुट होने का संकेत था। मुर्शिदाबाद की 22 में से 20 सीटों पर टीएमसी जीती, दो सीटें बीजेपी को मिलीं. कांग्रेस और लेफ्ट का खाता नहीं खुला।मालदा की 12 सीटों में टीएमसी ने आठ और बीजेपी ने चार सीटें जीतीं। उत्तर दिनाजपुर में टीएमसी को सात और बीजेपी को दो सीटें मिलीं. बीरभूम की 11 में से 10 सीटें टीएमसी ने जीतीं, एक बीजेपी के पास गई। दक्षिण 24 परगना की 31 में से 30 सीटों पर टीएमसी ने जीत दर्ज की।
बंगाल में ओवैसी-हुमायूं कबीर का गठबंधन दिखा सकता था दम पर अब टीएमसी को फायदा
साल 2021 के चुनाव में टीएमसी ने इन 85 मुस्लिम-बहुल सीटों में से 75 पर जीत हासिल की थी (कुल 213 सीटें जीतीं)। भाजपा मात्र 5 सीटें ही ले पाई थी। लेकिन अब AJUP-AIMIM गठबंधन के आने से टीएमसी का वोट बैंक बंटने का खतरा साफ दिख रहा है।अगर गठबंधन 40-50 सीटों पर भी मजबूत प्रदर्शन करता है या मुस्लिम वोट शेयर 15-20 प्रतिशत तक पहुँच जाता है तो टीएमसी को 50-70 सीटों का नुकसान हो सकता है।
कबीर का खुला दावा है कि अगर विधानसभा लटक गई तो उनकी पार्टी किंगमेकर बनेगी और मुस्लिम डिप्टी सीएम या यहां तक कि सीएम पद की माँग रखेगी।बता दें कि पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव दो चरणों में 23 और 29 अप्रैल 2026 को होंगे और मतगणना 4 मई को होगी।
पश्चिम बंगाल में ओवैसी ने तोड़ा गठबंधन, AIMIM अब अकेले लड़ेगी चुनाव
2021 में AIMIM ने 6 सीटो पर चुनमाव लड़ा था और सारी सीटो पर हार का सामना करना पड़ा था। हुमायूं कबीर की आम जनता उन्नयन पार्टी (एजेडीयूपी) ने पहले ही ऐलान किया था कि उनकी पार्टी 2026 के विधानसभा चुनाव में 182 सीटों पर उम्मीदवार उतारेगी। इस गठबंधन में AIMIM भी साझेदार थी और लगभग 11 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं।
हुमायूं-ओवैसी का गठबंधन टूटने का इम्पैक्ट
बंगाल चुनाव में वोटिंग से ठीक पहले हुमायूं कबीर और असदुद्दीन ओवैसी के गठबंधन टूटने का सियासी असर पड़ सकता है।राज्य में 30 फीसदी मुस्लिम वोटर हैं, जिसके बिखराव का खतरा कम हो गया है। टीएमसी का सबसे बड़ा डर मुस्लिम वोटों का AIMIM और हुमायूं कबीर के बीच बंटना था,गठबंधन टूटने से यह मोर्चा कमजोर हो गया है।
टीएमसी के वरिष्ठ नेता और मंत्री फिरहाद हाकिम ने कहा कि हुमायूं कबीर बीजेपी के साथ मिलकर अल्पसंख्यक मतदाताओं को गुमराह कर रहे हैं।उन्होंने मुस्लिम समुदाय की भावनाओं के साथ खिलवाड़ न करने की चेतावनी दी और कहा कि यह वीडियो गहरी साजिश को दिखाता है। ऐसे में टीएमसी को मौका मिल गया है ओवैसी और हुमायूं कबीर को घेरने का. टीएमसी ने कहना शुरू कर दिया है कि ओवैसी और कबीर भाजपा की 'B और C टीम' हैं।इससे मुस्लिम मतदाता ममता के पक्ष में 'कंसोलिडेट' (एकजुट) हो सकते हैं।
इसका सीधा फायदा ममता बनर्जी को हो सकता है,क्योंकि 2011 से मुस्लिमों का वोट टीएमसी को एकमुश्त मिलता रहा है।
हुमायूं और ओवैसी की राजनीति पर ग्रहण!
बंगाल में त्रिकोणीय चुनावी मुकाबला के संभावना पर भी ग्रहण लग गया है। ओवैसी और हुमायूं कबीर के एक साथ मिलकर चुनाव लड़ने से 5-10 फीसदी मुस्लिम वोट काट सकते थे, जिसका लाभ सीधे तौर पर बीजेपी को मिलता, लेकिन अब गेम बदल गया है। मुर्शिदाबाद और मालदा जैसे इलाकों में हुमायूं कबीर का अपना रसूख था, लेकिन इस स्टिंग और ओवैसी के साथ छोड़ने के बाद उनकी छवि 'सौदागर' जैसी बन गई है,
जिससे उनका समर्थक बेस डगमगा सकता है।
ओवैसी बंगाल में एक मजबूत स्थानीय चेहरा (हुमायूं) के कंधे पर सवार होकर पैर जमाना चाहते थे, अकेले चुनाव लड़ने से AIMIM के लिए सीटें जीतना नामुमकिन जैसा हो सकता है, और वे सिर्फ 'वोट कटवा' के ठप्पे तक सीमित रह सकते हैं। पिछले चुनाव में ओवैसी ने अकेले लड़कर अपना सियासी हश्र देख लिया है. इसीलिए हुमायूं कबीर के साथ गठबंधन किया था।
बंगाल की 294 सीटों में से करीब 100 सीटों पर मुस्लिम वोट निर्णायक हैं, हुमायूं और ओवैसी का गठबंधन टूटना ममता बनर्जी के लिए किसी सियासी 'संजीवनी'से कम नहीं है, लेकिन चुनावी ऊंट किस करवट बैठेगा, यह 4 मई के नतीजे ही बताएंगे। अब मुस्लिम वोटों को साधना टीएमसी के लिए और भी आसान हो गया है, जो लेफ्ट और कांग्रेस के लिए भी सियासी टेंशन बढ़ा सकता है?
