US Iran Conflict: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बुधवार को ईरान को लेकर बड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा कि जब अमेरिका और इजरायल ने संयुक्त रूप से ऑपरेशन एपिक फ्यूरी शुरू किया था, तब उन्हें लगा था कि ईरान में सत्ता परिवर्तन संभव हो सकता है। हालांकि, उन्होंने स्वीकार किया कि उन्होंने ईरानी शासन की अपने लोगों पर कठोर कार्रवाई करने की क्षमता और मंशा का गलत आंकलन किया था।
क्या कुछ बोले डोनाल्ड ट्रंप?
फॉक्स न्यूज को दिए एक इंटरव्यू में जब ट्रंप से पूछा गया कि क्या उन्हें अब भी लगता है कि ईरानी जनता अपने देश की सत्ता अपने हाथ में ले सकती है? तो इस पर उन्होंने कहा कि लोग सरकार के दमन से डरे हुए हैं। उन्होंने कहा, ''मुझे लगता है कि लोग इस डर में हैं कि उन पर गोली चलाई जा सकती है।''
जब ट्रंप से पूछा गया कि क्या ऑपरेशन शुरू होने के समय उन्हें वास्तव में सत्ता परिवर्तन की उम्मीद थी, तो उन्होंने इस पर चुप्पी तोड़ते हुए कहा, ''हां, मुझे ऐसा लगा था। अगर लोगों के पास बंदूकें या हथियार होते तो शायद यह संभव होता। मुझे अंदाजा नहीं था कि ईरानी शासन 50,000 या किसी भी संख्या में लोगों को मारने तक के लिए तैयार हो जाएगा।
ऑपरेशन एपिक फ्यूरी
ट्रंप ने आगे कहा, ''जब हमने ऑपरेशन एपिक फ्यूरी शुरू किया था, तब मुझे लगा था कि ईरान में सत्ता परिवर्तन संभव है, लेकिन मुझे यह नहीं पता था कि वहां की सरकार अपने ही लोगों के खिलाफ इतनी हिंसक कार्रवाई करने को तैयार होगी।''
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सनद रहे कि ऑपरेशन एपिक फ्यूरी की घोषणा के दौरान ट्रंप ने सीधेतौर पर ईरान की जनता से अपनी सरकार के खिलाफ खड़े होने की अपील की थी। उन्होंने कहा था कि सैन्य अभियान समाप्त होने के बाद ईरानी जनता अपनी सरकार को उखाड़ फेंके और अमेरिका उनका समर्थन करेगा। इस सैन्य अभियान को अमेरिका और इजरायल ने संयुक्त रूप से शुरू किया था। इसका मकसद ईरान की सैन्य क्षमताओं को कमजोर करना, उसे परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना और उसके नेतृत्व पर दबाव बनाना था।
अमेरिका ने बदली अपनी रणनीति
हाल के सप्ताहों में ट्रंप प्रशासन के रुख में बदलाव देखने को मिला है। अब सार्वजनिक रूप से सत्ता परिवर्तन की बात कम की जा रही है और जोर सैन्य दबाव तथा कूटनीतिक वार्ता पर दिया जा रहा है। अमेरिका ने एक बार फिर ईरान के सैन्य ठिकानों पर हमले तेज कर दिए हैं। साथ ही ईरान को चेतावनी दी है कि अगर वह बातचीत की मेज पर नहीं लौटता और होर्मुज में नौवहन की स्वतंत्रता सुनिश्चित नहीं करता है तो सैन्य कार्रवाई का दायरा और बढ़ाया जा सकता है।
