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TMC की SC में काउंटिंग सुपरवाइजर के तौर पर केंद्रीय कर्मचारियों की नियुक्ति को चुनौती, 2 मई को सुनवाई, टीएमसी की ये हैं मांगें

टीएमसी ने चुनाव आयोग के उस फैसले को चुनौती दी है जिसमें सेंट्रल और पीएसयू के कर्मचारियों को पश्चिम बंगाल में काउंटिंग सुपरवाइजर बनाया गया है और राज्य कर्मचारियों को इससे बाहर रखा गया है।

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TMC पहुंची सुप्रीम कोर्ट (प्रतीकात्मक फोटो)

तृणमूल कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल चुनाव के लिए सिर्फ़ सेंट्रल गवर्नमेंट/PSU के कर्मचारियों को काउंटिंग सुपरवाइजर नियुक्त करने के चुनाव आयोग के फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीमकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया है।TMC ने सुप्रीम कोर्ट मे याचिका दाखिल की है। बता दें कि कल कलकत्ता हाईकोर्ट ने TMC की याचिका खारिज कर दी थी।कलकत्ता हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ TMC सुप्रीम कोर्ट पहुंची है।

टीएमसी की याचिका पर कल यानी 2 मई शनिवार को सुप्रीम कोर्ट सुनवाई करेगा। जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच सुनवाई करेगी।

बता दें कि कोलकाता हाई कोर्ट ने कल यानी 30 अप्रैल को ही टीएमसी की याचिका खारिज कर दी थी। अदालत ने केंद्रीय सरकार/पीएसयू कर्मचारियों को काउंटिंग सुपरवाइजर नियुक्त करने के फैसले की वैधता को बरकरार रखा और रिट याचिका खारिज कर दिया था।

सुप्रीम कोर्ट के सामने TMC ने रखी है ये मांगें

सुप्रीम कोर्ट की विशेष बेंच कल टीएमसी की उस याचिका पर सुनवाई करने जा रहा है जिसमें चुनाव आयोग के एक फैसले को मनमाना और पक्षपातपूर्ण करार दिया गया है। पार्टी ने कलकत्ता हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी है जिसमें मतगणना में केंद्रीय सरकारी/पीएसयू कर्मचारियों की अनिवार्य तैनाती संबंधी निर्देश को बरकरार रखा गया था। टीएमसी ने याचिका सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड संचित गर्ग के जरिए दाखिल की है। 'टाइम्स नाउ नवभारत' के पास टीएमसी की याचिका की कॉपी मौजूद है। आइए आपको विस्तार से बताते हैं कि टीएमसी आखिरकार मांग क्या है:

मामला 13 अप्रैल को पश्चिम बंगाल के अतिरिक्त मुख्य निर्वाचन अधिकारी द्वारा जारी एक आदेश से जुड़ा है। इस निर्देश में कहा गया था कि 4 मई को होने वाली मतगणना के दौरान हर टेबल पर कम से कम एक काउंटिंग सुपरवाइजर या काउंटिंग असिस्टेंट केंद्रीय सरकार या केंद्रीय पीएसयू का कर्मचारी होना चाहिए।

टीएमसी ने इसे मनमाना, भेदभावपूर्ण और अधिकार क्षेत्र से बाहर बताते हुए चुनौती दी थी।

सुप्रीम कोर्ट में क्या हैं टीएमसी की दलीलें

टीएमसी ने अपनी याचिका में कई गंभीर आपत्तियां उठाई हैं:

1. मनमानी और पक्षपात की आशंका

टीएमसी की दलील है कि केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के अधीन आने वाले कर्मचारियों की तैनाती से निष्पक्षता पर सवाल उठता है।

याचिका में कहा गया है कि यह व्यवस्था सिर्फ पश्चिम बंगाल में ही लागू की गई, जबकि अन्य राज्यों में ऐसा नहीं किया गया, जिससे समानता के सिद्धांत का उल्लंघन होता है।

2. पहले से मौजूद हैं सुरक्षा के उपाय

टीएमसी का तर्क है कि मतगणना प्रक्रिया के लिए चुनाव आयोग पहले ही माइक्रो-ऑब्जर्वर्स की नियुक्ति करता है, जो आमतौर पर केंद्रीय कर्मचारी होते हैं। ऐसे में अलग से केंद्रीय कर्मचारियों के अनिवार्यता गैर-जरूरी और असंतुलित है।

3. मुख्य चुनाव अधिकार की शक्तियों पर भी उठाए सवाल

याचिका में यह भी कहा गया है कि पश्चिम बंगाल के अतिरिक्त मुख्य निर्वाचन अधिकारी को ऐसी नीति बनाने का अधिकार नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत यह शक्ति केवल चुनाव आयोग के पास है। उनकेबआदेश में किसी वैधानिक आधार या आयोग की मंजूरी का उल्लेख नहीं है।

4.चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता पर असर

टीएमसी का कहना है कि इस निर्देश से काउंटिंग टेबल पर केंद्रीय कर्मचारियों की संख्या असंतुलित रूप से बढ़ेगी। इससे निष्पक्षता पर संदेह उत्पन्न होगा और चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता प्रभावित होगी।

याचिका में टीएमसी ने आदेश जारी करने के समय पर भी सवाल उठाए गए हैं। पार्टी का आरोप है कि चुनाव की घोषणा के बाद और मतदान प्रक्रिया शुरू होने से ठीक पहले यह निर्देश जारी किया गया, जिससे दुर्भावना की आशंका पैदा होती है।

5.चुनाव पूरा होने के बाद याचिका दाखिल करने का आदेश सही नहीं

टीएमसी ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि हाईकोर्ट ने यह कहकर गलती की कि पार्टी चुनाव परिणाम के बाद याचिका दायर कर सकती है। पार्टी का तर्क है कि जब पूरी चुनाव प्रक्रिया ही प्रभावित हो रही हो, तब बाद में याचिका दाखिल करने का कोई औचित्य नहीं रह जाएगा।

ऐसे मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप पहले ही जरूरी है।

कोलकाता हाईकोर्ट के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:-

* मतगणना प्रक्रिया में किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा।

* इस तरह की नियुक्तियां चुनाव आयोग के विवेकाधिकार के अंतर्गत आती हैं और अवैध नहीं हैं।

* हैंडबुक के प्रावधान राज्य कर्मचारियों तक चयन को सीमित नहीं करते।

* माइक्रो ऑब्जर्वर, एजेंट, सीसीटीवी आदि की मौजूदगी पारदर्शिता सुनिश्चित करती है, इसलिए आरोप महज अटकलें हैं।

* अतिरिक्त मुख्य निर्वाचन अधिकारी (ACEO) को जनप्रतिनिधित्व कानून के प्रत्यायोजन प्रावधानों के तहत वैध अधिकार प्राप्त है।

* इसलिए चुनाव आयोग का सर्कुलर या आदेश उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर नहीं है।

हाईकोर्ट ने इस आशंका को भी खारिज किया कि केंद्रीय सरकारी कर्मचारी राजनीतिक प्रभाव में काम करेंगे, क्योंकि

•मतगणना हॉल में कई राजनीतिक दलों के लोग मौजूद रहते हैं।

* सीसीटीवी और ऑब्जर्वर जैसी सुरक्षा व्यवस्थाएं लागू हैं।

* आरोप केवल आशंका पर आधारित हैं, जिनके समर्थन में कोई ठोस साक्ष्य नहीं है।

* जारी चुनाव प्रक्रिया के दौरान न्यायिक हस्तक्षेप से बचना चाहिए।

* किसी भी शिकायत को जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 100 के तहत चुनाव याचिका के माध्यम से उठाया जा सकता है।

15 पोलिंग स्टेशनों पर 2 मई को दोबारा वोटिंग का आदेश

चुनाव आयोग ने बंगाल के कुल 15 पोलिंग स्टेशनों पर 2 मई को दोबारा वोटिंग का आदेश दिया है। 4 मई को वोटों की गिनती से ठीक पहले बंगाल में चल रही राजनीतिक उथल-पुथल के बीच, मुख्य चुनाव अधिकारी (CEO) मनोज अग्रवाल ने शुक्रवार को जोर देकर कहा कि गिनती केंद्रों पर किसी भी तरह की गड़बड़ी की कोई गुंजाइश नहीं है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने गुरुवार रात अपने भवानीपुर विधानसभा क्षेत्र के गिनती केंद्र पर घंटों बिताए और आरोप लगाया कि वहां धांधली की संभावना है।

Gaurav Srivastav
गौरव श्रीवास्तव author

टीवी न्यूज रिपोर्टिंग में 10 साल पत्रकारिता का अनुभव है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट से लेकर कानूनी दांव पेंच से जुड़ी हर खबर आपको इस जगह मिलेगी। साथ ही चुना... और देखें

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