Bihar Election 2025: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 से पहले सीमांचल की राजनीति एक बार फिर गर्म होने लगी है। पूर्णिया जिले की अमौर विधानसभा सीट इस बार भी सियासी मुकाबले का केंद्र बनी हुई है। 2020 में AIMIM के अख्तरुल ईमान ने यहां शानदार जीत हासिल की थी, लेकिन अब जेडीयू ने पूर्व सांसद साबिर अली को उतारकर खेल पूरी तरह बदल दिया है। कांग्रेस भी अपने पुराने नेता अब्दुल जलील मस्तान के साथ मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने की तैयारी में है।
AIMIM के गढ़ में बढ़ी बेचैनी
पिछले चुनाव में अख्तरुल ईमान ने कांग्रेस और आरजेडी को पछाड़कर AIMIM को सीमांचल में मजबूत पहचान दी थी। अमौर को तब से AIMIM का गढ़ माना जाता है। हालांकि, अब स्थिति पहले जैसी नहीं है। पार्टी के कई स्थानीय कार्यकर्ताओं के अलग होने और विरोधी दलों की सक्रियता ने ईमान की चुनौती बढ़ा दी है। उन्हें इस बार अपनी सीट बचाने के लिए विकास और संगठन दोनों मोर्चों पर मेहनत करनी होगी।
जेडीयू का मास्टरस्ट्रोक: साबिर अली मैदान में
जेडीयू ने मुस्लिम बहुल इस सीट पर बड़ा दांव खेलते हुए पूर्व सांसद साबिर अली को टिकट दिया है। राजनीतिक रूप से अनुभवी साबिर अली लंबे समय से सीमांचल में सक्रिय रहे हैं और उनकी पकड़ स्थानीय मतदाताओं के बीच मजबूत मानी जाती है। जेडीयू का मानना है कि अगर कांग्रेस और AIMIM के वोट बंटे तो पार्टी को निर्णायक बढ़त मिल सकती है।
कांग्रेस भी नहीं पीछे
कांग्रेस ने भी अब्दुल जलील मस्तान पर भरोसा जताया है। मस्तान सीमांचल की राजनीति में एक जाना-पहचाना नाम हैं और पिछले चुनावों में लगातार सक्रिय रहे हैं। पार्टी को उम्मीद है कि परंपरागत वोट बैंक और स्थानीय समर्थन उन्हें इस बार बेहतर प्रदर्शन का मौका देंगे।
मुद्दे वही, चेहरों में बदलाव
अमौर में इस बार भी सड़क, बाढ़ नियंत्रण, शिक्षा और रोजगार जैसे मुद्दे प्रमुख रहेंगे। सीमांचल के विकास की धीमी रफ्तार को लेकर मतदाताओं में असंतोष साफ झलकता है। ऐसे में विकास का एजेंडा हर उम्मीदवार की चुनावी रणनीति का केंद्र बन चुका है।
2025 में अमौर का चुनाव सिर्फ उम्मीदवारों की लोकप्रियता नहीं, बल्कि सीमांचल के राजनीतिक संतुलन की नई दिशा भी तय करेगा। अख्तरुल ईमान के लिए सीट बचाना उतना ही मुश्किल होगा, जितना जेडीयू और कांग्रेस के लिए उसे छीनना।
