Swami Vivekananda Chikago Speech: सिस्टर्स एंड ब्रदर्स ऑफ...जब विदेशी धरती पर गूंजा भारत का गौरव-पढ़ें स्वामी विवेकानंद का शिकागो भाषण
- Authored by: आदित्य सिंह
- Updated Jan 12, 2026, 07:01 AM IST
Swami Vivekananda Chikago Speech In Hindi: प्रत्येक वर्ष 12 जनवरी को स्वामी विवेकानंद की जन्म जयंती मनाई (Swami Vivekananda Chikago Speech) जाती है। वहीं जब विवेकानंद जी का जिक्र होता है तो उनके शिकागो भाषण की चर्चा जरूर (Swami Vivekananda Chikago Speech In Hindi) होती है। ऐसे में यहां हम आपके लिए स्वामी विवेकानं शिकागो स्पीच लेकर आए हैं।
Swami Vivekananda Chikago Speech: यहां देखें स्वामी विवेकानंद शिकागो भाषण
Swami Vivekananda Chikago Speech In Hindi: हर साल 12 जनवरी को स्वामी विवेकानंद जी की जन्म जयंती के उपलक्ष्य में राष्ट्रीय युवा दिवस मनाया (Swami Vivekananda Chikago Speech) जाता है। स्वामी जी भारत के महान संत, विचारक, दार्शनिक और समाज (Swami Vivekananda Chikago Speech In Hindi) सुधारक थे। वह ऐसे युग पुरुष थे जिनके विचारों ने न केवल भारत को आत्म गौरव का बोध कराया बल्कि विश्व को सहिष्णुता व मानव एकता का मार्ग (Swami Vivekananda Chicago Speech Date) भी दिखाया। उनके बचपन का नाम नरेंद्रनाथ दत्त था। बचपन से ही वह मेधावी, जिज्ञासु और निर्भीक स्वभाव के थे। संगीत, साहित्य और दर्शन में उनकी गहरी (Swami Vivekananda Chicago Speech Original Voice) रुचि थी। वहीं जब स्वामी विवेकानंद का जिक्र होता है तो 11 सितंबर 1893 को अमेरिका के शिकागो शहर की धर्म संसद में उनके भाषण की चर्चा जरूर होती है। ऐसे में यहां हम आपके लिए अमेरिका के शिकागो में दिए स्वामी विवेकानंद का पूरा भाषण लेकर आए हैं। यहां देखें स्वामी विवेकानंद शिकागो स्पीच
Swami Vivekananda Chicago Speech In Hindi: स्वामी विवेकानंद शिकागो स्पीच
सिस्टर्स एंड ब्रदर्स ऑफ अमेरिका, अमेरिका की बहनों और भाइयों
मेरे अमेरिकी भाइयों और बहनों आपके इस स्नेहपूर्ण और जोरदार स्वागत से मेरा हृदय अपार हर्ष से भर गया है। मैं आपको दुनिया की सबसे प्राचीन संत परंपरा की तरफ से धन्यवाद देता हूं। मैं दुनिया की सबसे पुरानी संत परंपरा और सभी धर्मों की जननी की तरफ से धन्यवाद देता हूं। सभी जातियों और संप्रदायों के लाखों करोड़ों हिंदुओं की तरफ से आपका आभार व्यक्त करता हूं। मैं इस मंच पर बोलने वाले कुछ वक्ताओं का भी धन्यवाद करना चाहता हूं जिन्होंने यह जाहिर किया कि दुनिया में सहिष्णुता का विचार पूरब के देशों से फैला है। मुझे गर्व है कि मैं उस धर्म से हूं जिसने दुनिया को सहिष्णुता और सार्वभौमिक स्वीकृति का पाठ पढ़ाया है। हम सिर्फ सार्वभौमिक सहिष्णुता पर ही विश्वास नहीं करते बल्कि हम सभी धर्मों को सच के रूप में स्वीकार करते हैं।
मुझे गर्व है कि मैं उस देश से हूं जिसने सभी धर्मों और सभी देशों के सताए गए लोगों को अपने यहां शरण दी। मुझे गर्व है कि हमने अपने दिल में इसराइल की वो पवित्र यादें संजो रखी हैं जिनमें उनके धर्मस्थलों को रोमन हमलावरों ने तहस नहस कर दिया था और फिर उन्होंने दक्षिण भारत में शरण ली। मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूं जिसने पारसी धर्म के लोगों को शरण दी और लगातार अब भी उनकी मदद कर रहा है। मैं इस मौके पर वो श्लोक सुनाना चाहता हूं जो मैंने बचपन से याद किया, जिसे रोज करोड़ो लोग दोहराते हैं। जिस तरह अलग अलग जगहों से निकली नदियां अलग अलग रास्तों से होकर आखिरकार समुद्र में मिल जाती हैं, ठीक उसी तरह मनुष्य अपनी इच्छा से अलग अलग रास्ते चुनता है। ये रास्ते देखने में भले ही अलग अलग लगते हैं, लेकिन ये सब ईश्वर तक ही जाते हैं।
मौजूदा सम्मेलन जो कि आज तक की सबसे पवित्र सभाओं में से है, वह अपने आप में गीता में कहे गए इस उपदेश का प्रमाण है। जो भी मुझ तक आता है, चाहे कैसा भी हो मैं उस तक पहुंचाता हूं। लोग अलग अलग रास्ते चुनते हैं, अलग अलग परेशानियां झेलते हैं, लेकिन आखिर में मुझ तक पहुंचते हैं।
रुचिनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषाम नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव। यह श्लोक बोलते हुए स्वामी जी ने समझाने की कोशिश की सांप्रदायिकताएं, कट्टरताएं और इसके भयानक वंशज हठधमिर्ता लंबे समय से पृथ्वी को अपने शिकंजों में जकड़े हुए हैं। उन्होंने पृथ्वी को हिंसा से भर दिया है। कितनी बार ही यह धरती खून से लाल हुई है। कितनी ही सभ्यताओं का तबाह हुई हैं और न जाने कितने देश मिट गए हैं।
अगर ये भयानक राक्षस नहीं होते तो आज मानव समाज कहीं ज्यादा उन्नत होता, लेकिन अब उनका समय पूरा हो चुका है। मुझे पूरी उम्मीद है कि आज इस सम्मेलन का शंखनाद सभी हठधर्मिताओं, हर तरह के क्लेश, चाहे वे तलवार से हों या कलम से और सभी मनुष्यों के बीच की दुर्भावनाओं का विनाश करेगा।
Chicago Speech Of Swami Vivekananda
बता दें इस दौरान भारत देश गुलामी की जंजीरों में जकड़ा था। तब स्वामी विवेकानंद ने भारत की प्राचीन सभ्यता, संस्कृति, विरासत, अध्यात्म और वैभवशाली इतिहास को विदेश की धरती पर गर्व के साथ बताया था।