EK Baras Beet Gaya: एक बरस बीत गया
झुलासाता जेठ मास
शरद चाँदनी उदास
सिसकी भरते सावन का
अंतर्घट रीत गया
एक बरस बीत गया
सीकचों मे सिमटा जग
किंतु विकल प्राण विहग
धरती से अम्बर तक
गूंज मुक्ति गीत गया
एक बरस बीत गया
पथ निहारते नयन
गिनते दिन पल छिन
लौट कभी आएगा
मन का जो मीत गया
एक बरस बीत गया।
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पूर्व प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी (Atal Bihari Vajpayee) द्वारा रचित कविता 'एक बरस बीत गया' उन्हें स्वयं बहुत प्रिय थी। वह अक्सर अपने प्रियजनों के साथ कविता पाठ करते तो ये कविता जरूर सुनाते थे। आज यह कविता जनमानस में खास लोकप्रिय है और काफी सुनी जाती है। नए साल के अवसर पर तो इस कविता की डिमांड काफी हो जाया करती है।
