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Womens Day 2025: कितना और संघर्ष? 'समान अधिकार' के सांचे में कब फिट होंगी महिलाएं...

  • Agency by: Agency
  • Updated Mar 8, 2025, 08:24 PM IST

Womens Day 2025: यदि समाज को मातृ या पितृसत्तात्मक होने के बजाय हम निरपेक्ष होकर सोचे तो एक बेहतर समाज की संरचना तैयार कर सकते है। और तब सही मायनों में पुरुष-स्त्री समान रूप से सशक्त हो पाएंगे।

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महिला दिवस 2025

Womens Day 2025: भारत के विकास में हमारी भारतीय नारियों का महत्वपू्र्ण योगदान रहा है। चाहे वह देश की आजादी में दिया गया योगदान हो, या फिर महिला किसान के रूप में हो या फिर आसमान में उड़ान भरने से लेकर, संसद के अंदर तक का सफर हो। भारतीय महिलाओं ने देश ही नहीं बल्कि, विदेशों में भी अपना डंका बजाया। हालांकि, यह माना जाता है कि किसी भी देश को विकसित बनाने के लिए वहां की नारियों को सशक्त और आत्मनिर्भर बनाना जरूरी होता है। क्योंकि महिलाएं पुरुषों के सापेक्ष विकास की आधारशिला रखती हैं। इनके विकास से हमारी देश की पीढ़ियां बेहतर से बेहतरीन की ओर अग्रसर करती हैं। महिलाओं को त्यागमयी, ममतामयी और सहनशक्ति की मूर्त कहा जाता है, लेकिन भारतीय समाज की महिलाओं ने कुरीतियों और कुप्रथाओं का दंश झेला। चाहे वह स्वास्थ्य, आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक सभी क्षेत्रों में हो, उन्हें पितृसत्तामक समाज उपेक्षित होना पड़ा। इन्हें पितृसत्ता के चलते कम आंका गया। वर्तमान समय में महिलाओं ने फिर से आसमान की बुलंदियों तक पहुंचकर खुद को साबित किया है। उनके लगातार प्रयासों ने देश-विदेश में परचम लहराया है।

लेकिन इसके इतर हम देखते है कि बीते कुछ सालों में महिलाओं के साथ हो रहे दुव्यवहार, लिंग भेदभाव, छेड़छाड़, रेप, घरेलू हिंसा, भ्रूण हत्या, वैश्यवृत्ति, मानव तस्करी, शोषण, दहेज के कारण हो रही हत्याएं भी उनके विकास को चुनौती दे रही हैं। हालांकि, सरकार ने महिलाओं के साथ हो रही घटनाओं को लेकर कड़े कदम उठाए हैं, इसके बावजूद सच्चाई बिल्कुल अलग है।

हम आज 21 वीं शताब्दी में रह रहे हैं, लेकिन महिलाओं की स्थिति में खासा सुधार नहीं ला सके। भारत विभिन्न संस्कृतियों का संगम माना जाता है। स्त्री हर संस्कृति के केंद्र में होकर भी केंद्र से दूर है क्योंकि समाज उन्हें अपने अनुसार ढालता आया है। स्त्री के सोचने से लेकर उसकी व्यक्तिगत जीवन जीने के ढंग को पुरुष आज भी नियंत्रित कर रहा है। पितृसत्तात्मक समाज पर जब जब उनके सशक्तिकरण और आत्मनिर्भर होने का सवाल खड़ा होता है। तब तब समाज ही उस कठघरे में खड़ा पाया जाता है। समाज में आज भी महिलाओं की स्थिति में सुधार लाने के लिए संघर्ष जारी है।

भारत क्या समूचा विश्व पितृसत्तात्मक समाज के ढांचे से चलता आया है। वर्तमान स्थिति को देखते हुए यह कह देने मात्र से काम नहीं चलेगा कि महिलाएं अब आत्मनिर्भर के साथ अबला से सबला हो चुकी हैं। पुरुषों के बराबर कंधों से कंधा मिलाकर बड़ी-बड़ी कंपनियों में काम कर रही हैं। देश हो या विदेश उन्हें आगे बढ़ने व पुरुषों के बराबर सभी अधिकार दिए गए हैं। जबकि स्त्रियों को काम को लेकर बड़े-बड़े ऑफिसों में उन्हें कम आका जाता है। उनके वेतन में काफी अंतर पाया जाता है। यदि समाज को मातृ या पितृसत्तात्मक होने के बजाय हम निरपेक्ष होकर सोचे तो एक बेहतर समाज की संरचना तैयार कर सकते हैं और तब सही मायनों में पुरुष-स्त्री समान रूप से सशक्त हो पाएंगे।

क्या सच में महिलाएं हो पाई हैं सशक्त?

पूरे विश्व में हर साल 8 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है। इस साल की थीम “Accelerate Action” है। यहां बात सिर्फ महिला दिवस को लेकर नहीं हो रही है बल्कि, भारत में स्त्री के सशक्त होने का आशय केवल घर से बाहर निकल कर नौकरी करना या पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करना भर नहीं है। सशक्त होने का आशय यह है कि क्या वे खुद से निर्णय लेने की क्षमता रखती हैं, कहीं वे किसी और पर निर्भर तो नहीं है? आर्थिक, स्वास्थ्य, सामाजिक, लिंग भेदभाव न हो इसलिए उनका सशक्त होना बहुत आवश्यक है।

राजनीति में अभी भी पुरुषों का दबदबा

भारत व समूचे विश्व के इतिहास से लेकर वर्तमान में पुरुषों का राजनीति क्षेत्र में दबदबा रहा है, जबकि महिलाएं घरेलू काम काज, परिवार को संभालना, खेतों में काम करना, बच्चों की देखभाल करना ही उनका प्रथम कार्य रहा है। आज भी पितृसत्तात्मक की परंपरा चली आ रही है।

राजनीति में महिलाओं की स्थिति

हमारे देश की 17वीं लोकसभा के कुल 542 सांसदों में से केवल 78 महिला सांसद हैं। चुनाव लड़ने वाली 716 महिला उम्मीदवारों में से 78 निर्वाचित हुई हैं, जो सदन का 14% प्रतिशत के आसपास है। भारत के 28 राज्यों में केवल दो महिला मुख्यमंत्री हैं। और वर्तमान की राष्ट्रपति केवल दूसरी महिला हैं, जबकि प्रधानमंत्री पद पर केवल एक महिला ही रही हैं। इससे पता लगता है कि आखिर हकीकत क्या है?

महिलाओं की आर्थिक रूप से निर्भरता

किसी भी देश को आर्थिक रूप से मजबूत होना है तो हमें महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाना होगा जो पूरे भविष्य को तय करेगा । यदि वह खुद निर्णय ले सकती है तो वह सही मायने में आजाद है। पिछले कई दशकों में महिलायें काम करने के लिए बाहर नहीं जाया करती थीं, इसलिए वे आर्थिक रूप से स्वतंत्र नहीं थी। पैसे के लिए वे अपने पिता, भाई, पति या बेटों पर निर्भर रहा करती थीं, लेकिन आज बदलते दौर में उनकी स्थिति में भी बदलाव लाया जा रहा है। महिलायें घरों से बाहर निकलकर, अच्छी शिक्षा ग्रहण करके सभी क्षेत्रों में पुरुषों के बराबर वेतन पर नौकरियां कर रही हैं, लेकिन कहीं-कहीं पर उन्हें आज भी भेद-भाव का सामना करना पड़ता है।

खेलकूद जगत में महिलाओं की स्थिति

खेलकूद की दुनिया में भी महिलाओं की पिछले कई सालों के मुकाबले हर साल भागीदारी बढ़ती जा रही है। खेलों में इनकी भागीदारी को बढ़ाने के लिए अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति (IOC) ने कई पहल की हैं। खेल के विभिन्न क्षेत्रों में भी महिलाओं का बोलबाला है। चाहे वह मुक्केबाज महिला खिलाड़ी मैरीकॉम हों, ढिंग एक्सप्रेस के नाम से मशहूर हिमा दास हों, टेनिस खिलाड़ी सनिया मिर्जा, बैडमिटन प्लेयर साइना नेहवाल हों। इसके अलावा कुश्ती खेल से साक्षी मलिक, गीता फोगाट, बबीता फोगाट और विनेश फोगाट ने देश दुनिया में भारत का सिर ऊंचा किया है, लेकिन महिला खिलाड़ी लंबे समय तक खेल की दुनिया में नहीं रह पाती हैं। कहीं न कहीं समाज की रूढ़िवादी सोच, लिंग भेदभाव, पहनावा, महिला एथलीटों को मातृत्व और खेल करियर के बीच संतुलन स्थापित बनाए रखने की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। देश ही नहीं दुनिया भर में पुरूष खिलाड़ियों को महिला खिलाड़ियों से ज्यादा वेतन दिया जाता है। यह अंतर कई खेलों में देखा जाता है। कई खेलों में जैसे बास्केटबॉल, गोल्फ़, फ़ुटबॉल, बेसबॉल, और टेनिस में पुरुष खिलाड़ी महिला खिलाड़ियों से 15% से लेकर लगभग 100% तक ज़्यादा कमाते हैं। भारत में पुरुष और महिला क्रिकेटरों के वेतन में 14 गुना अंतर है। हालांकि भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) की 'पे इक्विटी पॉलिसी' की घोषणा के मुताबिक, केंद्रीय अनुबंधित पुरुष और महिला खिलाड़ियों को मैच में समान फ़ीस दी जाएगी।

सिनेमा की चकाचौंध का सच

सिनेमा जगत की चमचमाती दुनिया में महिलाओं ने नाम रोशन किया है। भारतीय सिनेमा में महिला की स्थिति में सुधार आया है। महिलाओं को मजबूत और स्वतंत्र किरदारों में दिखाया जाता है। 'पीकू', 'क्वीन', 'मर्दानी', और 'नीरजा' जैसी फ़िल्मों में महिलाओं के मज़बूत किरदार को दिखाया गया हैं। महिलाओं के मुद्दों को टीवी स्क्रीन पर दिखाने वाली महिला फ़िल्म निर्माताओं और लेखकों की भूमिका बढ़ी है, लेकिन पर्दे के पीछे का सच कुछ और ही बयां करता है। नयी सदी हो या पुरानी सदी इनमें नवयुवतियों का फिल्म जगत में काफी शोषण होता है। उन्हें कास्टिंग काउच का शिकार होना पड़ता है। भारतीय सिनेमा में महिलाओं का सम्मान, हक और मजबूत शख्सियत के रूप में दर्शाया जाता है। परंतु पर्दे के पीछे की हकीकत बिल्कुल उलट है महिला का सम्मान व हक का उतना ख्याल नहीं रखा जाता है। जितना हमें दिखाया जाता है। पूरी फिल्म इंडस्ट्री में पुरुष अभिनेता की फीस की तुलना में महिला अभिनेत्री की फीस में काफी अंतर देखा जा सकता है। ऐसी असमानताएं आज भी बरकरार है। जिसे दूर किया जाना चाहिए। फिल्म प्रोड्यूसर, डायरेक्टर, राइटर्स जैसी जगहों पर महिलाओं की संख्या कम रही है। केवल पुरूषों का ही वर्चस्व है। जो कि पितृसत्ता को दर्शाता है।

महिलाओं को लेकर बढ़ी घटनाएं

देश-दुनिया में महिलाओं को लेकर आपराधिक घटनाएं काफी बढ़ी हैं। भारत में भी महिला अपराध को लेकर संख्या लगातार बढ़ रही है। दुष्कर्म, दहेज़ उत्पीड़न, यौन उत्पीड़न, छेड़छाड़, अपहरण, देह व्यापार, भ्रूण हत्याएं शामिल हैं। दिल्ली में 16 दिसंबर 2012 की वो रात दिल्लीवासियों को आज भी याद है कि कैसे एक छात्रा के साथ चलती बस में दरिंदगी की गई थी। जिसे 'निर्भया' केस कहा गया । दोषियों को भले ही चाहे फांसी की सजा हो चुकी है, लेकिन यह हमारे समाज पर कंलक बना हुआ है। पुरूष महिला को सिर्फ काम वासना की वस्तु समझता है। स्कूलों, सड़क किनारे शोहदों द्वारा छेड़छाड़ से परेशान लड़कियों का जान गंवाना, मानव तस्करी और अपहरण कर छोटी बच्चियों को वैश्यावृत्ति की ओर झोंक देना हमारे समाज को आईना दिखाती है। गूगल सर्च के द्वारा महिला अपराधिक मामलों की जानकारी दी है कि साल 2022 में महिलाओं के ख़िलाफ़ 4,45,256 मुकदमें दर्ज किए गए थे। पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता से जलाकर मार देने, मानसिक प्रताड़ना के केस सबसे ज़्यादा थे। अपहरण के मामले भी दूसरे नंबर पर थे। लज्जा भंग करने के इरादे से किए गए हमले तीसरे नंबर पर थे। दुष्कर्म के मामले चौथे नंबर पर थे। युवतियों व लड़कियों को ब्लैकमेल करने जैसे साइबर अपराध भी शामिल हैं। हालांकि, भारत सरकार भी महिला सुरक्षा को लेकर कड़े कदम उठा रही है।

महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराधिक मामलों से निपटने के लिए कानून बनाए गए है। निजी क्षेत्र में कार्यरत महिला से अनैतिक व्यापार (रोकथाम) अधिनियम, 1956, दहेज निषेध अधिनियम, 1961, घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005, कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013, महिलाओं का अश्लील चित्रण (निषेध) अधिनियम, 1986 आदि कानून शामिल है। लेकिन वे कदम उतने कारगर साबित होते दिखाई नहीं दे रहे है।

हमारे भारतीय समाज को महिला की स्थिति में बदलाव लाने के लिए कई अहम कदम उठाने होंगे जिससे महिला खुद को कमजोर न महसूस कर सके। महिला को असल रूप में सशक्त और मजबूत बनाना होगा। जिससे वह समाज में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे सकें। वे हर क्षेत्र में बेहतरीन प्रदर्शन कर सके। उन्हें सिर्फ घर के कामकाज, परिवार को संभालना, घर की चाहरदीवारी के अंदर रखना, जल्दी विवाह कराने जैसी रूढ़िवादी सोच से बाहर निकलना होगा। भारत में महिलाओं का वैदिक काल में सम्मान और उच्च स्थान प्राप्त हुआ करता था। उन्हें पुरुषों के बीच सभाओं में बैठने का बराबर अधिकार प्राप्त हुआ करता था। शिक्षा भी प्राप्त करने का अधिकार था।

उपरोक्त आर्टिकल में दिए आंकड़े व मत लेखिका वर्तिका चंद्रा के हैं...टाइम्स नाउ नवभारत दिए गए तथ्यों के लिए बाध्य नहीं है।

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