शनिवार का दिन। शाम का समय। घर के सामने ही बाजार सजा है। एक तरफ सब्जी वाले आवाज दे कर लोगों को बुला रहे हैं... प्यार 50 रुपये का ढाई किलो, आलू 50 की तीन किलो, आम 100 रुपये किलो। दूसरी तरफ कॉस्मैटिक्स वाला 20 रुपये का हर सामान बताकर लोगों को अपनी तरफ आकर्षित कर रहा है। 150 रुपये में लेडीज सूट, 100 रुपये की टीशर्ट और कहीं पर कप-प्लेट और अन्य बर्तन बेचने वाला। आपके इलाके में भी साप्ताहिक बाजार का यही मंजर होता होगा। फिर चाहे वह सोमवार को लगे या बुधवार, गुरुवार या शनिवार। हमारे यहां शनिवार को लगता है, इसलिए वहां का जिक्र कर रहा हूं।
बाजार में सजी हर दुकान पर बैटरी से जलता बल्ब ग्राहकों को अपनी ओर आकर्षित करता है। रात के अंधेरे में दुकानों की दुधिया रोशनी में आंखें चौंधिया जाती हैं। फिर सामान भी आंखें चौंधियाने वाला ही होता है। आप और हम अपनी जरूरत का सामान लेते हैं और घर चले जाते हैं। देर रात तक सामान बेचने वाले भी दुकान समेटकर अपने-अपने घरों की ओर लौट जाते हैं। क्या कभी आप दूसरे दिन सुबह उसी जगह गए हैं, जहां कल रात आपने आंखें चौंधिया देने वाली रोशनी में शॉपिंग की थी। नजारा देखकर आप घिना जाएंगे। जी हां यहां दी गई तस्वीरें सच्चाई हैं उस साप्ताहिक बाजार के अगले दिन की सुबह की।

साप्ताहिक बाजार के बाद सड़क पर बिखरा कूड़ा
खाली हो चुके सब्जियों के बोरे जहां-तहां बिखरे रहते हैं। प्याज और अन्य सब्जियों के छिलके पूरी सड़क को घेरे रखते हैं। वो कपड़े जो आपने कल रात खरीदे थे और अब आपके वार्डरॉब की शान बढ़ा रहे हैं, उनकी रैपिंग पॉलिथिन सड़क पर हवा के साथ, यहां-वहां उड़ रही हैं।
जगह-जगह अखबार के पन्ने बिखरे हैं। कुल मिलाकर जो जगह कल रात चमक बिखेर रही थी, वह सुबह होते-होते किसी बड़े डम्पिंग यार्ड जैसी प्रतीत होती है। कहीं सड़ी-गली सब्जियां बिखरी हैं, जिनकी तरफ गौमाता और कुत्ते दौड़े चले आए हैं। सड़-गली सब्जियों के साथ पॉलिथिन भी गाय की पेट में जा रही हैं। सबसे दयनीय स्थिति तो उन घरों की है, जिनके आगे रात की वह मार्केट सजी थी। रात के अंधेरे में ऊपर से देखने पर बल्बों की टिमटिमाहट भले अच्छी लग रही हो, लेकिन सुबह के उजाले में यह हकीकत मुंह चिढ़ा रही है। घर के आगे कूड़े का ढेर गुड मॉर्निंग को गुड जैसा फील करने नहीं दे रहा।

साप्ताहिक बाजार के कूड़े में खाना ढूंढती गाय
निगम हो या अथॉरिटी, आपके क्षेत्र में साफ-सफाई की जिसकी भी जिम्मेदारी है... उन्हें शायद यह गंदगी दिखाई नहीं देती। आप साप्ताहिक बाजार लगाने की अनुमति तो दे देते हैं, लेकिन सुबह-सुबह या जिस दिन बाजार लगता है, उसी देर रात सफाई भी आपकी जिम्मेदारी है। ताकि सुबह भी घर के सामने की सड़क देखने में अच्छी लगे, न कि किसी डम्पिंग यार्ड जैसी। निश्चित तौर पर इस सबके लिए अथॉरिटी या निगम ही जिम्मेदार है। साथ ही हम सब भी जिम्मेदार हैं, जो गंदगी फैलाने के बावजूद ऐसे बाजारों का विरोध नहीं करते, उन्हें बंद कराने के लिए सड़क पर नहीं उतरते।
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