साई यूनिवर्सिटी, एक स्थानीय तमिलनाडु-आधारित फूड सर्विस वेंडर के बकाया भुगतान से जुड़े विवाद को लेकर न्यायिक जांच के दायरे में आ गई है। मद्रास हाईकोर्ट ने निर्देश दिया है कि इस मामले में मध्यस्थता की प्रक्रिया आगे बढ़ने से पहले विश्वविद्यालय को बैंक गारंटी देनी होगी। यह विवाद छात्रों को उपलब्ध कराए गए भोजन के भुगतान से संबंधित है।
'छात्रों से पैसे लिए, लेकिन भुगतान नहीं किया'
अदालती कार्यवाही के अनुसार, वेंडर ने दावा किया कि छात्रों से भोजन शुल्क वसूले जाने के बावजूद कई महीनों से उसका भुगतान बकाया है। मामले का संज्ञान लेते हुए हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि विवादित राशि को सुरक्षित करने के लिए विश्वविद्यालय द्वारा बैंक गारंटी दिए जाने के बाद ही मध्यस्थता की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।
विश्वविद्यालय ने मौजूदा कैटरिंग अनुबंध को समाप्त कर दिया गया और बताया जाता है कि फूड सर्विस का काम ब्रिटिश बहुराष्ट्रीय फूड सर्विस कंपनी कम्पास ग्रुप को दे दिया गया। इस मामले की चर्चा फूड सर्विस इंडस्ट्री में भी हुई है, जहां स्थानीय सप्लायर्स पर भुगतान में देरी के कारण पड़ने वाले वित्तीय दबाव को लेकर चिंताएं जताई गई हैं। रिपोर्टों के मुताबिक, कुछ वेंडर्स और लॉजिस्टिक्स सेवा प्रदाताओं ने पहले भी कथित भुगतान में देरी को लेकर विरोध जताया था। इस मामले पर विश्वविद्यालय के प्रतिनिधियों से प्रतिक्रिया के लिए संपर्क नहीं हो सका।
विवादों में रहा है विश्वविद्यालय प्रशासन
इस मामले ने विश्वविद्यालय की प्रशासनिक और गवर्नेंस व्यवस्था को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े किए हैं। इससे पहले भी विश्वविद्यालय भूमि अधिग्रहण से जुड़े मुद्दों को लेकर विवादों में रहा है। ताजा अदालती कार्यवाही से संकेत मिलता है कि संस्थान के प्रशासन और गवर्नेंस से जुड़े विषय लगातार सार्वजनिक और न्यायिक निगरानी का विषय बने हुए हैं।
गवर्नेंस फिर सवालों के घेरे में
इस मामले ने भारत के उच्च शिक्षा क्षेत्र में गवर्नेंस के मानकों के महत्व को एक बार फिर रेखांकित किया है। विश्वविद्यालयों से पारदर्शिता, वित्तीय अनुशासन और नैतिक आचरण के उच्चतम मानकों का पालन करने की अपेक्षा की जाती है, क्योंकि छात्रों, अभिभावकों, कर्मचारियों और व्यावसायिक साझेदारों का उन पर भरोसा होता है।
भारत जब वैश्विक स्तर पर सम्मानित शैक्षणिक संस्थान तैयार करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब अकादमिक उत्कृष्टता के साथ-साथ सुशासन को भी उतना ही महत्व दिया जाना आवश्यक है। अनुबंध से जुड़े दायित्वों का समय पर निर्वहन, जिम्मेदार वित्तीय प्रबंधन और संस्थागत जवाबदेही देश की शिक्षा व्यवस्था में विश्वास बनाए रखने के लिए जरूरी हैं।
