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कितनी खतरनाक हो गई है दिल्ली की आबोहवा? ताजा सर्वे आपको चौंका देगा

दिल्ली में वर्ष में केवल तीन प्रतिशत घंटे ही सेहत के लिए सुरक्षित स्वच्छ वायु और सुहाने मौसम वाले होते हैं। एक नए अध्ययन में यह खुलासा हुआ है।

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दिल्ली में वर्ष में केवल तीन प्रतिशत घंटे ही सेहत के लिए सुरक्षित स्वच्छ वायु और सुहाने मौसम वाले होते हैं।

नई दिल्ली: दिल्ली में वर्ष में केवल तीन प्रतिशत घंटे ही सेहत के लिए सुरक्षित स्वच्छ वायु और सुहाने मौसम वाले होते हैं। एक नए अध्ययन में यह खुलासा हुआ है।सीईपीटी विश्वविद्यालय और एक जलवायु-प्रौद्योगिकी कंपनी द्वारा किए गए अध्ययन के मुताबिक दिल्ली में लगभग 2,210 तापीय रूप से आरामदायक घंटे दर्ज किए गए हैं, जिनमें बाहरी तापमान 18 डिग्री सेल्सियस से 31 डिग्री सेल्सियस के बीच था।

अध्ययन के मुताबिक 1,951 घंटे खराब वायु गुणवत्ता (वायु गुणवत्ता सूचकांक 150 से ऊपर) के भी होते हैं। इस प्रकार वर्ष में केवल 259 घंटे ही बचते हैं, जो लगभग तीन प्रतिशत है, जब दिल्लीवासी स्वच्छ वायु और सुखद तापमान दोनों का आनंद ले सकते हैं।‘इंटरनेशनल सोसाइटी ऑफ इंडोर एयर क्वालिटी’ के आठ जून को आयोजित ‘हेल्दी बिल्डिंग 2025’ सम्मेलन में प्रस्तुत अध्ययन रिपोर्ट में कहा गया कि गर्मी और वायु प्रदूषण का एक साथ होना सुरक्षित प्राकृतिक आबोहवा के अवसरों को गंभीर रूप से सीमित कर देता है।

दिल्ली से बेहतर आबोहवा बेंगलुरु का

अध्ययन के मुताबिक दिल्ली की तुलना में, बेंगलुरु में 8,100 घंटे से ज्यादा समय स्वीकार्य वायु गुणवत्ता और सुखद तापमान की स्थिति रही। अहमदाबाद में गर्मी होने के बावजूद बाहरी परिस्थितियां ज्यादा अनुकूल रहीं।हालांकि, दिल्ली की तरह चेन्नई में भी 88 प्रतिशत आरामदायक घंटे खराब वायु गुणवत्ता के कारण प्रभावित हुए।

गर्मी और प्रदूषण आबोहवा पर असर डाल रहा

अनुसंधानकर्ताओं ने कहा कि अध्ययन से खुलासा होता है कि गर्मी और प्रदूषण का अभिसरण भारतीय महानगरों में व्यापक होता जा रहा है।

उन्होंने कहा कि पारंपरिक भवन निर्माण कार्य, चाहे पूरी तरह से सीलबंद वातानुकूलित स्थानों पर आधारित हो या बिना फिल्टर वाले प्राकृतिक वेंटिलेशन पर आधारित हो, अब शहरी भारत की जरूरतों को पूरा नहीं कर पाते।इस चुनौती से निपटने के लिए अध्ययन में भारतीय भवनों में वैयक्तिक पर्यावरण नियंत्रण प्रणालियों (पीईसीएस) को मुख्यधारा में लाने की सिफारिश की गई है।

ये प्रणालियां हवा के संचरण को नियंत्रित करती हैं और स्थानीय स्तर पर आदर्श तापमान बनाए रखती हैं तथा विशेष रूप से मिश्रित-मोड वाली इमारतों में उपयोगी होती हैं, जो दिन के समय, मौसम या प्रदूषण के स्तर के आधार पर प्राकृतिक और यांत्रिक हवा निकासी के बीच बदलाव करती हैं। अनुसंधानकर्ताओं द्वारा तैयार ‘मॉडल’ में पाया गया कि पीईसीएस पारंपरिक वातानुकूलित व्यवस्थाओं की तुलना में चेन्नई में वेंटिलेशन के लिए उपयोग की जाने वाली ऊर्जा में 72 प्रतिशत, अहमदाबाद में 70 प्रतिशत और दिल्ली में 68 प्रतिशत तक की बचत कर सकताी हैं। (भाषा)

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Sanjeev Dubey
संजीव कुमार दुबेauthor

पत्रकारिता में मेरे सफर की शुरुआत 20 साल पहले हुई। 2002 अक्टूबर में टीवी की रुपहले दुनिया में दाखिल हुआ। शुरुआत टीवी की दुनिया के उस पहलू से हुई जहां हर खबर को उसके मुताबिक आकार दिया जाता है यानी उसे कसा जाता है। सहारा टीवी में मेरे कामकाज की शुरुआत पैकेजिंग से हुई जहां खबरों को अलग-अलग प्रारूपों में गढ़ने का काम होता है। फिर पीसीआर में आउटपुट एडिटर की भूमिका निभाने का मौका मिला जहां तुरंत निर्णय कर खबरों को ब्रेक करने की चुनौती रहती है। न्यूजरूम की गहमागमी के बीच रनडाउन तैयार करने की जिम्मेदारी भी बखूबी निभाई। यहां ब्रेकिंग, हार्ड कोर की खबरों और फीचर्ड प्रोग्रामिंग ने मेरे अनुभव का दायरा तो बढ़ाया ही उसमें गहराई एवं पैनापन भी दिया। 2011 में टेलिविजन न्यूज की दुनिया को अलविदा कहना पड़ा। अक्टूबर 2011 में Zee News की हिंदी वेबसाइट को अपनी अगवुाई में लॉन्च करने का मौका मिला। डिजिटल की दुनिया और टीवी की दुनिया में खबरें परोसने और खबरों को दिखाने का अंदाज बिल्कुल अलग था। मैं उस दौर में दस्तक दे चुका था जब टीवी भी स्मार्टफोन पर देखा जाने लगा था। डिजिटल पर भी ब्रेकिंग थी। अगर टीवी में प्रोग्रामिंग थी तो यहां भी बतौर फीचर, सॉफ्ट स्टोरीज का विशाल संसार था। एक नया मीडियम जो स्मार्टफोन पर बखूबी देखा और समझा जा सकता था। डिजिटल की इस दुनिया में टीवी और अखबार दोनों समाहित थे। यहां काम करते हुए डिजिटल न्यूज मीडिया की बारीकियां तो सीखी हीं। साथ ही जब जी न्यूज से विदाई ली तो उस समय 33 मिलियन यूजर्स के बीच 84 मिलियन पीवीज देखने की अपार खुशियां हासिल हुईं। जी न्यूज में एक लंबी पारी खेलने के बाद जुलाई 2017 में टाइम्स नाउ नेटवर्क से जुड़ने का अवसर मिला। 2017 में ही टाइम्स नाउ की हिंदी वेबसाइट की शुरुआत हुई। यह पहला मौका था जब टाइम्स नाउ की अगुवाई में कोई हिंदी न्यूज वेबसाइट लॉन्च हुई। यहां एक नई और युवा टीम बनी। यह टीम आक्रामक अंदाज में काम करते हुए कम समय में अपनी पहचान बनाई। डिजिटल की दुनिया के बदलते संसार में अब चुनौती पीवीज की नहीं बल्कि यूजर्स की थी, जिन्हें लाना इतना आसान नहीं थी। लेकिन टीम के जज्बे, हौसले ने असाधारण चुनौतियों को भी अपनी मेहनत एवं लगन से उसे सामान्य बनाया। डिजिटल न्यूज की दुनिया में हर पल चुनौतियों के बीच नया कुछ सीखने-समझने और कुछ कर गुजरने की प्रेरणा मिलती है। यह सिलसिला आज भी अनवरत जारी है-

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