नई दिल्ली : अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर 'स्त्री एवं मानसिक स्वास्थ्य' विषय पर एक परिचर्चा का आयोजन हुआ। इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित इस परिचर्चा का आयोजन भारत डॉयलॉग्स की ओर से किया गया। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंसेज (निमहैंस) की निदेशक डॉ प्रतिमा मूर्ति, सेंटर फॉर सोशल रिसर्च की निदेशक और मशहूर स्त्री अधिकार कार्यकर्ता डॉ रंजना कुमारी, दिल्ली के वरिष्ठ मनोचिकित्सकों डॉ. नीना बोहरा, डॉ. समीर पारिख, डॉ. जितेन्द्र नागपाल, डॉ. कामना छिब्बर सहित कई जानी-मानी हस्तियां इसमें शामिल हुईं।
स्त्री अधिकार एवं मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर व्यापक चर्चा हुई और साथ ही इस क्षेत्र में शानदार काम करने वाले कई महत्वपूर्ण हस्तियों एवं संस्थाओं को सम्मानित भी किया गया। इस कार्यक्रम में शिरकत कर रहे कई छात्र-छात्राओं ने अपनी मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी चुनौतियों और निजी अनुभवों पर भी खुलकर बात की।
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंसेज (निमहैंस) की निदेशक डॉ प्रतिमा मूर्ति ने कहा, 'भारतीय समाज में स्त्रियों का मानसिक स्वास्थ्य सुनिश्चित करने में उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थितियों की बहुत बड़ी भूमिका है। इसलिए नीति निर्माण के क्रम में हमें स्त्रियों के प्रति और संवदेशनशील होने और उन्हें चेंजमेकर की तरह देखने की जरूरत है। सिर्फ मेंटल एटीट्यूड ठीक रखने से मानसिक स्वास्थ्य बेहतर नहीं हो सकता, क्योंकि भारत जैसे देश में स्त्रियां अपने जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं के लिए पुरुषों पर निर्भर हैं और परिवार में उनकी जिम्मेदारी भी हर लिहाज से सबसे अधिक है। ऐसे में उनको सामाजिक और आर्थिक तौर पर सक्षम बनाना भी बेहद जरूरी है।'
सेंटर फॉर सोशल रिसर्च की निदेशक और प्रख्यात स्त्री अधिकार कार्यकर्ता डॉ. रंजना कुमारी ने भारतीय समाज में स्त्रियों और पुरुषों के बीच गैरबराबरी को उनके मानसिक स्वास्थ्य की बेहतरी की राह में रोड़ा बताया। उन्होंने कहा, 'भारतीय समाज में अगर बेटे को मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी कोई परेशानी है तो परिवार उसके इलाज के लिए कोशिश करता है, लेकिन अगर उसी परिवार में कोई बेटी उस स्थिति से गुजर रही है तो फिर उसके प्रति उनका बर्ताव पूरी तरह बदल जाता है। छोटे शहरों में हालात और खराब हैं। मुझे लगता है कि अब समय आ गया है कि औरतों को खुलकर कहना होगा कि वो मानसिक तौर पर ठीक नहीं हैं, लेकिन इसके लिए बहुत ज्यादा जागरुकता की जरूरत पड़ेगी।'
इस कार्यक्रम में मेंटल हेल्थ स्टार्टअप, देश के अलग-अलग हिस्सों में स्त्री अधिकार एवं मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करने वाले एनजीओ, कई कंपनियों के एचआर हेड के साथ-साथ दिल्ली विश्वविद्यालय के कई कॉलेज के छात्र-छात्राओं ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। इस आयोजन के बारे में बातचीत करते हुए भारत डॉयलॉग्स की को-फाउंडर पूजा प्रियंवदा ने कहा कि भारत में मानसिक स्वास्थ्य की चुनौतियां धीरे-धीरे विकराल रूप ले रही हैं और महिलाओं के लिए स्थिति खास तौर पर चिंताजनक है। बावजूद इसके पिछले कई दशकों में इस क्षेत्र में कोई खास प्रगति नहीं हुई है और इसकी एक वजह ये है कि मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम कर रहे तमाम लोगों के बीच सामंजस्य नहीं है। उन्होंने कहा, हमारी कोशिश थी कि मानसिक स्वास्थ्य की बेहतरी के लिए अलग-अलग स्तर पर काम कर रहे लोगों को एक मंच पर लाया जाए, ताकि उनके बीच परस्पर सहयोग की जमीन तैयार हो सके।
इस कार्यक्रम में मानसिक स्वास्थ्य और स्त्री अधिकार के क्षेत्र में काम कर रहे जिन कुछ व्यक्तियों एवं संस्थाओं को पुरस्कार देकर सम्मानित किया गया, उनमें सिजोफ्रेनिया अवेयरनेस एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष एवं रिहैब सेंटर के मैनेजिंग ट्रस्टी अमृत बख्शी शामिल हैं। उन्हें सिजोफ्रेनिया के बारे में जागरुकता फैलाने के लिए भारत डॉयलॉग्स लाइफ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार दिया गया। इसके अलावा बायपोलर डिसॉर्डर पर लिखी गई मशहूर किताब केमिकल खिचड़ी की लेखिका अपर्णा पीरामल राजे, पत्रकार उपेन्द्र राय, दिल्ली विश्वविद्यालय की पूर्व प्राध्यापिका डॉ इतिशा नागर, आरजे दिव्या वासुदेवा, हेल्थ जर्नलिस्ट नीतेन्द्र सिंह समेत कई संस्थाओं को भी स्त्री एवं मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए सम्मानित किया गया। इनमें सेफ्टी एप, मेन्स्ट्रूपीडिया, इंपैक्ट एंड डॉयलॉग फाऊंडेशन, प्रोत्साहन इंडिया, इस्लामिक रिसर्च फाउंडेशन, स्वयम् फाउंडेशन, काउंसेल इंडिया, रेड डॉट फाउंडेशन, विन्नी, संगति फाउंडेशन और मीडिया मंत्रा शामिल हैं।
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