Last Dynasty of Delhi Sultanate: दिल्ली सल्तनत (1206–1526 ई.) भारतीय उपमहाद्वीप में लगभग तीन शताब्दियों से अधिक समय तक अस्तित्व में रहने वाला एक प्रभावशाली इस्लामी शासन था। इस काल में गुलाम, खिलजी, तुगलक, सैय्यद और लोदी इन पांच वंशों ने क्रमशः सत्ता संभाली। इसकी नींव मुहम्मद गोरी के विश्वासपात्र और पूर्व दास कुतुबुद्दीन ऐबक ने रखी थी, जबकि इसका अंत बाबर द्वारा स्थापित मुगल साम्राज्य के उदय के साथ हुआ। इस सल्तनत ने उत्तर भारत के विस्तृत भूभाग को एक राजनीतिक इकाई में बाँधा और भारतीय-इस्लामी संस्कृति, प्रशासन तथा स्थापत्य कला के विकास को गति दी।
दिल्ली सल्तनत की प्रमुख विशेषताओं में एक सुदृढ़ और केंद्रीकृत शासन व्यवस्था शामिल थी, जिसमें इक़्ता प्रणाली के माध्यम से प्रशासन चलाया जाता था। एक संगठित एवं शक्तिशाली सेना इसकी रीढ़ थी। शासन की वैधानिक नींव इस्लामी कानून (शरीयत) पर आधारित थी, हालांकि व्यवहार में सीमित स्तर पर धार्मिक सहिष्णुता भी दिखाई देती है। सुल्तान सर्वोच्च शासक होता था, जिसे उलेमा और अमीर प्रशासनिक कार्यों में सहयोग प्रदान करते थे। यह राज्य मुख्यतः सैन्य शक्ति पर आधारित था और उस समय मंगोल आक्रमणों से पलायन कर आए अनेक विद्वानों व कलाकारों के लिए आश्रय स्थल भी बना। कुतुब मीनार और अलाई दरवाजा जैसी भव्य इमारतें इस काल की स्थापत्य उपलब्धियों का उत्कृष्ट उदाहरण हैं।

मुगल बादशाह बाबर (फोटो: Wikimedia Commons)
कौन था बाबर?
इतिहासकारों के अनुसार, बाबर (1526–1530 ई.) वंश परंपरा से एक प्रतिष्ठित पृष्ठभूमि से जुड़ा हुआ था। पिता की ओर से वह महान तुर्क विजेता तैमूर (तैमूरलंग) का वंशज था, जबकि उसकी माता की ओर से उसका संबंध मंगोल शासक चंगेज खान के दूसरे बेटे चगताई से जुड़ता था। बाबर के पिता उमर शेख मिर्जा हिंदूकुश पर्वतों के उत्तर में स्थित फरगाना नामक एक छोटी रियासत के शासक थे। वर्ष 1494 में, बहुत कम आयु में ही बाबर ने इस राज्य की गद्दी संभाली। कई संघर्षों और अभियानों के बाद अप्रैल 1526 तक उसने दिल्ली और आगरा पर अधिकार स्थापित कर लिया, जिससे हिंदुस्तान को जीतने का रास्ता उसके लिए खुल गया।
बाबर के आने से पहले कौन था दिल्ली का शासक?
बाबर के भारत आने से पहले दिल्ली की सत्ता लोदी वंश के हाथों में थी। तकरीबन 75 सालों तक चला लोदी वंश (1451–1526 ई.) दिल्ली सल्तनत का अंतिम राजवंश माना जाता है और इसकी उत्पत्ति अफगान समुदाय से हुई थी। इस वंश की स्थापना बहलूल लोदी ने की, जो 1451 से 1489 ई. तक शासक रहे। वे पंजाब क्षेत्र के एक अत्यंत प्रभावशाली सरदार थे और उन्होंने सैयद वंश के अंतिम शासक को हटाकर दिल्ली की गद्दी संभाली। बहलूल लोदी एक सक्षम और दृढ़ इच्छाशक्ति वाले शासक थे, जिनके नेतृत्व में अफगान और तुर्की सरदारों का अपेक्षाकृत बिखरा हुआ समूह एक संगठित सत्ता में परिवर्तित हो सका।
सिकंदर लोदी का शासन काल
शुरुआत में बहलूल लोदी का अधिकार क्षेत्र दिल्ली के आसपास के सीमित भूभाग तक ही सिमटा हुआ था, लेकिन समय के साथ उन्होंने अपने राज्य की सीमाओं का व्यापक विस्तार किया और उसे बंगाल की सीमा तक पहुंचा दिया। इस प्रक्रिया में मालवा और जौनपुर जैसे शक्तिशाली राज्यों पर विजय भी शामिल थी। दिल्ली पर दो बार घेराबंदी झेलने के बावजूद, अंततः 1479 ई. में बहलूल ने जौनपुर को पराजित कर उसके एक बड़े हिस्से पर अधिकार स्थापित कर लिया। उनके पश्चात उनके दूसरे बेटे सिकंदर लोदी (1489–1517 ई.) सत्ता में आए, जिन्होंने अपने पिता की विस्तारवादी नीति को आगे बढ़ाया।

पानीपत की पहली लड़ाई (फोटो: Wikimedia Commons)
पानीपत की पहली लड़ाई ने बदली सत्ता की तस्वीर
सिकंदर ने बिहार को अपने अधीन किया और आधुनिक आगरा नगर की नींव रखी, जिसे उस समय सिकंदराबाद कहा जाता था। हालांकि, लोदी शासकों के शासनकाल पर धार्मिक कठोरता का आरोप भी लगाया जाता है। सिकंदर लोदी के बाद उनके बड़े बेटे इब्राहिम लोदी (1517–1526 ई.) गद्दी पर बैठे, जिन्होंने केंद्रीय सत्ता को सुदृढ़ करने का प्रयास किया। लेकिन उनकी कठोर नीतियों और व्यवहार से असंतोष फैल गया। इसी असंतोष के कारण पंजाब के सूबेदार दौलत खान लोदी ने काबुल के मुगल शासक बाबर को भारत पर आक्रमण के लिए आमंत्रित किया। 21 अप्रैल 1526 को पानीपत के प्रथम युद्ध में इब्राहिम लोदी की मौत हो गई, और इसके साथ ही लोदी वंश का कमजोर तथा बिखरा हुआ कुलीन ढांचा पूरी तरह बिखर गया। यहीं से मुगल काल शुरु हुआ।
