हममें से लगभग हर किसी का बैंक में कोई न कोई खाता जरूर होता है, जिसमें सबसे आम सेविंग अकाउंट है। सेविंग अकाउंट आम लोगों और सैलरी पाने वाले कर्मचारियों के लिए बनाया गया है, ताकि वे अपनी गाढ़ी कमाई में से बचत कर सकें और जरूरत पड़ने पर उस पैसे का इस्तेमाल कर सकें। लेकिन कारोबारियों और व्यावसायिक कंपनियों के लिए यह खाता सही नहीं बैठता, क्योंकि उन्हें रोजाना बड़े-बड़े लेन-देन करने होते हैं। ऐसे व्यवसायियों, फर्मों और कंपनियों की बैंकिंग जरूरतों को पूरा करने के लिए बैंक 'करंट अकाउंट' (Current Account) की सुविधा देते हैं।
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के मुताबिक, करंट अकाउंट एक ऐसा बैंक खाता है जिसका मुख्य इस्तेमाल हाई-वैल्यू (बड़ी रकम) के ट्रांजैक्शन के लिए किया जाता है। इसमें खाताधारक को ज्यादा फंड ट्रांसफर करने और आम खातों के मुकाबले अधिक डेली लिमिट जैसी कई विशेष सुविधाएं मिलती हैं, जिससे बिजनेस का मनी मैनेजमेंट बेहद आसान हो जाता है।
सेविंग अकाउंट से कैसे अलग है करंट अकाउंट?
अगर सेविंग और करंट अकाउंट के अंतर को समझें, तो सेविंग अकाउंट व्यक्तिगत बचत और उस पर ब्याज कमाने के लिए होता है, जबकि करंट अकाउंट पूरी तरह से व्यावसायिक काम-काज के लिए डिज़ाइन किया गया है। सबसे बड़ा अंतर यह है कि करंट अकाउंट में जमा राशि पर बैंक कोई ब्याज नहीं देते हैं, लेकिन इसके बदले खाताधारकों को अनलिमिटेड (असीमित) ट्रांजैक्शन की आजादी मिलती है। इसके फायदों की बात करें, तो इस खाते में ओवरड्राफ्ट की सुविधा, अनलिमिटेड चेकबुक और आसान डिजिटल बैंकिंग जैसी सुविधाएं शामिल हैं।
यह खाता रोजाना के बिजनेस खर्चों को संभालने, सप्लायर्स को भुगतान करने और ग्राहकों से ऑनलाइन या ऑफलाइन पेमेंट स्वीकार करने के लिए बेहद उपयोगी माना जाता है। इस खाते को कोई भी इंडिविजुअल, एकल व्यवसायी (Sole Proprietor), अविभाजित हिंदू परिवार (HUF), पार्टनरशिप फर्म, प्राइवेट कंपनियां, एलएलपी (LLP), ट्रस्ट, को-ऑपरेटिव सोसाइटी और क्लब आसानी से खुलवा सकते हैं।
करंट अकाउंट में क्या है मिनिमम अमाउंट का नियम?
करंट अकाउंट में मिनिमम बैलेंस का नियम सेविंग अकाउंट से थोड़ा अलग और सख्त होता है। चूंकि यह खाता बड़े पैमाने पर लेन-देन के लिए इस्तेमाल होता है, इसलिए इसमें मिनिमम एवरेज बैलेंस (MAB) की सीमा भी सेविंग अकाउंट से काफी ज्यादा होती है। भारत के अलग-अलग प्रमुख बैंकों ने इसके लिए अलग-अलग सीमाएं तय की हैं। उदाहरण के तौर पर, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) और एक्सिस बैंक में अलग-अलग वेरिएंट्स के हिसाब से मिनिमम बैलेंस की लिमिट 5,000 रुपये से लेकर 50 लाख रुपये तक हो सकती है।
केनरा बैंक में यह 1,000 रुपये से 7,500 रुपये, पंजाब नेशनल बैंक (PNB) में 15,000 रुपये से 50,000 रुपये, आईसीआईसीआई (ICICI) बैंक में 5,000 रुपये से 5 लाख रुपये और एचडीएफसी (HDFC) बैंक में न्यूनतम 10,000 रुपये का बैलेंस मेंटेन करना अनिवार्य होता है। निर्धारित बैलेंस न रखने पर बैंक पेनाल्टी भी लगाते हैं।
कितने तरह के होते हैं करंट अकाउंट?
व्यवसाय की अलग-अलग जरूरतों को ध्यान में रखते हुए करंट अकाउंट कई प्रकार के होते हैं। इनमें एकल व्यापारियों के लिए 'इंडिविजुअल', कंपनियों के लिए 'नॉन-इंडिविजुअल', सामान्य कामकाज के लिए 'स्टैंडर्ड', अधिक सुविधाएं देने वाला 'प्रीमियम', स्टार्टअप्स के लिए विशेष लाभ देने वाला 'स्टार्टअप अकाउंट', विदेशी व्यापार के लिए 'फॉरेन करेंसी अकाउंट' और व्यापारियों व कार्ड मशीनों के लिए 'मर्चेंट करंट अकाउंट' शामिल हैं। इस खाते का एक बड़ा आकर्षण ओवरड्राफ्ट (OD) की सुविधा है, जिसके तहत खाते में पैसे न होने पर भी बिजनेसमैन तय सीमा तक बैंक से पैसा निकाल सकते हैं और बाद में ब्याज सहित जमा कर सकते हैं। इसके अलावा, निकासी की बात करें तो करंट अकाउंट में कोई कड़ी डेली विड्रॉल लिमिट नहीं होती, यानी व्यापारी दिन में जब चाहे और जितना चाहे पैसा निकाल व जमा कर सकते हैं, जिससे उनका बिजनेस बिना किसी रुकावट के चलता रहता है।
