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पश्चिम एशिया युद्ध का सूरत कपड़ा इंडस्ट्री पर बुरा असर, बढ़ी लागत, घटाने पड़े काम के दिन और घंटे

पश्चिम एशिया में ईरान-इजरायल-अमेरिका में चल रहे संघर्ष की वजह से गुजरात के कपड़ा केंद्र सूरत में उत्पादन लागत बढ़ गई है। कई फैक्ट्रियों ने कामकाजी घंटे घटा दिए हैं या सप्ताह में काम करने वाले दिन कम कर दिए हैं। इससे उद्योग का उत्पादन प्रभावित हो रहा है और कई कंपनियों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है।

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सूरत के कपड़ा उद्योग पर पश्चिम एशिया संघर्ष का असर (तस्वीर-istock)

Photo : iStock

गुजरात के सूरत शहर, जो भारत का सबसे बड़ा मानव निर्मित कपड़ा उत्पादन केंद्र है, जो पश्चिम एशिया में ईरान-इजरायल-अमेरिका में चल रहे संघर्ष की वजह से अब बढ़ती लागत और कच्चे माल की महंगाई के कारण मुश्किल हालात का सामना कर रहा है। उद्योग में काम करने वाली कई कंपनियां ने अपने रोजाना काम करने के घंटे घटा दिए हैं या उत्पादन के सक्रिय दिनों में कमी की है। कुछ पदाधिकारियों का कहना है कि उद्योग को इस समय रोजाना करीब 90-100 करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है।

काम के दिनों और घंटे कम किए गए

न्यूज एजेंसी पीटीआई-भाषा के मुताबिक साउथ गुजरात टेक्सटाइल प्रोसेसर्स एसोसिएशन ने बढ़ती लागत को नियंत्रित करने के लिए अपने सदस्य इकाइयों के काम करने के दिनों को सात से घटाकर हफ्ते में पांच दिन कर दिया है। एसोसिएशन के अध्यक्ष जितेंद्र वक्तानिया ने बताया कि कच्चे माल और कोयले की कीमतों में वृद्धि के कारण सूरत और दक्षिण गुजरात का कपड़ा प्रसंस्करण उद्योग संकट में है। फेडरेशन ऑफ गुजरात वीवर्स वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष और सदर्न गुजरात चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के उपाध्यक्ष अशोक जिरावाला ने कहा कि कई इकाइयों ने अपने उत्पादन चक्र को 24 घंटे से घटाकर 12 घंटे प्रतिदिन कर दिया है। इसका असर कुल उत्पादन पर पड़ा है और उद्योग को रोजाना लगभग 90-100 करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है।

मजदूरों की कमी और पलायन

उद्योग की कठिनाइयों को मजदूरों की कमी ने और बढ़ा दिया है। अनुमान के अनुसार, मजदूरों की संख्या में करीब 35 प्रतिशत की कमी हुई है। जिरावाला ने बताया कि पिछले कुछ हफ्तों में 2,000 से ज्यादा प्रवासी मजदूर सूरत शहर छोड़कर चले गए हैं। इसके पीछे मुख्य कारण खाना पकाने वाली गैस सिलेंडरों की कमी और काम के हालात थे।

कच्चे माल और उत्पादन लागत में वृद्धि

कच्चे माल की कीमतों में बढ़ोतरी ने उद्योग पर और दबाव डाला है। मानव निर्मित फाइबर सहित आयातित कच्चे माल की कीमतों में 30-35 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। वक्तानिया ने कहा कि बुनाई, प्रसंस्करण और व्यापार के सभी क्षेत्रों में कामकाज में 25-30 प्रतिशत की गिरावट आई है।

उत्पादन में भारी कमी

न्यूज एजेंसी पीटीआई-भाषा के मुताबिक कॉन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स के राष्ट्रीय अध्यक्ष चंपालाल बोथरा ने बताया कि अंतरराष्ट्रीय संकट से पहले उद्योग रोजाना करीब सात करोड़ मीटर कपड़ा उत्पादन करता था। लेकिन अब उत्पादन घटकर लगभग आधा रह गया है। उन्होंने कहा कि जब संघर्ष शांत होगा और धागे की कीमतें तथा श्रमिकों की उपलब्धता स्थिर होंगी, तब भी उद्योग को पूरी तरह पटरी पर लौटने में दो से तीन महीने लग सकते हैं।

राहत की उम्मीद

हालांकि उद्योग मुश्किल हालात में है, लेकिन आने वाले शादी के मौसम से मांग बढ़ने और कुछ राहत मिलने की उम्मीद है। गुजरात के उपमुख्यमंत्री हर्ष संघवी ने हाल ही में सूरत में उद्योग जगत के नेताओं के साथ बैठक कर श्रमिकों के लिए पांच किलोग्राम वाले एलपीजी सिलेंडरों की पर्याप्त आपूर्ति का आश्वासन दिया। इस बीच, उद्योग संगठन कामकाज के दिनों और घंटों में बदलाव, लागत नियंत्रण और मजदूरों की उपलब्धता पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं, ताकि संकट को कुछ हद तक कम किया जा सके।

Ramanuj Singh
रामानुज सिंहauthor

रामानुज सिंह पत्रकारिता में दो दशकों का व्यापक और समृद्ध अनुभव रखते हैं। उन्होंने टीवी और डिजिटल—दोनों ही प्लेटफॉर्म्स पर काम करते हुए बिजनेस, पर्सनल फाइनेंस, शेयर बाजार, इनकम टैक्स, बैंकिंग, बुलियन और कमोडिटी मार्केट जैसे विषयों पर गहरी विशेषज्ञता विकसित की है। जर्नलिज्म में एमए की डिग्री और वर्षों के अनुभव से विकसित विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के साथ, रामानुज जटिल वित्तीय विषयों को सरल, विश्वसनीय और प्रभावी तरीके से पाठकों तक पहुंचाने के लिए जाने जाते हैं। अब तक वे 22,000 से अधिक स्टोरीज लिख चुके हैं।

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