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'सबसे शक्तिशाली' की हनक में 'अंकल सैम' कर्जदार, US पर GDP का 102% हुआ राष्ट्रीय कर्ज

दुनिया की सबसे बड़ी इकोनॉमी महंगाई, बेरोजगारी सहित हर मोर्चे पर दरक रही है। लेकिन, राष्ट्रपति ट्रंप अमेरिका को सबसे शक्तिशाली साबित करने के लिए कर्ज लेकर युद्ध कर रहे हैं।

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अमेरिकी इकोनॉमी पर कर्ज का बोझ

अमेरिका पिछले करीब तीन महीने से हर रोज करोड़ों रुपये ऐसे युद्ध पर खर्च कर रहा है, जिससे शायद कुछ खास हासिल नहीं कर पाए। लेकिन, 'अंकल सैम' को दुनिया को यह साबित करना है कि USA दुनिया का सबसे ताकतवर देश है और जो चाहे कर सकता है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप अपने हर संबोधन में यह बात बोलते भी हैं कि कैसे अमेरिका के पास दुनिया की सबसे ताकतवर फौज है।

दिलचस्प बात यह है कि ट्रंप जब सत्ता में आए, तो उनके वादों में अमेरिका को युद्ध में नहीं खींचने और इकोनॉमी को मजबूत करने का वादा सबसे ऊपर था। लेकिन, 1941 के बाद पहली बार ऐसा हुआ है कि अमेरिका पर राष्ट्रीय कर्ज इसकी GDP की तुलना में 100% हो गया है। लगातार बढ़ता राजकोषीय घाटा और ऊंची ब्याज दर इस संकट को और गहरा कर रहे हैं।

100% पार कर्ज का मतलब?

अमेरिका का कर्ज अब उसकी पूरी अर्थव्यवस्था (GDP) से भी ज्यादा हो गया है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक, पब्लिक डेट 31.265 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया, जबकि GDP करीब 31.216 ट्रिलियन डॉलर रहा। यानी debt-to-GDP ratio 100.2% पर पहुंच गया है। यह स्तर ऐतिहासिक रूप से काफी अहम माना जाता है, क्योंकि इससे सरकार की उधारी क्षमता और आर्थिक स्थिरता पर दबाव बढ़ता है।

क्यों बढ़ रहा है इतना कर्ज?

अमेरिकी सरकार हर 1 डॉलर की कमाई पर करीब 1.33 डॉलर खर्च कर रही है। मौजूदा साल में बजट घाटा करीब 1.9 ट्रिलियन डॉलर रहने का अनुमान है। लगातार टैक्स कट, बढ़ता सरकारी खर्च और ऊंची ब्याज दरें कर्ज को तेजी से बढ़ा रही हैं। यही वजह है कि आने वाले सालों में यह अनुपात और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।

निवेश और ब्याज दर पर असर

जैसे-जैसे कर्ज बढ़ता है, सरकार को ज्यादा ब्याज चुकाना पड़ता है। अभी अमेरिका के कुल सरकारी खर्च का हर 7 डॉलर में 1 डॉलर सिर्फ ब्याज में जा रहा है। विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर ब्याज दर में मामूली बढ़ोतरी भी होती है तो आने वाले 10 साल में अरबों डॉलर का अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है।

आगे क्या है खतरा?

अगर यही ट्रेंड जारी रहा, तो अमेरिका का कर्ज 2036 तक GDP के 120% और 2056 तक 175% तक पहुंच सकता है। हालांकि, अमेरिका के पास डॉलर जैसी रिजर्व करेंसी होने का फायदा है, लेकिन विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यह सुरक्षा भी सीमित है और लंबे समय में महंगाई, ब्याज दर और निवेश पर असर पड़ सकता है।

Yateendra Lawaniya
यतींद्र लवानियाauthor

प्रिंट और डिजिटल मीडिया में बिजनेस एवं इकोनॉमी कैटेगरी में 10 वर्षों से अधिक का अनुभव। पिछले 7 वर्षों से शेयर बाजार, कॉरपोरेट सेक्टर और आर्थिक नीतियों से जुड़ी खबरों पर विशेष पकड़। लेखन में केवल हेडलाइन तक सीमित न रहकर आंकड़ों, नीतिगत फैसलों और कॉरपोरेट दावों के पीछे की वास्तविक तस्वीर को बैलेंस्ड और आसान शब्दों में पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास। वर्तमान में Times Now Hindi के लिए बाजार की हर हलचल और आर्थिक घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं।

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