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दोस्त को 5,000 भेजना और दुकान पर 5,000 देना अलग! UPI का ये नियम जानें

डिजिटल भुगतान के इस दौर में यूपीआई (UPI) हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन गया है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि दोस्त को पैसे भेजना और किसी दुकान पर भुगतान करना दोनों अलग बातें हैं? आइए इसके जरूरी नियम जानते हैं।

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UPI Expenditure

आज के समय में यूपीआई (UPI) ने हमारे लेन-देन के तरीके को पूरी तरह से बदलकर रख दिया है। चाय की टपरी से लेकर बड़े-बड़े मॉल तक, हर जगह हम चुटकियों में अपने स्मार्टफोन से स्कैन करके पेमेंट कर देते हैं। दोस्तों को पैसे ट्रांसफर करने हों या किसी दुकान पर सामान का बिल चुकाना हो, सब कुछ बेहद आसान हो गया है। लेकिन क्या आपने कभी यह सोचा है कि अपने किसी दोस्त या रिश्तेदार को पैसे भेजना और किसी व्यापारी या दुकान पर पेमेंट करना दोनों अलग बातें हैं? नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) और बैंकिंग नियमों के तहत इन दोनों भुगतानों को अलग श्रेणियों में देखा जाता है। अगर आप भी लगातार यूपीआई का इस्तेमाल करते हैं, तो इससे जुड़े इन अहम नियमों को जानना आपके लिए बहुत जरूरी है, ताकि भविष्य में आपको किसी तरह की परेशानी या टैक्स संबंधी उलझनों का सामना न करना पड़े।

दोस्त और मर्चेंट पेमेंट में क्या है फर्क?

जब हम किसी दुकान, मॉल या मर्चेंट (Merchant) को यूपीआई के जरिए पैसे देते हैं, तो वह 'पीयर-टू-मर्चेंट' (P2M) ट्रांजैक्शन कहलाता है। दुकानदारों के पास एक खास मर्चेंट क्यूआर कोड (Merchant QR Code) होता है, जो उनके चालू खाते (Current Account) या बिजनेस अकाउंट से जुड़ा होता है। इस तरह के लेन-देन का मुख्य उद्देश्य व्यापारिक भुगतान करना होता है। इसके विपरीत, जब आप अपने किसी दोस्त, परिवार के सदस्य या परिचित को पैसे भेजते हैं, तो वह 'पीयर-टू-पीयर' (P2P) ट्रांजैक्शन की श्रेणी में आता है, जो आमतौर पर बचत खातों (Savings Accounts) के बीच होता है। इन दोनों भुगतानों के पीछे का फर्क सिर्फ भेजने के तरीके का नहीं, बल्कि इसके कानूनी और वित्तीय मायनों का भी होता है, जिस पर बैंक और वित्तीय विभाग कड़ी नजर रखते हैं।

टैक्स के क्या हैं मायने?

टैक्स और निगरानी (Tax and Monitoring) के लिहाज से भी इन दोनों ट्रांजेक्शन में बहुत बड़ा अंतर होता है। अगर आप अपने किसी दोस्त को अपनी सेविंग से पैसे उधार दे रहे हैं या उसका हिसाब चुका रहे हैं, तो आम तौर पर उस पर कोई अतिरिक्त टैक्स नहीं लगता है। लेकिन अगर आप अपने बैंक खाते से लगातार किसी अन्य व्यक्ति को बहुत बड़ी रकम भेज रहे हैं या संदिग्ध लेन-देन कर रहे हैं, तो आयकर विभाग (Income Tax Department) की नजर आप पर पड़ सकती है। वहीं दूसरी ओर, दुकानदारों को मिलने वाले हर मर्चेंट पेमेंट का पूरा व्यावसायिक रिकॉर्ड रखा जाता है। कई बार लोग टैक्स बचाने या अन्य कारणों से मर्चेंट अकाउंट की बजाय दुकानदारों के पर्सनल नंबर पर ही बड़ी रकम ट्रांसफर कर देते हैं, जो कि नियमों के खिलाफ माना जाता है और इसके लिए आपको जांच का सामना भी करना पड़ सकता है।

इसके अलावा, मर्चेंट पेमेंट और पर्सनल पेमेंट के लिए सुरक्षा और कैशबैक के नियम भी अलग-अलग होते हैं। मर्चेंट ट्रांजैक्शन पर कई बार दुकानदारों को मर्चेंट डिस्काउंट रेट या अन्य नियम लागू हो सकते हैं, जबकि ग्राहकों को अक्सर इन पर कैशबैक या रिवॉर्ड पॉइंट्स मिलते हैं। दूसरी तरफ, पर्सनल ट्रांसफर पूरी तरह से आपसी भरोसे पर आधारित होते हैं और एक बार गलती से गलत खाते में पैसे चले जाने पर उन्हें वापस पाना थोड़ा मुश्किल हो सकता है, हालांकि अब एनपीसीआई इसके लिए भी लगातार नए सुरक्षा फीचर्स ला रहा है।

Richa Tripathi
रिचा त्रिपाठीauthor

रिचा त्रिपाठी टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में बिजनेस डेस्क पर सीनियर कॉपी एडिटर के रूप में कार्यरत हैं। मीडिया इंडस्ट्री में 7 वर्षों के अनुभव के साथ रिचा, पर्सनल फाइनेंस, स्टॉक मार्केट, टैक्स प्लानिंग और अर्थव्यवस्था से जुड़े विषयों पर मजबूत पकड़ रखती हैं। अब तक 8,000 से अधिक कंटेंट लिख चुकी रिचा की विशेषता है—जटिल वित्तीय जानकारियों को सरल, स्पष्ट और भरोसेमंद तरीके से पाठकों तक पहुंचाना। वह ऐसी स्टोरीज तैयार करती हैं जो न केवल जानकारीपूर्ण होती हैं, बल्कि आम पाठक की वित्तीय समझ को बेहतर बनाने में भी मदद करती हैं।

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