संपत्ति खरीदारों की TDS देनदारी पर सुप्रीम कोर्ट ने क्यों खारिज की याचिका, जानें क्या है पूरा मामला?
- Authored by: रामानुज सिंह
- Updated Feb 11, 2026, 07:40 PM IST
TDS News: सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें 50 लाख रुपये से अधिक कीमत की संपत्ति खरीदने पर टीडीएस देनदारी के प्रति जागरूकता की उचित व्यवस्था न होने का मुद्दा उठाया गया था। याचिकाकर्ता ने कहा था कि खरीदारों को नियमों की जानकारी देने और अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए कोई प्रभावी प्रशासनिक तंत्र मौजूद नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने टीडीएस जागरूकता पर दायर याचिका खारिज की (तस्वीर-PTI/istock)
TDS News: सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को 50 लाख रुपये से अधिक कीमत की संपत्ति खरीदने पर लगने वाले टीडीएस (स्रोत पर कर कटौती) को लेकर दायर एक याचिका को खारिज कर दिया। यह याचिका इस बात को लेकर दाखिल की गई थी कि सरकार की ओर से ऐसी कोई पक्की व्यवस्था नहीं है, जिससे खरीदारों को टीडीएस नियमों की सही जानकारी मिल सके। कोर्ट ने इस मामले में सुनवाई करने से ही इनकार कर दिया और संक्षिप्त आदेश में याचिका खारिज कर दी। यह मामला न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ के सामने आया था। दोनों न्यायाधीशों ने याचिका पर विचार किया, लेकिन इसे सुनवाई के योग्य नहीं माना। अपने छोटे से आदेश में उन्होंने साफ कहा कि इस याचिका पर आगे सुनवाई की जरूरत नहीं है।
क्या है पूरा मामला?
न्यूज एजेंसी पीटीआई-भाषा के मुताबिक याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका में आयकर अधिनियम के एक प्रावधान का जिक्र किया था। इस कानून के तहत यदि कोई व्यक्ति 50 लाख रुपये या उससे अधिक कीमत की अचल संपत्ति (जैसे घर, फ्लैट या जमीन) खरीदता है, तो उसे कुल कीमत का एक प्रतिशत टीडीएस के रूप में काटकर सरकार के पास जमा करना होता है। यानी अगर कोई 60 लाख रुपये की संपत्ति खरीदता है, तो उसे 60 हजार रुपये टीडीएस के रूप में काटकर आयकर विभाग को देना होगा। याचिकाकर्ता का कहना था कि इस नियम की पूरी जिम्मेदारी खरीदार पर डाल दी गई है। कानून यह मानकर चलता है कि हर संपत्ति खरीदार को आयकर कानून की पूरी जानकारी है, जबकि हकीकत में ऐसा नहीं है। खासकर पहली बार घर खरीदने वाले लोग अक्सर इन नियमों से अनजान होते हैं।
क्या थी याचिकाकर्ता की मांग?
याचिकाकर्ता ने स्पष्ट किया कि वह इस कर या कानून की वैधता को चुनौती नहीं दे रहे हैं। उनका उद्देश्य केवल इतना था कि सरकार या संबंधित विभाग ऐसी व्यवस्था बनाए, जिससे संपत्ति की रजिस्ट्री के समय ही यह जांच हो सके कि टीडीएस जमा हुआ है या नहीं। उन्होंने कहा कि अभी पंजीकरण (रजिस्ट्री) के समय टीडीएस अनुपालन की कोई अनिवार्य जांच नहीं होती। ऐसे में कई खरीदार अनजाने में टीडीएस जमा नहीं कर पाते। बाद में जब आयकर विभाग की ओर से नोटिस आता है, तब उन्हें जुर्माना और ब्याज भरना पड़ता है। इससे आम नागरिकों को आर्थिक और मानसिक परेशानी का सामना करना पड़ता है।
खरीदारों को क्या होती है दिक्कत?
याचिका में कहा गया कि सामान्य लोग संपत्ति खरीदते समय आमतौर पर स्टांप ड्यूटी, रजिस्ट्री शुल्क और अन्य कागजी प्रक्रियाओं पर ध्यान देते हैं। लेकिन टीडीएस जमा करने की प्रक्रिया अलग से करनी होती है, जो ऑनलाइन पोर्टल के जरिए होती है। कई लोगों को इसकी जानकारी नहीं होती या प्रक्रिया समझ में नहीं आती। खासकर ग्रामीण इलाकों या छोटे शहरों में लोग बिचौलियों या दस्तावेज लिखने वालों पर निर्भर रहते हैं। अगर उन्हें सही सलाह नहीं मिलती, तो वे टीडीएस जमा करना भूल सकते हैं। बाद में उन्हें ब्याज और पेनाल्टी के साथ रकम चुकानी पड़ती है।
याचिकाकर्ता का तर्क
याचिकाकर्ता का कहना था कि यदि सरकार संपत्ति पंजीकरण के समय ही टीडीएस जमा होने की पुष्टि की व्यवस्था कर दे, तो ऐसी गलतियां कम होंगी। इससे नागरिकों की सुरक्षा होगी, स्वैच्छिक रूप से नियमों का पालन बढ़ेगा और सरकार का राजस्व भी सुरक्षित रहेगा। उन्होंने कहा कि यह कदम आम लोगों के हित में होगा और इससे किसी भी तरह से कानून की भावना या कर वसूली पर असर नहीं पड़ेगा, बल्कि प्रक्रिया और अधिक पारदर्शी बनेगी।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया और याचिका को खारिज कर दिया। कोर्ट ने इस मामले में कोई विस्तृत टिप्पणी नहीं की और संक्षिप्त आदेश में सुनवाई से इनकार कर दिया। अब इस फैसले के बाद 50 लाख रुपये से अधिक की संपत्ति खरीदने पर टीडीएस काटकर जमा करने की जिम्मेदारी पहले की तरह पूरी तरह खरीदार पर ही रहेगी। खरीदारों को यह सुनिश्चित करना होगा कि वे संपत्ति खरीदते समय आयकर कानून के इस प्रावधान का पालन करें, ताकि भविष्य में किसी तरह की कानूनी या वित्तीय परेशानी से बचा जा सके।
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