इस समय हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) तनाव का सबसे बड़ा केंद्र बना हुआ है। ईरान (Iran)और अमेरिका के बीच बढ़ती सैन्य तनातनी ने दुनिया भर के देशों की धड़कनें बढ़ा दी हैं। हॉर्मुज का यह संकरा समुद्री रास्ता दुनिया के कुल तेल व्यापार का लगभग 20-25% हिस्सा संभालता है। ईरान द्वारा नाकाबंदी की धमकियों और अमेरिका द्वारा सुरक्षा के नाम पर की जा रही सैन्य तैनाती ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार को जोखिम में डाल दिया है। लेकिन इस तनावपूर्ण माहौल के बीच, तुर्की ने एक ऐसा मास्टरस्ट्रोक खेला है जो आने वाले समय में वैश्विक व्यापार की दिशा बदल सकता है।
तुर्की का 'मिडल कॉरिडोर' क्या है?
जैसे ही हॉर्मुज और लाल सागर (Red Sea) के रास्तों पर खतरा बढ़ा, तुर्की ने अपने 'मिडल कॉरिडोर' (Middle Corridor) को दुनिया के सामने एक मजबूत विकल्प के रूप में पेश करना शुरू कर दिया है। इसे आधिकारिक तौर पर 'ट्रांस-कैस्पियन इंटरनेशनल ट्रांसपोर्ट रूट' के नाम से जाना जाता है। यह रास्ता चीन से शुरू होकर मध्य एशिया (कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान), कैस्पियन सागर, अजरबैजान और जॉर्जिया से होते हुए तुर्की तक पहुंचता है, और फिर वहां से सीधे यूरोप से जुड़ जाता है। तुर्की का तर्क है कि जब पारंपरिक समुद्री रास्ते युद्ध और राजनीति की भेंट चढ़ रहे हैं, तो यह जमीनी और समुद्री मिला-जुला रास्ता सबसे सुरक्षित है।
क्यों खास है यह नया रास्ता?
तुर्की के इस 'मिडल कॉरिडोर' की सबसे बड़ी खासियत इसकी रफ्तार और सुरक्षा है। चीन से यूरोप तक माल पहुंचाने के लिए उत्तरी रास्ता (जो रूस से होकर गुजरता है) यूक्रेन युद्ध के कारण असुरक्षित हो चुका है। वहीं, दक्षिणी समुद्री रास्ता (हॉर्मुज और स्वेज नहर) ईरान-अमेरिका तनाव और हूतियों के हमलों की वजह से महंगा और जोखिम भरा हो गया है। ऐसे में मिडल कॉरिडोर न केवल दूरी को कम करता है, बल्कि यह रूस या हॉर्मुज जैसे विवादास्पद क्षेत्रों को पूरी तरह बायपास कर देता है। तुर्की इसे 'आधुनिक सिल्क रोड' के रूप में प्रमोट कर रहा है, जिससे माल ढुलाई का समय 15 से 20 दिन तक कम हो सकता है।
ईरान-अमेरिका जंग और तुर्की का फायदा
राजनीति में कहा जाता है कि दो दिग्गजों की लड़ाई में अक्सर तीसरा बाजी मार ले जाता है। यहां भी कुछ ऐसा ही होता दिख रहा है। ईरान और अमेरिका के बीच जारी गतिरोध ने दुनिया के बड़े व्यापारिक घरानों और देशों को नए रास्तों के बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया है। तुर्की इस स्थिति का लाभ उठाते हुए खुद को वैश्विक व्यापार के 'लॉजिस्टिक्स हब' के रूप में स्थापित कर रहा है। वह खाड़ी देशों और मध्य एशिया के बीच एक पुल की तरह काम करना चाहता है। अगर हॉर्मुज में कोई बड़ी रुकावट आती है, तो तुर्की का यह कॉरिडोर दुनिया की नई लाइफलाइन बन सकता है।
चुनौतियां और भारत पर असर
हालांकि, मिडल कॉरिडोर पूरी तरह चुनौतियों से मुक्त नहीं है। इस रास्ते में कई देशों की सीमाएं पड़ती हैं, जिससे कस्टम और कागजी कार्यवाही में देरी हो सकती है। इसके अलावा, कैस्पियन सागर को पार करने के लिए बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत है। भारत के लिए भी यह स्थिति महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत अपना खुद का 'चाबहार बंदरगाह' और 'INSTC' (इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर) विकसित कर रहा है। तुर्की का बढ़ता प्रभाव भारत के रणनीतिक हितों के लिए एक नई प्रतिस्पर्धा पैदा कर सकता है।
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