प्रसंस्करणकर्ताओं के इंदौर स्थित संगठन सोयाबीन प्रोसेसर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (Soybean Processors Association of India) ने खाद्य तेलों की पैकेजिंग को लेकर एक महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया है। संगठन का कहना है कि बाजार में कई कंपनियां ऐसे गैर-मानक पैक साइज में तेल बेच रही हैं, जिससे आम उपभोक्ता भ्रमित हो रहे हैं। इस समस्या को लेकर सोपा ने केंद्र सरकार से जल्द हस्तक्षेप करने की मांग भी की है।
ग्राहक क्यों हो रहे भ्रमित
पीटीआई (भाषा) की एक रिपोर्ट के अनुसार, अब कई कंपनियां 880 ml, 910 ml या इसी तरह के साइज के पैक बाजार में ला रही हैं। देखने में ये पैकेट लगभग एक जैसे लगते हैं, लेकिन इनमें तेल की मात्रा अलग होती है। ऐसे में ग्राहक अक्सर कम कीमत वाला पैकेट चुन लेते हैं, यह सोचकर कि वह सस्ता है, जबकि असल में प्रति लीटर के हिसाब से वह ज्यादा महंगा पड़ सकता है।
कंपनियां छूट का गलत फायदा उठा रहीं
सोपा के कार्यकारी निदेशक डी.एन. पाठक ने बताया कि इस बारे में पहले भी उद्योग की कई संस्थाओं ने सरकार को सुझाव दिया था कि पैकेजिंग साइज को फिर से मानकीकृत (standard) किया जाए। हालांकि सरकार ने उपभोक्ताओं को अधिक विकल्प देने के उद्देश्य से पहले यह नियम हटा दिया था और कंपनियों को प्रति यूनिट कीमत (जैसे प्रति मिलीलीटर या प्रति ग्राम) लिखना अनिवार्य किया था।
लेकिन सोपा का कहना है कि ज्यादातर ग्राहक इतनी बारीकी से गणना नहीं करते। उदाहरण के तौर पर, अगर किसी पैकेट पर 24.72 पैसे प्रति मिलीलीटर लिखा हो, तो आम ग्राहक इसे समझकर तुलना नहीं कर पाता। इसी वजह से कंपनियां इस छूट का फायदा उठाकर ग्राहकों को भ्रमित कर रही हैं।
ईमानदारी से काम करने वाली कंपनियों भी हो रहीं प्रभावित
संगठन का यह भी कहना है कि इस स्थिति का असर ईमानदारी से काम करने वाली कंपनियों पर भी पड़ रहा है। उन्हें भी बाजार में टिके रहने के लिए ऐसे ही गैर-मानक पैक लाने पड़ रहे हैं, जिससे प्रतिस्पर्धा असंतुलित हो रही है।
सोपा ने सरकार से अपील की है कि उपभोक्ताओं के हित में जल्द कोई ठोस फैसला लिया जाए और पैकेजिंग साइज को फिर से तय किया जाए। साथ ही, संगठन ने यह भी कहा है कि अगर कोई नया नियम लागू होता है, तो कंपनियों को बदलाव के लिए पर्याप्त समय भी दिया जाना चाहिए, ताकि उद्योग पर अचानक दबाव न पड़े।
