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RBI को सता रहा महंगाई बेकाबू होने का डर, फूड और फ्यूल की कीमतों पर चेताया

महंगाई अब RBI के टोलरेंस बैंड से बाहर निकलने लगी है। यही वजह है कि अब रिजर्व बैंक को महंगाई के बेकाबू होने का डर सताने लगा है। खासतौर पर RBI ने फूड और फ्यूल की कीमतों पर चेताया है।

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रिजर्व बैंक ने बढ़ती महंगाई पर जताई चिंता

RBI on Food Inflation and The Rising Kitchen Bill : महंगाई के मोर्चे पर हालात सुधरते नहीं दिख रहे हैं। अब रिजर्व बैंक (RBI) ने भी अपने अगस्त के बुलेटिन में चेताया है कि अगर फूड, फ्यूल और दूसरी इनपुट लागतों में बढ़ोतरी जारी रहती है, तो इसका असर सिर्फ उन्हीं चीजों तक सीमित नहीं रहेगा। धीरे-धीरे इसका असर बाकी सामान और सेवाओं की कीमतों पर भी पड़ सकता है। यानी फिलहाल महंगाई का दबाव सीमित दिख रहा है, लेकिन इसके व्यापक होने का जोखिम बढ़ रहा है। इस बुलेटिन में RBI ने भी कहा है कि ज्यादा खाद्य, ईंधन और अन्य इनपुट कीमतों के दूसरे दौर के असर से व्यापक महंगाई का जोखिम बना हुआ है।

यह चेतावनी ऐसे समय आई है, जब देश की खुदरा महंगाई लगातार दूसरे महीने RBI के 4% लक्ष्य (Tolerance Band) से ऊपर बनी हुई है। जुलाई 2026 में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) आधारित महंगाई 4.45% रही, जबकि जून में यह 4.38% थी। जुलाई की बढ़ोतरी बहुत तेज नहीं थी, लेकिन इससे यह साफ है कि महंगाई का दबाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।

फूड और फ्यूल क्यों बन रहे हैं चिंता की वजह?

महंगाई की सबसे बड़ी चुनौती इस समय सप्लाई साइड से आ रही है। खाद्य कीमतों में बढ़ोतरी सीधे आम परिवारों के बजट पर असर डालती है, लेकिन समस्या सिर्फ इतनी नहीं है। अगर फूड की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं, तो इससे कंपनियों की लागत, मजदूरी की मांग और दूसरी सेवाओं की कीमतों पर भी दबाव बन सकता है।

यही स्थिति फ्यूल के मामले में भी है। पेट्रोल, डीजल, गैस और ऊर्जा की कीमतें बढ़ने पर ट्रांसपोर्ट और लॉजिस्टिक्स महंगे हो जाते हैं। इसका असर सब्जियों और अनाज से लेकर पैकेज्ड फूड, ई-कॉमर्स डिलीवरी और औद्योगिक उत्पादों तक पहुंच सकता है। यानी एक जगह से शुरू हुआ लागत का दबाव पूरी अर्थव्यवस्था में फैल सकता है।

मौद्रिक नीति में कठोरता संभव

RBI ने भले ही अगस्त की मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक में ब्याज दर या पॉलिसी आउटलुक में कोई बदलाव नहीं किया। लेकिन, इस बात के साफ संकेत दिए कि महंगाई बढ़ने के पीछे मुख्य रूप से फूड और फ्यूल महंगाई है, जिसे अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव और पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव ने अनिश्चित बना दिया है।

‘बेकाबू’ होने का डर

फिलहाल RBI का कहना है कि सामान्य यानी व्यापक महंगाई के दबाव सीमित हैं। चिंता इस बात की है कि फूड, फ्यूल और इनपुट लागत का असर दूसरी कीमतों तक पहुंच गया तो तस्वीर तेजी से बदल सकती है। जुलाई में भी यही संकेत मिला। खुदरा महंगाई 4.45% तक पहुंची, लेकिन महंगाई का व्यापक फैलाव अभी सीमित रहा। ICRA के मुताबिक जुलाई में 4% या उससे ज्यादा महंगाई वाले CPI बास्केट के आइटम्स की हिस्सेदारी करीब 28% रही, जो जून के करीब 29% से कम थी। इसका मतलब है कि फिलहाल हर तरफ कीमतें एक जैसी रफ्तार से नहीं बढ़ रही हैं। यही वजह है कि RBI के लिए सबसे अहम सवाल अब यह है कि ऊंची लागत का असर कंपनियां अपने उत्पादों की कीमतों में कितना और कितनी तेजी से डालती हैं।

कोर महंगाई अभी दे रही है राहत

RBI की चिंता के बीच एक राहत वाली बात भी है। कोर महंगाई, जिसमें खाद्य और ईंधन को बाहर रखा जाता है, अभी अपेक्षाकृत स्थिर बनी हुई है। अगस्त की मौद्रिक नीति में RBI ने कहा था कि लागत बढ़ने के बावजूद कोर महंगाई में फिलहाल बहुत ज्यादा सामान्यीकरण के संकेत नहीं दिख रहे हैं। यही आंकड़ा RBI को अभी आक्रामक तरीके से ब्याज दर बढ़ाने से रोकने में मदद कर रहा है। केंद्रीय बैंक फिलहाल यह देखना चाहता है कि फूड और फ्यूल की बढ़ी कीमतें अस्थायी सप्लाई शॉक हैं या लंबे समय तक चलने वाला महंगाई दबाव। अगर कोर महंगाई भी तेजी पकड़ती है, तो मामला ज्यादा गंभीर माना जाएगा, क्योंकि इसका मतलब होगा कि लागत का असर अर्थव्यवस्था के दूसरे हिस्सों में भी पहुंच चुका है।

Yateendra Lawaniya
यतींद्र लवानियाauthor

प्रिंट और डिजिटल मीडिया में बिजनेस एवं इकोनॉमी कैटेगरी में 10 वर्षों से अधिक का अनुभव। पिछले 7 वर्षों से शेयर बाजार, कॉरपोरेट सेक्टर और आर्थिक नीतियों से जुड़ी खबरों पर विशेष पकड़। लेखन में केवल हेडलाइन तक सीमित न रहकर आंकड़ों, नीतिगत फैसलों और कॉरपोरेट दावों के पीछे की वास्तविक तस्वीर को बैलेंस्ड और आसान शब्दों में पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास। वर्तमान में Times Now Hindi के लिए बाजार की हर हलचल और आर्थिक घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं।

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