West Asia Conflict : रेटिंग एजेंसी ICRA की एक हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि पश्चिम एशिया में चल रहा संघर्ष लंबे समय तक जारी रहता है, तो इसका भारत की आर्थिक वृद्धि पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। रिपोर्ट के अनुसार भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत बनी हुई है, लेकिन वैश्विक परिस्थितियों में बढ़ते तनाव, खासकर ऊर्जा आपूर्ति से जुड़े जोखिम, भविष्य में आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित कर सकते हैं।
जीडीपी वृद्धि दर में थोड़ी गिरावट का अनुमान
न्यूज एजेंसी पीटीआई-भाषा के मुताबिक रिपोर्ट के मुताबिक वित्त वर्ष 2026-27 में भारत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि करीब 7.1 प्रतिशत रहने का अनुमान है। यह वित्त वर्ष 2025-26 के अनुमानित 7.6 प्रतिशत की तुलना में थोड़ा कम है। हालांकि यह दर अभी भी कई बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में बेहतर मानी जा रही है, लेकिन वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव से इसमें दबाव आ सकता है।
तेल कीमतों और महंगाई का खतरा
रिपोर्ट में कहा गया है कि पश्चिम एशिया में लंबे समय तक तनाव बना रहने से कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आ सकती है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के रूप में आयात करता है, इसलिए तेल की कीमतों में वृद्धि सीधे देश की अर्थव्यवस्था और महंगाई पर असर डालती है। अगर तेल महंगा होता है तो परिवहन, बिजली उत्पादन और कई उद्योगों की लागत बढ़ जाती है, जिसका असर अंततः आम उपभोक्ताओं तक पहुंचता है।
होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही प्रभावित
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि Strait of Hormuz के आसपास समुद्री मार्गों पर जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने की खबरें सामने आई हैं। यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा परिवहन मार्गों में से एक माना जाता है। यहां से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल और गैस दुनिया के अलग-अलग देशों तक पहुंचती है। अगर इस रूट पर व्यवधान आता है तो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हो सकती है और माल ढुलाई की लागत भी बढ़ सकती है।
भारत के लिए अहम है पश्चिम एशिया
पश्चिम एशिया भारत का एक महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदार है। भारत के कुल निर्यात में इस क्षेत्र की हिस्सेदारी करीब 14 प्रतिशत है, जबकि आयात में करीब 21 प्रतिशत हिस्सा इसी क्षेत्र से आता है। ऐसे में अगर क्षेत्र में तनाव बढ़ता है या समुद्री मार्गों पर असर पड़ता है, तो भारत के व्यापार प्रवाह पर भी दबाव बढ़ सकता है। इससे सामान की आपूर्ति में देरी और व्यापार लागत में वृद्धि जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं।
माल ढुलाई लागत और सप्लाई चेन पर असर
रिपोर्ट में कहा गया है कि लंबे समय तक चलने वाला संघर्ष भारत के व्यापार के लिए कई तरह के जोखिम पैदा कर सकता है। इसमें माल ढुलाई की लागत बढ़ना, सामान की आपूर्ति में देरी और ऊर्जा की उपलब्धता को लेकर अनिश्चितता शामिल हैं। इन सभी कारणों से उद्योगों की उत्पादन लागत बढ़ सकती है और व्यापार की गति धीमी पड़ सकती है।
चालू खाते के घाटे पर पड़ सकता है असर
ICRA के अनुसार अगर कच्चे तेल की कीमतों में 10 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी होती है, तो भारत का चालू खाते का घाटा 0.30 से 0.40 प्रतिशत तक बढ़ सकता है। इसके साथ ही थोक और खुदरा महंगाई में भी वृद्धि हो सकती है। ईंधन की कीमत बढ़ने से लोगों की खर्च करने की क्षमता कम हो सकती है, जिससे बाजार में मांग घट सकती है और इसका असर समग्र आर्थिक गतिविधियों पर पड़ सकता है।
तेल कीमतों के अलग-अलग परिदृश्य
रिपोर्ट के अनुसार अगर वित्त वर्ष 2026-27 में कच्चे तेल की औसत कीमत 70 से 75 डॉलर प्रति बैरल के बीच रहती है, तो भारत का चालू खाते का घाटा सकल घरेलू उत्पाद के लगभग एक प्रतिशत के आसपास रह सकता है। लेकिन यदि तेल की कीमतें बढ़कर 100 से 105 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच जाती हैं, तो यह घाटा बढ़कर जीडीपी के लगभग 1.9 से 2.2 प्रतिशत तक हो सकता है। ऐसी स्थिति में देश की अर्थव्यवस्था पर व्यापक दबाव देखने को मिल सकता है।
विदेश से आने वाली धनराशि पर भी खतरा
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि पश्चिम एशिया में तनाव का असर भारत में आने वाले धन प्रेषण यानी रेमिटेंस पर भी पड़ सकता है। भारत को विदेशों से मिलने वाली कुल धनराशि का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा पश्चिम एशियाई देशों से आता है। इसमें खास तौर पर यूनाइटेड अरब अमीरात और सउदी अरब जैसे देशों का बड़ा योगदान है। अगर क्षेत्र में आर्थिक गतिविधियां प्रभावित होती हैं, तो वहां काम करने वाले भारतीयों की आय और उनसे भारत भेजी जाने वाली रकम पर भी असर पड़ सकता है।
कुल मिलाकर, रिपोर्ट का कहना है कि भारत की अर्थव्यवस्था फिलहाल मजबूत स्थिति में है, लेकिन पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में संभावित उछाल और व्यापारिक अनिश्चितताएं भविष्य में आर्थिक वृद्धि के लिए चुनौती बन सकती हैं।
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