आजकल प्रॉपर्टी मार्केट में निवेश तेजी से बढ़ रहा है, जहां कमर्शियल प्रॉपर्टी अपनी मोटी रेगुलर इनकम और बेहतर रिटर्न के कारण लोगों को सबसे ज्यादा आकर्षित कर रही है। यदि आप भी इस बदलते दौर में किसी दुकान, शोरूम या ऑफिस स्पेस में निवेश करने की प्लानिंग कर रहे हैं, तो यह खबर आपके बड़े काम की है। कमर्शियल रियल एस्टेट में पैसा लगाने से पहले आपको कुछ बेहद महत्वपूर्ण बातों का खास ध्यान रखना चाहिए, ताकि आपका सौदा पूरी तरह सुरक्षित और मुनाफेदार रहे।
7 बातों को खास ध्यान रखें
- कमर्शियल प्रॉपर्टी में कदम रखने से पहले जो सबसे पहली और सबसे बड़ी बात आपको देखनी है, वह है प्रॉपर्टी की लोकेशन। कमर्शियल सेक्टर का पूरा खेल ही इसी बात पर टिका होता है। आपकी दुकान या ऑफिस ऐसी जगह पर होना चाहिए जहां लोगों का आना-जाना बहुत ज्यादा हो, ट्रांसपोर्ट की अच्छी सुविधा हो और कनेक्टिविटी बेहतरीन हो। अगर प्रॉपर्टी किसी प्राइम लोकेशन या उभरते हुए बिजनेस हब में है, तो आपको किरायेदार ढूंढने में कभी परेशानी नहीं होगी और समय के साथ प्रॉपर्टी के दाम भी तेजी से बढ़ेंगे। इसके विपरीत, किसी सुनसान या अविकसित इलाके में सस्ती प्रॉपर्टी खरीदना घाटे का सौदा साबित हो सकता है।
- दूसरी महत्वपूर्ण बात है प्रॉपर्टी का प्रकार और मार्केट रिसर्च। आपको यह तय करना होगा कि आप किस तरह की प्रॉपर्टी में पैसा लगाना चाहते हैं रिटेल शॉप, ऑफिस स्पेस, बैंक के लिए जगह या कोई गोदाम? निवेश करने से पहले उस इलाके की मार्केट रिसर्च जरूर करें। देखें कि वहां किस चीज की डिमांड सबसे ज्यादा है। उदाहरण के लिए, यदि किसी इलाके में आईटी कंपनियां खुल रही हैं, तो वहां ऑफिस स्पेस की मांग ज्यादा होगी, और यदि कोई रिहायशी इलाका विकसित हो रहा है, तो वहां रीटेल दुकानों या सुपरमार्केट के लिए जगह की मांग अधिक होगी। बाजार की जरूरत को समझकर किया गया निवेश हमेशा सफल होता है।
- तीसरा और सबसे कानूनी पहलू है दस्तावेजों की गहन जांच और सरकारी मंजूरी। कमर्शियल प्रॉपर्टी खरीदते समय कागजी कार्रवाई में रत्ती भर भी लापरवाही न बरतें। यह सुनिश्चित करें कि प्रॉपर्टी पूरी तरह से विवाद-मुक्त हो। बिल्डर के पास जमीन का मालिकाना हक, स्थानीय अथॉरिटी से पास नक्शा, कंप्लीशन सर्टिफिकेट (CC) और सबसे जरूरी रेरा (RERA) रजिस्ट्रेशन नंबर होना अनिवार्य है। यदि आप किसी पुरानी या रीसेल वाली प्रॉपर्टी को खरीद रहे हैं, तो यह जरूर जांच लें कि उस पर कोई पुराना टैक्स या बिजली-पानी का बिल बकाया तो नहीं है। किसी अच्छे वकील से लीगल क्लियरेन्स रिपोर्ट तैयार करवाना एक समझदारी भरा कदम होगा।
- चौथी बात जो आपको देखनी है, वह है फाइनेंशियल प्लानिंग और कुल लागत। कमर्शियल प्रॉपर्टीज के दाम रेजिडेंशियल के मुकाबले काफी ज्यादा होते हैं और इन पर मिलने वाले लोन की ब्याज दरें भी अधिक होती हैं। लोन लेने से पहले अपनी ईएमआई (EMI) चुकाने की क्षमता का सही आकलन करें। इसके अलावा, सिर्फ प्रॉपर्टी की कीमत ही आपका कुल खर्च नहीं होती; इसमें स्टांप ड्यूटी, रजिस्ट्रेशन फीस, ब्रोकरेज, जीएसटी (GST) और हर महीने लगने वाला मेंटेनेंस चार्ज भी शामिल होता है। इन सभी छिपे हुए खर्चों को अपने बजट में पहले से जोड़कर चलें ताकि बाद में पैसों की तंगी न हो।
- पांचवीं जरूरी बात है किराये का अनुमान और लीज एग्रीमेंट। निवेश करने का मुख्य उद्देश्य हर महीने अच्छी कमाई करना होता है। इसलिए पहले से पता करें कि उस इलाके में कमर्शियल प्रॉपर्टीज पर कितना किराया मिल रहा है। आमतौर पर कमर्शियल प्रॉपर्टी पर 6% से 10% तक का सालाना रिटर्न मिल जाता है। इसके साथ ही, लीज की शर्तों को ध्यान से पढ़ें। कमर्शियल लीज आमतौर पर लंबी अवधि (3, 5 या 9 साल) की होती है। एग्रीमेंट में यह साफ लिखा होना चाहिए कि हर साल या कुछ सालों के अंतराल पर किराया कितने प्रतिशत बढ़ेगा और मेंटेनेंस का खर्च कौन उठाएगा।
- छठी बात है बिल्डर की साख और कंस्ट्रक्शन की क्वालिटी। अगर आप किसी अंडर-कंस्ट्रक्शन (निर्माणाधीन) प्रोजेक्ट में पैसा लगा रहे हैं, तो बिल्डर का ट्रैक रिकॉर्ड देखना बेहद जरूरी है। बाजार में उस बिल्डर की साख कैसी है? क्या उसने अपने पिछले प्रोजेक्ट्स समय पर पूरे करके दिए हैं? कहीं उस पर कोई दिवालिया होने का केस तो नहीं चल रहा? किसी नामी और भरोसेमंद बिल्डर से प्रॉपर्टी खरीदने पर प्रोजेक्ट के अटकने का खतरा न के बराबर होता है और कंस्ट्रक्शन की क्वालिटी भी शानदार मिलती है, जिससे भविष्य में मरम्मत का खर्च बच जाता है।
- सातवीं और आखिरी बात है धैर्य और आपातकालीन फंड। कमर्शियल रियल एस्टेट में लिक्विडिटी थोड़ी कम होती है, यानी इसे जरूरत पड़ने पर तुरंत कैश में बदलना या बेचना आसान नहीं होता। कई बार ऐसा भी हो सकता है कि प्रॉपर्टी तैयार होने के बाद भी आपको कुछ महीनों तक कोई अच्छा किरायेदार न मिले। ऐसी स्थिति से निपटने के लिए आपके पास एक बैकअप या बफर फंड होना चाहिए, जिससे प्रॉपर्टी खाली रहने के दौरान भी आप बैंक की ईएमआई और मेंटेनेंस का खर्च बिना किसी तनाव के चुका सकें।
