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Pink Tax: 7 ऐसी चीजें जो आज भी महिलाओं को मिलती हैं पुरुषों से महंगी, देख लीजिए लिस्ट

आज भी कई ऐसी चीजें हैं जिनके लिए महिलाओं को पुरुषों की तुलना में अधिक कीमत चुकानी पड़ती है। पर्सनल केयर प्रोडक्ट्स से लेकर हेल्थ चेकअप और कपड़ों तक, ऐसे कई खर्च हैं जो महिलाओं की जेब पर भारी पड़ते हैं। बाजार में कीमतों के इसी लैंगिक भेदभाव को आम तौर पर ‘पिंक टैक्स’ कहा जाता है।

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Pink Tax

क्या आपने कभी गौर किया है कि बाजार में मिलने वाला एक साधारण सा पिंक रेजर, पुरुषों के नीले या काले रेजर से महंगा क्यों होता है? या फिर महिलाओं के परफ्यूम और कपड़ों की कीमत एक जैसी क्वालिटी के बावजूद पुरुषों के मुकाबले अधिक क्यों होती है? इसे अर्थशास्त्र की भाषा में 'पिंक टैक्स' (Pink Tax) कहा जाता है। यह कोई सरकारी टैक्स नहीं है, बल्कि कंपनियों द्वारा महिलाओं के लिए बनाए गए प्रोडक्ट्स पर वसूली जाने वाली अतिरिक्त कीमत है। दुनिया भर में इस भेदभावपूर्ण कीमत को लेकर बहस जारी है। आइए जानते हैं उन 7 चीजों के बारे में जो आज भी महिलाओं को पुरुषों से महंगी मिलती हैं।

1. पर्सनल केयर प्रोडक्ट्स (रेजर और शेविंग क्रीम)

पिंक टैक्स का सबसे आम उदाहरण बाथरूम में ही मिल जाता है। एक जैसा काम करने वाले डिस्पोजेबल रेजर अगर 'पिंक' यानी गुलाबी रंग के हों और महिलाओं के लिए ब्रांड किए गए हों, तो उनकी कीमत पुरुषों के रेजर से अक्सर 10% से 15% अधिक होती है। यही स्थिति शेविंग क्रीम और फोम के साथ भी है, जहाँ खुशबू या पैकेजिंग बदलकर महिलाओं से ज्यादा पैसे लिए जाते हैं।

2. हेयर केयर (शैम्पू, कंडीशनर और हेयर डाई)

बालों की देखभाल के मामले में भी महिलाएं ज्यादा खर्च करती हैं। शोध बताते हैं कि महिलाओं के शैम्पू और कंडीशनर की बोतलें पुरुषों के मुकाबले आकार में छोटी लेकिन कीमत में बड़ी होती हैं। यहाँ तक कि अगर कोई महिला सैलून में बाल कटवाने जाती है, तो उसे 'हेयरकट' के लिए पुरुषों से कहीं ज्यादा पैसे देने पड़ते हैं, भले ही बाल छोटे ही क्यों न हों।

3. स्किन केयर (मॉइस्चराइजर और फेस वॉश)

त्वचा की देखभाल के उत्पादों में भी यह भेदभाव साफ दिखता है। महिलाओं के मॉइस्चराइजर, आई क्रीम और फेस वॉश की सामग्री अक्सर पुरुषों के प्रोडक्ट्स जैसी ही होती है, लेकिन इनकी मार्केटिंग 'सॉफ्ट स्किन' या 'ब्यूटी' के नाम पर की जाती है, जिससे इनकी कीमत बढ़ जाती है। कंपनियों का तर्क होता है कि महिलाओं के प्रोडक्ट्स में ज्यादा रिसर्च और अलग खुशबू का इस्तेमाल होता है, लेकिन उपभोक्ता इसे पिंक टैक्स ही मानते हैं।

4. कपड़े और फुटवियर (Clothing & Shoes)

एक जैसी शर्ट या जींस के लिए भी महिलाओं को पुरुषों के मुकाबले ज्यादा भुगतान करना पड़ता है। महिलाओं के कपड़ों में अक्सर जेब छोटी होती है या नहीं होती, और फैब्रिक कम इस्तेमाल होने के बावजूद उनकी सिलाई और डिजाइन के नाम पर ऊंची कीमत वसूली जाती है। यही बात जूतों पर भी लागू होती है; महिलाओं के स्नीकर्स या फॉर्मल शूज अक्सर पुरुषों के बराबर के मॉडल्स से महंगे होते हैं।

5. ड्राई क्लीनिंग और लॉन्ड्री सेवाएं

हैरानी की बात यह है कि सेवाएं (Services) भी पिंक टैक्स से अछूती नहीं हैं। कई शहरों में ड्राई क्लीनिंग की दुकानों पर महिलाओं की शर्ट या ब्लाउज को साफ करने का चार्ज पुरुषों की शर्ट से ज्यादा लिया जाता है। दुकानदारों का तर्क होता है कि महिलाओं के कपड़े नाजुक होते हैं या उनके बटन अलग होते हैं, लेकिन असल में यह अतिरिक्त बोझ महिलाओं की जेब पर ही पड़ता है।

6. खिलौने और स्कूल का सामान

भेदभाव की शुरुआत बचपन से ही हो जाती है। खिलौनों की दुकानों में अगर आप एक जैसा स्कूटर या साइकिल देखें, तो 'पिंक' वर्जन की कीमत 'ब्लू' या 'न्यूट्रल' रंगों से ज्यादा हो सकती है। यहाँ तक कि लड़कियों के लिए बने स्कूल बैग और स्टेशनरी पर भी यह गुलाबी प्रीमियम वसूला जाता है।

7. हेल्थकेयर और सप्लीमेंट्स

महिलाओं के लिए बनाए गए मल्टी-विटामिन या हेल्थ सप्लीमेंट्स अक्सर पुरुषों के मुकाबले महंगे होते हैं। हालांकि इनमें सामग्री लगभग समान होती है, लेकिन इनकी 'विमेन स्पेशल' मार्केटिंग इन्हें प्रीमियम बना देती है।

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Richa Tripathi
रिचा त्रिपाठी author

रिचा त्रिपाठी टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में बिजनेस डेस्क पर सीनियर कॉपी एडिटर के रूप में कार्यरत हैं। मीडिया इंडस्ट्री में 7 वर्षों के अनुभव के साथ रिच... और देखें

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