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कभी EPFO पर मिलता था 12% ब्याज, जानें अब क्यों हो गया कम?

पिछले कुछ दशकों में, देश की आर्थिक स्थितियों के कारण ईपीएफ की ब्याज दरों में कई बदलाव हुए हैं। 1980 और 1990 के दशक में यह 12% के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया था, जबकि वर्तमान में यह 8% से 8.5% के आसपास बना हुआ है।

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EPFO Interest Rate Slashed

रिटायरमेंट के लिए पैसा बचाने का सबसे सुरक्षित और लोकप्रिय जरिया आज भी कर्मचारी भविष्य निधि संगठन यानी EPFO ही है। करोड़ों नौकरीपेशा भारतीयों का भविष्य इसी फंड पर टिका है। लेकिन पिछले कुछ सालों में पीएफ (PF) की ब्याज दरों ने निवेशकों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। लोग अक्सर यह सवाल पूछते हैं कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि जो ब्याज दरें कभी 12% के आसपास हुआ करती थीं, वे अब गिरकर काफी कम हो गई हैं? क्या आने वाले समय में ये और घट सकती हैं या बढ़ सकती हैं? आइए जानते हैं आखिर 12 फीसदी से ब्याज दरें क्यों घट गईं?

12% का वो 'गोल्डन एरा'

अगर हम इतिहास के पन्नों को पलटें, तो 1980 के दशक के अंत और 90 के दशक की शुरुआत का समय पीएफ निवेशकों के लिए किसी 'गोल्डन एरा' से कम नहीं था। उस दौरान EPFO अपने सदस्यों को 11.5% से लेकर 12% तक का सालाना ब्याज दिया करता था। उस समय महंगाई की स्थिति और निवेश के अन्य साधनों की तुलना में यह रिटर्न वाकई में शानदार था। सुरक्षित निवेश के साथ इतना अधिक रिटर्न मिलना मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए किसी वरदान जैसा था। लेकिन समय के साथ आर्थिक परिस्थितियां बदलीं और ब्याज दरों का ग्राफ नीचे की ओर आने लगा।

ब्याज दरें घटने का मुख्य कारण

पीएफ की ब्याज दरें सीधे तौर पर सरकार और EPFO द्वारा किए गए निवेश पर मिलने वाले रिटर्न से जुड़ी होती हैं। यह पैसा सरकारी बॉन्ड्स, कॉर्पोरेट बॉन्ड्स और कुछ हद तक शेयर बाजार (ETF के जरिए) में निवेश किया जाता है। पिछले कुछ वर्षों में, वैश्विक आर्थिक मंदी और बाजार के अनिश्चित माहौल के कारण इन निवेशों पर मिलने वाला औसत रिटर्न कम हो गया है। इसके अलावा, महंगाई को नियंत्रित करने के लिए केंद्रीय बैंकों की नीतियों ने भी ब्याज दरों को प्रभावित किया है। जब सरकारी प्रतिभूतियों (Government Securities) पर मिलने वाला रिटर्न कम होता है, तो स्वाभाविक रूप से उसका सीधा असर पीएफ की ब्याज दरों पर पड़ता है।

क्या अब और घट सकती है ब्याज दर?

EPFO की केंद्रीय न्यासी बोर्ड (CBT) हर साल ब्याज दरों पर फैसला लेती है। ब्याज दरें घटाने या बढ़ाने के पीछे का बड़ा कारण 'सरप्लस फंड' (Surplus) का प्रबंधन है। सरकार की कोशिश रहती है कि ब्याज दरें इतनी बनी रहें कि वे महंगाई दर (Inflation) को मात दे सकें। फिलहाल सरकार ने epfo पर मिलने वाले ब्याज को साल 2026-27 तक के लिए स्थिर रखा है. लेकिन भविष्य में यह देश की जीडीपी ग्रोथ, मुद्रास्फीति और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों पर काफी हद तक निर्भर करेगा। अगर बाजार का प्रदर्शन अच्छा रहता है, तो दरें स्थिर रह सकती हैं, अन्यथा दबाव बना रहना लाजमी है।

आपकी जेब पर कितना हुआ असर?

12% से आज के 8.5% (लगभग) के दौर तक के सफर को देखें, तो गणित सीधा है। अगर आप आज लंबी अवधि (20-30 साल) के लिए निवेश कर रहे हैं, तो ब्याज में 2-3 फीसदी की कमी भविष्य में मिलने वाली कुल मैच्योरिटी राशि में लाखों रुपये का अंतर पैदा कर सकती है। यही कारण है कि आज वित्तीय सलाहकार पीएफ के साथ-साथ अन्य विकल्पों जैसे म्यूचुअल फंड (SIP) या इक्विटी में भी छोटे हिस्से का निवेश करने की सलाह देते हैं, ताकि महंगाई को आसानी से पछाड़ा जा सके।

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Richa Tripathi
रिचा त्रिपाठी author

रिचा त्रिपाठी टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में बिजनेस डेस्क पर सीनियर कॉपी एडिटर के रूप में कार्यरत हैं। मीडिया इंडस्ट्री में 7 वर्षों के अनुभव के साथ रिच... और देखें

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