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मिडिल ईस्ट की जंग के बीच तेल तो सिर्फ ट्रेलर है, असली आग इस चीज में लगी है! एशिया से यूरोप तक मच जाएगा हाहाकार

ईरान-इजराइल और अमेरिका के बीच छिड़े युद्ध का असर तेल ही नहीं बल्कि एक ऐसी कमोडिटी पर पड़ने की ज्यादा सम्भावना जिसकी आम आदमी को सबसे ज्यादा जरुरत है. रेगिस्तानी खाड़ी देशों के लिए पानी ही वह 'स्ट्रैटेजिक कमोडिटी' है, जो युद्ध का पूरा रुख बदल देगी। आइए बताते हैं कैसे?

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Iran Israel.

ईरान और इजराइल के बीच दहकती आग ने पूरी दुनिया को खौफ में डाल दिया है। मिसाइलों और ड्रोनों के शोर के बीच अब तक सैकड़ों बेगुनाह अपनी जान गंवा चुके हैं और लाखों लोग अपना घर-बार छोड़कर सुरक्षित ठिकानों की तलाश में भाग रहे हैं। इस युद्ध की तपिश से दुनिया भर के शेयर बाजार झुलस रहे हैं और निवेशक अपना पैसा निकालकर सोने-चांदी जैसे सुरक्षित ठिकानों में लगा रहे हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस भीषण युद्ध में सबसे कीमती चीज 'तेल' नहीं है?

विशेषज्ञों और सीआईए US सेंट्रल एजेंसी (CIA) की मानें तो मिडिल ईस्ट में असली जंग कच्चे तेल या नेचुरल गैस के लिए नहीं, बल्कि पीने के पानी के लिए छिड़ सकती है। यह सुनने में अजीब लग सकता है, लेकिन रेगिस्तानी खाड़ी देशों के लिए पानी ही वह 'स्ट्रैटेजिक कमोडिटी' है, जो युद्ध का पूरा रुख बदल देगी। आइए बताते हैं कैसे?

पानी की हो जाएगी किल्लत

सीआईए की रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी अरब, कुवैत, कतर और यूएई जैसे खाड़ी देशों (GCC) की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि वहां तेल का भंडार तो है, लेकिन पीने के पानी की भारी किल्लत है। इन देशों की करीब 10 करोड़ आबादी अपनी प्यास बुझाने के लिए पूरी तरह से 'डिसेलिनेशन प्लांट्स' (समुद्र के पानी को पीने लायक बनाने वाली फैक्ट्रियां) पर निर्भर है। मिडिल ईस्ट में ऐसे करीब 450 प्लांट्स हैं। इकोनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, अगर ईरान इन प्लांट्स को निशाना बनाता है, तो खाड़ी देशों में ऐसा मानवीय संकट खड़ा होगा जिसकी कल्पना करना भी मुश्किल है। अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए ने दशकों पहले चेतावनी दी थी कि ये प्लांट्स इन देशों की सबसे बड़ी कमजोरी हैं। अगर इन पर हमला हुआ, तो बिना एक भी गोली चलाए बड़े-बड़े शहरों को खाली करना पड़ जाएगा।

90 फीसदी से ज्यादा पानी होता है सप्लाई

सऊदी अरब का उदाहरण लें तो वहां का 'जुबैल डिसेलिनेशन प्लांट' राजधानी रियाद को 90% से ज्यादा पीने के पानी की सप्लाई करता है। यह पानी 500 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन के जरिए पहुंचता है। साल 2008 की एक लीक हुई रिपोर्ट में साफ कहा गया था कि अगर इस प्लांट या इसकी पाइपलाइन को नुकसान पहुंचता है, तो रियाद जैसे बड़े शहर को महज एक हफ्ते के भीतर खाली करना पड़ेगा। वर्तमान में कुवैत, कतर और दुबई जैसे आधुनिक शहर पूरी तरह इन्हीं मशीनों के भरोसे टिके हैं। ईरान अच्छी तरह जानता है कि ये 'सॉफ्ट टारगेट्स' (आसान निशाने) हैं। हाल के दिनों में यूएई और कुवैत के पावर स्टेशनों और प्लांट्स के पास हुए ड्रोन हमलों ने इस डर को सच साबित कर दिया है।

युद्ध के नियमों के मुताबिक, नागरिक सुविधाओं जैसे पानी के प्लांट्स पर हमला करना एक अपराध माना जाता है, लेकिन इतिहास गवाह है कि जंग में 'टैबू' (वर्जनाएं) टूटते देर नहीं लगती। 1991 में सद्दाम हुसैन ने भी सऊदी के डिसेलिनेशन प्लांट्स को खराब करने की कोशिश की थी। आज ईरान की मिसाइलें इन सभी प्लांट्स की रेंज में हैं। अगर ईरान अपनी रणनीति बदलते हुए एनर्जी साइट्स और पानी के ठिकानों को बड़े पैमाने पर निशाना बनाता है, तो एशिया से लेकर यूरोप तक इसका 'रिपल इफेक्ट' देखने को मिलेगा। पानी की कमी से होने वाला पलायन और अस्थिरता पूरे वैश्विक व्यापार तंत्र को हिला देगी। संक्षेप में कहें तो, तेल की कीमतों में उछाल तो सिर्फ एक आर्थिक समस्या है, लेकिन पानी पर हमला एक ऐसी मानवीय त्रासदी होगी जो पूरी दुनिया को घुटनों पर ला सकती है।

Richa Tripathi
रिचा त्रिपाठीauthor

रिचा त्रिपाठी टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में बिजनेस डेस्क पर सीनियर कॉपी एडिटर के रूप में कार्यरत हैं। मीडिया इंडस्ट्री में 7 वर्षों के अनुभव के साथ रिचा, पर्सनल फाइनेंस, स्टॉक मार्केट, टैक्स प्लानिंग और अर्थव्यवस्था से जुड़े विषयों पर मजबूत पकड़ रखती हैं। अब तक 8,000 से अधिक कंटेंट लिख चुकी रिचा की विशेषता है—जटिल वित्तीय जानकारियों को सरल, स्पष्ट और भरोसेमंद तरीके से पाठकों तक पहुंचाना। वह ऐसी स्टोरीज तैयार करती हैं जो न केवल जानकारीपूर्ण होती हैं, बल्कि आम पाठक की वित्तीय समझ को बेहतर बनाने में भी मदद करती हैं।

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