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LPG Crisis: भटूरा लवर्स मायूस! 75 साल पुरानी ‘सीता राम दीवान चंद’ की दुकान हुई बंद

LPG Crisis: ‘सीता राम दीवान चंद’ के डायरेक्टर पुनीत कोहली, जो इस कारोबार को चला रहे तीसरी पीढ़ी हैं ने टाइम्स नाउ नवभारत से बातचीत में कहा कि एलपीजी संकट के कारण 75 साल में पहली बार वे इस पुश्तैनी दुकान को बंद करने को मजबूर हुए हैं। इससे भटूरा लवर्स तो मायूस हैं ही, 4 दुकानों में काम करने वाले करीब 80 स्टॉफ खाली बैठे हैं।

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सीता राम दीवान चंद छोले भटूरे की दुकान बंद

LPG Crisis: रविवार का दिन दिल्ली में छोले-भटूरे के शौकीनों के लिए खास माना जाता है। आमतौर पर इसी दिन इनकी सबसे ज्यादा बिक्री होती है, लेकिन इस बार एलपीजी संकट ने भटूरा लवर्स को मायूस कर दिया है। गैस सिलेंडर नहीं मिलने के कारण दिल्ली की मशहूर 75 साल पुरानी ‘सीता राम दीवान चंद’ की दुकानें बंद होने लगी हैं। आपको बता दें कि इस दुकान की शुरुआत साल 1950 में सीता राम दीवान चंद ने की थी। उन्होंने एक छोटी सी रेहड़ी से छोले-भटूरे बेचना शुरू किया और अपने बेहतरीन स्वाद के दम पर इसे दिल्ली की सबसे लोकप्रिय दुकानों में शामिल कर दिया। उनके निधन के बाद उनके बेटे प्राण कोहली ने कारोबार की जिम्मेदारी संभाली। अब इस आइकॉनिक दुकान को उनके बेटे पुनीत कोहली संभाल रहे हैं।

वर्तमान में पहाड़गंज, लक्ष्मी नगर, सादिक नगर, लाजपत नगर और कृष्णा नगर में इसकी कुल पांच दुकानें हैं। खासकर शनिवार और रविवार को छोले-भटूरे के शौकीन बड़ी संख्या में यहां पहुंचते हैं। हालांकि एलपीजी की किल्लत ने इन दुकानों को बंद करने पर मजबूर कर दिया है। दुकान प्रबंधन के अनुसार, गैस की कमी के कारण 4 दुकानें पहले ही बंद हो चुकी हैं। फिलहाल सादिक नगर वाली एक दुकान ही खुली है, लेकिन अगर गैस की आपूर्ति नहीं हुई तो वह भी कल तक बंद करनी पड़ सकती है।

पहाड़गंज आउटलेट पर रोजाना 500 प्लेट की बिक्री

‘सीता राम दीवान चंद’ की दुकान की लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पहाड़गंज वाले दुकान पर शाम में करीब 500 प्लेट छोले-भटूरे की बिक्री होती है। प्रति प्लेट 95 रुपया लिया जाता है लेकिन स्वाद के शौकीन इसके बावजूद यहां पर जमावड़ा लगाते हैं। दुकान की प्रबंधन देख रही ममता हमे ने टाइम्स नाउ हिंदी को बताया कि हमारा यूएसपी लाजवाब छोले और तवे वाले भूटरे हैं। हम भटूरे को तवा पर सेंक कर देते हैं जो दिल्ली या एनसीआर में शायद ही कही और मिलती है। इसलिए हम जो स्वाद अपने ग्राहकों को दे पाते हैं, वह दूसरा कोई नहीं दे पता। हमने 75 साल से क्वालिटी को लेकर किसी तरह का समझौता नहीं किया है। इसी का परिणाम है कि आज भी हमें लोगों के बीच अपनी एक अलग जगह बनाए हुए हैं।

कब फिर चालू कर पाएंगे कहना मुश्किल: पुनीत कोहली

‘सीता राम दीवान चंद’ के डायरेक्टर पुनीत कोहली, जो इस कारोबार को चला रहे तीसरी पीढ़ी हैं ने टाइम्स नाउ नवभारत से बातचीत में कहा कि एलपीजी संकट के कारण 75 साल में पहली बार वे इस पुश्तैनी दुकान को बंद करने को मजबूर हुए हैं। इससे भटूरा लवर्स तो मायूस हैं ही, 4 दुकानों में काम करने वाले करीब 80 स्टॉफ खाली बैठे हैं। उनके ऊपर भी संकट है। जब हमने पूछा की दुकान कब से शुरू होने की उम्मीद है तो उन्होंने कहा कि हम कह नहीं सकते हैं। सरकार ने जरूर कुछ कमर्शियल सिलेंडर देने की बात कही है लेकिन कोई भी डिस्ट्रीब्यूटर और वेंडर अभी कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं है। सभी का कहना है कि जरूरत जहां 1000 सिलेंडर की है, वहां पर 20 सिलेंडर से क्या होगा? ऐसे में अभी हालात पूरी तरह से ठीक होने में लंबा वक्त लग सकता है। कम से कम 10 दिन तो जरूर लग जाएंगे। हमारा काम ऐसा है कि हम न तो कोयले या लकड़ी पर इसे कर सकते हैं। इसलिए दुकान बंद रखने की मजबूरी है।

Sita Ram Diwan Chand chola bhatura shop

75 साल पुरानी दुकान बंद

लक्ष्मी नगर आउटलेट के बाहर ग्राहकों का दर्द

लक्ष्मी नगर आउटलेट के बाहर खड़े 35 वर्षीय मुकेश रमेश कुमार कहते हैं कि मैं पिछले 5 सालों से यहां आ रहा हूं। मेरे लिए संडे का मतलब ही सीता राम के छोले-भटूरे था। यहां के भटूरे बाकी जगहों की तरह बहुत ज्यादा तेल वाले नहीं होते। दिल्ली में छोले-भटूरे सिर्फ एक डिश नहीं, बल्कि एक भावना है। रविवार की सुबह परिवार या दोस्तों के साथ गरम-गरम भटूरे और मसालेदार छोले खाना यहां की संस्कृति का हिस्सा बन चुका है। ऐसे में जब किसी आइकॉनिक दुकान की कड़ाही ठंडी पड़ती है तो सिर्फ कारोबार ही नहीं रुकता, बल्कि उससे जुड़ी यादें और स्वाद भी थम जाती है। आज हमारे लिए कुछ ही दिन है। आज हम बिना भटूरे खाए यहां से लौट रहे हैं।

Alok Kumr
आलोक कुमार author

आलोक कुमार टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में एसोसिएट एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। इलेक्ट्रॉनिक, डिजिटल और प्रिंट मीडिया में 17 वर्षों से अधिक का व्यापक अनुभव रखने वाले आलोक ने अपने पत्रकारिता करियर में कई प्रमुख कॉर्पोरेट इवेंट्स और चर्चित स्टोरीज कवर की हैं। वह बिजनेस, बैंकिंग, शेयर मार्केट और पर्सनल फाइनेंस पर गहरी समझ रखते हैं और जटिल वित्तीय जानकारियों को सरल, स्पष्ट और पाठक-केंद्रित तरीके से प्रस्तुत करने में माहिर हैं। अब तक आलोक ने लगभग 18,000 स्टोरीज लिखी हैं। उनकी लेखन शैली भरोसेमंद, विश्लेषणात्मक और व्यावहारिक जानकारी देने वाली होती है।

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