आज के समय में प्रॉपर्टी या मकान की कीमतें आसमान छू रही हैं। ऐसे में अकेले के दम पर घर खरीदना हर किसी के बस की बात नहीं होती। यही वजह है कि लोग अपने पार्टनर, जीवनसाथी (पति/पत्नी), भाई या माता-पिता के साथ मिलकर जॉइंट प्रॉपर्टी (Joint Property) खरीदना ज्यादा पसंद करते हैं। जॉइंट में मकान खरीदने का सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि होम लोन मिलने में आसानी हो जाती है और दोनों पार्टनर्स को टैक्स में भी छूट का लाभ मिलता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि अगर पार्टनर के साथ मिलकर घर खरीदते समय कागजी कार्रवाई या पैसों के लेनदेन में थोड़ी सी भी लापरवाही की गई, तो यह सौदा आपको बहुत महंगा पड़ सकता है? देश के आयकर नियमों के मुताबिक, जॉइंट प्रॉपर्टी के मामलों में गड़बड़ी होने पर इनकम टैक्स विभाग (Income Tax Department) सीधे आपके घर कड़ा नोटिस भेज सकता है। इसलिए, किसी भी तरह की कानूनी मुसीबत से बचने के लिए कुछ बेहद जरूरी बातों और एक्सपर्ट्स के टिप्स को ध्यान में रखना बहुत जरूरी है।
जॉइंट प्रॉपर्टी खरीदते समय क्या है सबसे बड़ी गलती?
जॉइंट प्रॉपर्टी खरीदते समय जो सबसे पहली और सबसे बड़ी गलती लोग करते हैं, वह है सेल डीड (Sale Deed) यानी मकान की रजिस्ट्री के कागजात में मालिकाना हक का हिस्सा (Ownership Share) साफ-साफ न लिखना। अक्सर लोग रजिस्ट्री में दोनों पार्टनर्स का नाम तो लिखवा देते हैं, लेकिन यह तय नहीं करते कि उस घर में किसका कितना प्रतिशत हिस्सा है। टैक्स नियमों के हिसाब से अगर डीड में हिस्सा तय नहीं है, तो दोनों का आधा-आधा (50-50%) हक मान लिया जाता है। मुसीबत तब आती है जब एक पार्टनर ने 80% पैसा दिया हो और दूसरे ने सिर्फ 20%। ऐसी स्थिति में इनकम टैक्स विभाग दूसरे पार्टनर के हिस्से को 'गिफ्ट' या 'अघोषित आय' मानकर उस पर टैक्स और नोटिस ठोक सकता है। इसलिए, जब भी पार्टनर के साथ मकान खरीदें, तो सेल डीड के अंदर बिल्कुल साफ शब्दों में लिखवाएं कि किस पार्टनर का प्रॉपर्टी में कितना हिस्सा (जैसे 60:40 या 70:30) है।
पैसों के सोर्स का रखें सबूत
इसके बाद दूसरी सबसे जरूरी बात आती है पैसों के योगदान का पक्का सबूत (Proof of Contribution) अपने पास संभालकर रखना। मान लीजिए आपने और आपके पार्टनर ने मिलकर 1 करोड़ का फ्लैट खरीदा। इसमें से 60 लाख आपने दिए और 40 लाख आपके पार्टनर ने दिए। अब आपके पास इस बात का पूरा डिजिटल और कागजी रिकॉर्ड होना चाहिए कि यह पैसा कहां से आया। दोनों पार्टनर्स को अपने-अपने बैंक खातों से ही अपनी हिस्सेदारी का भुगतान करना चाहिए। अगर कोई पार्टनर कैश में पेमेंट कर रहा है या किसी तीसरे खाते से पैसा ट्रांसफर हो रहा है, तो इनकम टैक्स विभाग तुरंत उस ट्रांजैक्शन को अपनी रडार पर ले लेगा। भविष्य में किसी भी पूछताछ से बचने के लिए बैंक स्टेटमेंट, चेक की कॉपियां और पेमेंट की रसीदें हमेशा एक फाइल में सुरक्षित रखें ताकि जरूरत पड़ने पर आप यह साबित कर सकें कि दोनों ने अपने वैध और टैक्स-पेड पैसों से ही घर खरीदा है।
होम लोन और को-एप्लिकेंट
तीसरा बड़ा नियम होम लोन (Home Loan) के रीपेमेंट और उस पर मिलने वाली टैक्स छूट से जुड़ा हुआ है। अक्सर लोग जॉइंट होम लोन तो ले लेते हैं, लेकिन उसकी ईएमआई (EMI) का भुगतान केवल एक ही पार्टनर के खाते से होता है। इनकम टैक्स के सेक्शन 24 और 80C के तहत टैक्स छूट का दावा केवल वही पार्टनर कर सकता है जो प्रॉपर्टी का को-ओनर (Co-owner) भी हो और लोन की ईएमआई में अपना वित्तीय योगदान दे रहा हो। अगर आप लोन में केवल को-एप्लीकेंट हैं लेकिन आपका प्रॉपर्टी में कोई मालिकाना हक नहीं है या आप ईएमआई नहीं भर रहे हैं, तो आप टैक्स छूट का दावा नहीं कर सकते। गलत तरीके से क्लेम करने पर टैक्स विभाग का नोटिस आना तय है।
इसके अलावा, 50 लाख से अधिक की प्रॉपर्टी खरीदने पर काटे जाने वाले 1% टीडीएस (TDS) के नियम का भी ध्यान रखें। जॉइंट प्रॉपर्टी के मामले में दोनों खरीदारों को अपने-अपने हिस्से के हिसाब से अलग-अलग टीडीएस फॉर्म (Form 26QB) भरना होता है।
