Indian economy News : भारत की अर्थव्यवस्था ने वित्त वर्ष 2025-26 में उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन किया है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) के ताजा आंकड़ों के अनुसार, देश की जीडीपी वृद्धि (GDP growth) दर 7.7 प्रतिशत रही। यह पहले के दूसरे अग्रिम अनुमान 7.6 प्रतिशत से थोड़ी अधिक है, जो आर्थिक मजबूती को दिखाता है। जनवरी-मार्च 2026 की तिमाही में भी अर्थव्यवस्था ने अच्छा प्रदर्शन किया और जीडीपी वृद्धि 7.8 प्रतिशत रही। हालांकि यह अक्टूबर-दिसंबर तिमाही के 8 प्रतिशत से थोड़ी कम है, लेकिन फिर भी इसे मजबूत माना जा रहा है।
घरेलू मांग बनी विकास की मुख्य ताकत
न्यूज एजेंसी पीटीआई-भाषा के मुताबिक अर्थशास्त्रियों का कहना है कि भारत की आर्थिक वृद्धि का मुख्य कारण मजबूत घरेलू मांग रही है। देश में लोगों की खपत (खरीदारी) और निजी निवेश लगातार बढ़ रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस मजबूती की वजह से भारत पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और वैश्विक अनिश्चितताओं के असर को काफी हद तक संभाल सका है। यानी बाहरी दबावों के बावजूद देश की आर्थिक गतिविधियां स्थिर बनी रहीं।
उद्योग और सेवाओं में मिला संतुलित विकास
डेलॉयट इंडिया की अर्थशास्त्री रुमकी मजूमदार के अनुसार, इस बार की वृद्धि सिर्फ किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह व्यापक स्तर पर देखने को मिली है। सेवा क्षेत्र, विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) और निर्माण (कंस्ट्रक्शन) तीनों में सुधार हुआ है। सकल मूल्य वर्धन (जीवीए) की वृद्धि दर 7.9 प्रतिशत रही, जो जीडीपी से भी अधिक है। यह संकेत देता है कि उत्पादन और मांग दोनों मजबूत स्थिति में हैं।
वैश्विक जोखिमों से बढ़ सकती हैं मुश्किलें
हालांकि विशेषज्ञ आने वाले समय को लेकर सावधानी बरतने की सलाह दे रहे हैं। उनका कहना है कि वित्त वर्ष 2026-27 में आर्थिक वृद्धि की रफ्तार धीमी हो सकती है और यह 6.5 से 6.6 प्रतिशत के बीच रह सकती है। इसके पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं। कच्चे तेल और अन्य वस्तुओं की बढ़ती कीमतें, पश्चिम एशिया में जारी तनाव, वैश्विक अर्थव्यवस्था की धीमी रफ्तार, सप्लाई चेन में रुकावटें, सामान्य से कमजोर मानसून की आशंका। इन सभी कारणों से भारत की विकास दर पर दबाव पड़ सकता है।
बढ़ती लागत और महंगाई बनी चिंता
क्रिसिल और एचडीएफसी बैंक जैसी संस्थाओं का मानना है कि बढ़ती लागत और महंगाई भी एक बड़ा जोखिम है। इसके अलावा निर्यात में कमजोरी और निवेश गतिविधियों में गिरावट भी अर्थव्यवस्था की गति को धीमा कर सकती है। एचडीएफसी बैंक ने कहा है कि भले ही पिछला साल अच्छा रहा हो, लेकिन इसे आगे के वर्षों पर सीधे लागू नहीं किया जा सकता। आने वाले महीनों में वैश्विक तनाव का असर भारतीय आंकड़ों में धीरे-धीरे दिख सकता है।
सरकारी निवेश और ग्रामीण मांग से मिला सहारा
विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार के पूंजीगत खर्च (इंफ्रास्ट्रक्चर पर निवेश) और स्थिर ईंधन कीमतों ने अर्थव्यवस्था को बड़ा सहारा दिया है। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में मांग मजबूत बनी रही। खासकर चौथी तिमाही में निजी निवेश ने सरकारी निवेश में आई थोड़ी सुस्ती की भरपाई की।
मजबूत आधार, लेकिन सावधानी जरूरी
कुल मिलाकर भारत की अर्थव्यवस्था अभी मजबूत स्थिति में है और घरेलू मांग इसका मुख्य आधार बनी हुई है। लेकिन वैश्विक अनिश्चितताओं और बढ़ती लागत के कारण आने वाले वित्त वर्ष में चुनौतियां बढ़ सकती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि सही नीतिगत कदम और मजबूत घरेलू मांग भारत को इन बाहरी झटकों से बचाने में मदद कर सकते हैं।
