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US IRAN War का भारत पर व्यापक असर, 6% रह सकती है ग्रोथ : गीता गोपीनाथ

हार्वर्ड की प्रोफेसर और आईएमएफ की पूर्व फर्स्ट डिप्टी मैनेजिंग डायरेक्टर गीता गोपीनाथ का कहना है कि वेस्ट एशिया तनाव से भारत सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है। अगर यह संकट लंबा खिंचता है, तो भारत की ग्रोथ पर असर होगा।

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गीता गोपीनाथ ने बताया क्यों मुश्किल में भारत

अमेरिका-ईरान के बीच जारी तनाव का भारत की अर्थव्यवस्था पर गहरा असर पड़ सकता है। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की पूर्व फर्स्ट डिप्टी मैनेजिंग डायरेक्टर गीता गोपीनाथ (Gita Gopinath) ने ET Now को दिए इंटरव्यू में कहा कि अगर यह संकट लंबा खिंचता है, तो महंगाई, भुगतान संतुलन और रुपये पर दबाव के चलते ग्रोथ पर असर पड़ सकता है।

गीता गोपीनाथ के मुताबिक, भारत असल में तेल, गैस, उर्वरक और रेमिटेंस के लिहाज से मिडल ईस्ट पर काफी हद तक निर्भर है। लिहाजा, पश्चिम एशिया में तनाव के बाद ऑयल प्राइस के झटके का असर कई मोर्चों पर दिखाई देगा। होर्मुज स्ट्रेट की रुकावट से व्यापक सप्लाई शॉक गहरा सकता है, जिससे तेल, गैस, उर्वरक और अन्य जरूरी वस्तुओं का संकट गहरा हो सकता है।

भारत सीधे और सबसे ज्यादा प्रभावित

गीता गोपीनाथ ने कहा कि भारत उन देशों में शामिल है, जो अमेरिका-ईरान के बीच जारी संघर्ष की वजह से उपजे घटनाक्रमों से सीधे तौर पर प्रभावित हैं। तेल, गैस और उर्वरक के आयात को लेकर भारत की पश्चिम एशिया पर निर्भरता के साथ ही रेमिटेंस की आवक जैसे कारक भारतीय अर्थव्यवस्था को अलग-अलग तरह से प्रभावित कर रहे हैं।

6 फीसदी तक सिमट सकती है ग्रोथ

गीता गोपीनाथ ने कहा कि इस साल भारत की जीडीपी ग्रोथ रेट करीब 6.5% फीसदी रहने का अनुमान है। लेकिन, अगर पश्चिम एशिया का सप्लाई चेन संकट लंबा खिंचता है, तो भारत की ग्रोथ 6 फीसदी तक सिमट सकती है। उन्होंने कहा कि अगर युद्ध जारी रहता है, तो आने वाले महीनों में उर्वरक की कमी खेती-बाड़ी और कृषि उत्पादन को प्रभावित कर सकती है। इससे खाद्य महंगाई बढ़ने का खतरा है।

सोलर से मिली राहत बड़ी राहत

उन्होंने कहा कि भारत ने रिन्यूएबल एनर्जी पर निर्भरता बढ़ाने में तेज प्रगति की है, जो राहत देने वाली बात है। खासकर सोलर एनर्जी के जरिए भारत नेऊर्जा आत्मनिर्भरता बढ़ाई है, जिसकी वजह से इस संकट का भारत पर असर कुछ हद तक कम हुआ है। गीता गोपीनाथ ने कहा कि इस संकट से सबसे बड़ा सबक ऊर्जा स्वतंत्रता का है, खासकर रिन्यूएबल एनर्जी के जरिए। साथ ही, स्थिर दौर में मजबूत मैक्रोइकॉनॉमिक नीतियां संकट के समय अर्थव्यवस्था को सहारा देती हैं। भारत की नियंत्रित महंगाई और अनुशासित राजकोषीय नीति ने उसे कुछ नीति-लचीलापन दिया है, जो ऐसे समय में काम आता है।

भारत के उपभोक्ताओं पर अभी नहीं पड़ी मार

गोपीनाथ ने कहा कि भारत के उपभोक्ताओं ने अभी तक बढ़ी हुई ऊर्जा लागत का पूरा असर महसूस नहीं किया है, क्योंकि ईंधन महंगा होने के बावजूद उसकी कीमतें पूरी तरह पास-ऑन नहीं की गई हैं। इम्पोर्टर फिलहाल काफी हद तक यह बोझ खुद उठा रहे हैं, लेकिन यह व्यवस्था लंबे समय तक टिकाऊ नहीं है। उन्होंने कहा कि एयरलाइंस पहले ही जेट फ्यूल की बढ़ती कीमतों से दबाव में हैं। आगे का असर महंगाई की उम्मीदों पर निर्भर करेगा।

सरकार इस झटके से निपटने में सक्षम

गीता गोपीनाथ ने कहा कि सरकार के पास इस झटके से निपटने के लिए पर्याप्त फिस्कल स्पेस है, लेकिन इसका इस्तेमाल सावधानी से होना चाहिए। उन्होंने कहा कि लागत का कुछ हिस्सा उपभोक्ताओं पर जाएगा, कुछ इम्पोर्टरों और मध्यस्थों पर रहेगा और कुछ सरकार को वहन करना पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि यह बोझ मोटे तौर पर तीन हिस्सों में बंट सकता है।

रुपये पर बढ़ेगा दबाव

गीता गोपीनाथ ने कहा कि फिलहाल इस संकट का सीध असर बैलेंस ऑफ पेमेंट्स पर पड़ रहा है। भारत का करेंट अकाउंट डेफिसिट फिलहाल जीडीपी के करीब 1 फीसदी पर है, लेकिन ऊर्जा आयात महंगा होने से यह और बढ़ सकता है। अगर इसके साथ कैपिटल फ्लो भी कमजोर हुआ, तो रुपये पर और दबाव बढ़ेगा। उन्होंने कहा कि कुछ हद तक रुपया कमजोर होना एक स्वाभाविक और उचित प्रतिक्रिया होगी।

रिजर्व बैंक का दखल संभव

गीता गोपीनाथ ने कहा कि रिजर्व बैंक की तरफ से रुपये को स्थिर रखने के और वित्तीय स्थिरता बनाए रखने के लिए दखल किया जा सकता है। लेकिन, यह तभी उचित होगा, जब अवमूल्यन से महंगाई की उम्मीदें बिगड़ने लगें या वित्तीय स्थिरता पर असर पड़े। अभी ऐसे मजबूत संकेत नहीं दिख रहे हैं।

विदेशी मुद्रा भंडार पर्याप्त

गीता गोपीनाथ ने कहा कि भारत के विदेशी मुद्रा भंडार अभी स्वस्थ स्तर पर हैं, लेकिन उनका इस्तेमाल सावधानी से होना चाहिए। अगर रुपये की रक्षा में आक्रामक हस्तक्षेप किया गया तो भंडार तेजी से घट सकते हैं। फिलहाल महंगाई की उम्मीदें नियंत्रित हैं और वित्तीय दबाव भी सीमित है, इसलिए भारी हस्तक्षेप की जरूरत नहीं है।

ब्याज दर बढ़ने की संभावना कम

गीता गोपीनाथ ने कहा कि केंद्रीय बैंक फिलहाल अधिक सतर्क रुख अपना रहा है। बैंक की तरफ से फिलहाल ब्याज दर में कटौती अपेक्षित नहीं है। इसके साथ ही तत्काल दरें बढ़ाने की संभावना भी कम है, क्योंकि मांग में तेज उछाल नहीं है। सरकार को कैपेक्स बनाए रखना चाहिए, क्योंकि यह वृद्धि को सहारा देता है और इसका मल्टिप्लायर इफेक्ट मजबूत होता है। इसके उलट, अन्य गैर-जरूरी खर्च पर कड़ी नजर रखनी पड़ सकती है।

रक्षा खर्च को टिकाऊ बनाना जरूरी

गीता गोपीनाथ ने कहा कि रक्षा खर्च दुनियाभर में बढ़ रहा है, लेकिन इसे टिकाऊ तरीके से फाइनेंस करना होगा। इसका आर्थिक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि खर्च घरेलू उद्योगों को सपोर्ट करता है या आयात पर निर्भर रहता है। अगर खर्च देश में उत्पादन को बढ़ावा देता है, तो उसका सकारात्मक असर भी हो सकता है।

क्रूड ग्रोथ के लिए ब्रेकर

गीता गोपीनाथ ने कहा कि आईएमएफ के एक अनुमान के मुताबिक अगर तेल की औसत कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचती है, तो ग्लोबल जीडीपी ग्रोथ 2 से 2.5 फीसदी तक गिर सकती है। इसका असर भारत पर भी पड़ेगा और देश की वृद्धि 6 फीसदी के करीब फिसल सकती है। अगर हालात जल्दी सुधरते हैं, तो रिकवरी में 6 से 8 महीने लग सकते हैं। लेकिन अगर व्यवधान लंबे चले या इन्फ्रास्ट्रक्चर को नुकसान हुआ, तो सुधार में कई साल लग सकते हैं।

Sajeet Manghat
Sajeet Manghatauthor

Sajeet Manghat is a senior business journalist and editorial leader with over 20 years of experience covering financial markets, corporate strategy, and the global economy. As Senior Executive Editor at ET NOW and ET NOW Swadesh, he drives editorial vision and leads high-impact coverage on equities, macro trends, and policy developments shaping India’s growth story. Sajeet has previously held key leadership roles at NDTV Profit, BQ Prime and BloombergQuint, and spent over a decade at CNBC-TV18, where he served in multiple capacities including Deputy National News Editor, Chief of Bureau (Mumbai), and Head of Research. Across these roles, he has built a reputation for sharp market insights, data-led storytelling, and the ability to decode complex financial trends for a wide audience. He is known for his nuanced perspectives on capital markets, emerging sectors, and India’s positioning in the global economic landscape. His areas of expertise include equity markets, investment strategy, corporate earnings, and the intersection of policy and business. Sajeet has further strengthened his professional expertise through executive education programs from the Wharton School of the University of Pennsylvania, enhancing his understanding of global finance, leadership, and strategic decision-making.

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