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शिप से तेल लाने में कितना आता है खर्च? यूं नहीं दुनिया में नहीं मची है खलबली

दुनियाभर में कच्चे तेल की कीमतों को केवल उत्पादन ही नहीं, बल्कि शिपिंग और लॉजिस्टिक्स का खर्च भी तय करता है। वर्तमान वैश्विक तनाव और समुद्री रास्तों (जैसे रेड सी) में पैदा हुई बाधाओं ने जहाजों का किराया कई गुना बढ़ा दिया है। एक बड़े टैंकर से तेल लाने में ईंधन, बीमा, और सुरक्षा का जो भारी-भरकम खर्च आता है, वह सीधे आपकी जेब और देश की अर्थव्यवस्था पर असर डालता है।

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Ship Cost of Oil Tanker

आज जब हम पेट्रोल पंप पर अपनी गाड़ी में ईंधन भरवाते हैं, तो हमारा ध्यान सिर्फ तेल की कीमत पर होता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि हजारों मील दूर अरब देशों या रूस से निकलकर यह तेल भारत के बंदरगाहों तक कैसे पहुंचता है? दरअसल, दुनिया का 80% से ज्यादा व्यापार समुद्र के रास्ते विशाल जहाजों (Oil Tankers) के जरिए होता है। आज (मार्च 2026) जब मिडिल ईस्ट में तनाव चरम पर है और लाल सागर (Red Sea) जैसे समुद्री रास्ते युद्ध के मैदान बन गए हैं, तब शिपिंग की लागत में हुई बेतहाशा बढ़ोतरी ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को हिलाकर रख दिया है। आइए बताते हैं कि शिप से तेल लाने का खर्च कैसे तय होता है और क्यों यह आज पूरी दुनिया के लिए सिरदर्द बन गया है।

कैसे तय होता है शिपिंग का खर्च?

समुद्र के रास्ते तेल मंगाने का खर्च मुख्य रूप से दो बातों पर निर्भर करता है जहाज का किराया (Freight Rates) और ईंधन की लागत (Bunker Fuel)। एक कच्चा तेल ढोने वाला जहाज (VLCC), जो करीब 20 लाख बैरल तेल ले जा सकता है, उसका एक दिन का किराया सामान्य दिनों में $30,000 से $40,000 के बीच होता था। लेकिन युद्ध और संकट के समय यह किराया रातों-रात $1,00,000 के पार पहुंच जाता है। इसके अलावा, जिस जहाज में तेल लाया जाता है, वह खुद भी बहुत ज्यादा ईंधन पीता है। अगर कच्चे तेल की कीमतें $119 (जैसा कि आज का भाव है) तक पहुंच जाएं, तो जहाज चलाने का खर्च भी बढ़ जाता है, जिसका सीधा बोझ उपभोक्ता यानी आपकी जेब पर पड़ता है।

समुद्री रास्तों का 'खूनी खेल' और बीमा

यूं ही दुनिया में खलबली नहीं मची है; इसके पीछे सबसे बड़ा कारण है 'युद्ध जोखिम प्रीमियम' (War Risk Premium)। जब तेल ले जाने वाले जहाज होर्मुज की जलडमरूमध्य या लाल सागर जैसे अशांत इलाकों से गुजरते हैं, तो बीमा कंपनियां अपना चार्ज 10 से 20 गुना तक बढ़ा देती हैं। मार्च 2026 की ताजा स्थिति को देखें, तो मिसाइल हमलों के डर से बीमा की लागत इतनी बढ़ गई है कि कई कंपनियों ने इन रास्तों से जाना ही बंद कर दिया है। जब रास्ता बदला जाता है (जैसे स्वेज नहर की जगह अफ्रीका का चक्कर काटना), तो यात्रा का समय 12-15 दिन बढ़ जाता है। सफर लंबा होने का मतलब है ज्यादा ईंधन, ज्यादा स्टाफ की सैलरी और ज्यादा किराया। यही वजह है कि तेल की मूल कीमत वही रहने के बावजूद, आप तक पहुंचते-पहुंचते वह बहुत महंगा हो जाता है।

शिपिंग संकट का भारत पर असर

भारत अपनी जरूरत का लगभग 85% तेल समुद्र के रास्ते ही मंगाता है। आंकड़ों के अनुसार, शिपिंग लागत में होने वाली हर 10% की बढ़ोतरी भारत के आयात बिल को अरबों डॉलर बढ़ा देती है। वर्तमान में रूस-यूक्रेन और ईरान-इजरायल तनाव के कारण 'टैंकरों' की भारी कमी हो गई है। अधिकतर जहाज सुरक्षित रास्तों की तलाश में लंबे चक्कर लगा रहे हैं, जिससे भारत के बंदरगाहों पर तेल पहुंचने में देरी हो रही है। इस देरी और बढ़ते खर्च के कारण ही तेल कंपनियों का मुनाफा घाटे में बदल रहा है। अगर शिपिंग का यह संकट इसी तरह जारी रहा, तो कच्चे तेल की कीमत $119 होने के बावजूद, लॉजिस्टिक खर्च इसे $130 के असर जितना महंगा बना देगा।

Richa Tripathi
रिचा त्रिपाठीauthor

रिचा त्रिपाठी टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में बिजनेस डेस्क पर सीनियर कॉपी एडिटर के रूप में कार्यरत हैं। मीडिया इंडस्ट्री में 7 वर्षों के अनुभव के साथ रिचा, पर्सनल फाइनेंस, स्टॉक मार्केट, टैक्स प्लानिंग और अर्थव्यवस्था से जुड़े विषयों पर मजबूत पकड़ रखती हैं। अब तक 8,000 से अधिक कंटेंट लिख चुकी रिचा की विशेषता है—जटिल वित्तीय जानकारियों को सरल, स्पष्ट और भरोसेमंद तरीके से पाठकों तक पहुंचाना। वह ऐसी स्टोरीज तैयार करती हैं जो न केवल जानकारीपूर्ण होती हैं, बल्कि आम पाठक की वित्तीय समझ को बेहतर बनाने में भी मदद करती हैं।

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