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1 बैरल क्रूड ऑयल को रिफाइन करने का खर्चा कितना? लागत, लेबर और ट्रांसपोर्टेशन का पूरा हिसाब-किताब

जमीन से निकलने वाला कच्चा तेल सीधे गाड़ियों में नहीं डाला जा सकता। इसे 'रिफाइनरी' में ले जाकर एक जटिल प्रक्रिया से गुजारा जाता है। ऐसे में आइए आपको बताते हैं आपकी गाड़ी में भरने वाला पेट्रोल-डीजल क्रूड ऑयल से बनने में कितना खर्चा आता है?

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crude oil prices

जब भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतें बढ़ती हैं, तो हमारे मन में सबसे पहला सवाल यही आता है कि आखिर पेट्रोल और डीजल हमारे पास पहुंचते-पहुंचते इतने महंगे क्यों हो जाते हैं? क्या सारा खेल कच्चे तेल की कीमत का है, या उसे रिफाइन करने में भी भारी-भरकम खर्च आता है? दरअसल, जमीन से निकलने वाला कच्चा तेल सीधे गाड़ियों में नहीं डाला जा सकता। इसे 'रिफाइनरी' में ले जाकर एक जटिल प्रक्रिया से गुजारा जाता है। आइए आज आसान भाषा में समझते हैं कि 1 बैरल कच्चे तेल को रिफाइन करने में कितनी लागत आती है और उसमें लेबर से लेकर ट्रांसपोर्टेशन तक का क्या हिसाब-किताब रहता है।

1 बैरल=कितने लीटर?

सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि 1 बैरल का मतलब लगभग 159 लीटर होता है। जब कोई कंपनी कच्चा तेल खरीदती है, तो रिफाइनरी में पहुंचने के बाद उसका 'प्रोसेसिंग कॉस्ट' शुरू होता है। एक औसत अनुमान के अनुसार, 1 बैरल तेल को रिफाइन करने का परिचालन खर्च (Operating Cost) लगभग $3 से $6 (करीब 250 से 500 रुपये) के बीच आता है। इस खर्च में रिफाइनरी को चलाने के लिए भारी मात्रा में लगने वाली बिजली, फ्यूल गैस, और कच्चे तेल को अलग-अलग हिस्सों में तोड़ने के लिए इस्तेमाल होने वाले महंगे केमिकल्स और कैटालिस्ट शामिल होते हैं। यह प्रक्रिया 24 घंटे चलती है, इसलिए ऊर्जा की खपत इस लागत का सबसे बड़ा हिस्सा होती है।

लेबर और मेंटेनेंस

अब बात करते हैं लेबर और मेंटेनेंस की। एक रिफाइनरी को चलाने के लिए हजारों कुशल इंजीनियरों, टेक्नीशियनों और सुरक्षा कर्मियों की जरूरत होती है। लेबर कॉस्ट सीधे तौर पर रिफाइनरी की लोकेशन और उसकी तकनीक पर निर्भर करती है। भारत जैसे देश में, जहां अत्याधुनिक रिफाइनरियां (जैसे रिलायंस या आईओसीएल) हैं, वहां सुरक्षा मानकों और ऑटोमेशन पर भी काफी निवेश किया जाता है। मेंटेनेंस का खर्चा भी काफी ज्यादा होता है क्योंकि जंग और अत्यधिक तापमान के कारण पाइपों और मशीनों की लगातार जांच और मरम्मत करनी पड़ती है। यह सब मिलाकर प्रति बैरल लागत में एक महत्वपूर्ण हिस्सा जोड़ता है।

लागत का एक और बड़ा स्तंभ है ट्रांसपोर्टेशन और लॉजिस्टिक्स। कच्चा तेल बंदरगाह से रिफाइनरी तक पाइपलाइनों के जरिए आता है, जिसका किराया (Pumping Cost) देना पड़ता है। एक बार तेल रिफाइन होकर पेट्रोल, डीजल, जेट फ्यूल और एलपीजी में बदल जाए, तो इसे ट्रकों या ट्रेन (Railway Wagons) के जरिए देशभर के डिपो और फिर पेट्रोल पंपों तक भेजा जाता है। दूरी जितनी ज्यादा होगी, ट्रांसपोर्टेशन का खर्च उतना ही बढ़ेगा। औसतन, ट्रांसपोर्टेशन का खर्च प्रति लीटर पर 2 से 4 रुपये तक का असर डाल सकता है।

तेल कंपनियों का मुनाफा

तेल कंपनियों के मुनाफे को समझने के लिए GRM (Gross Refining Margin) को समझना जरूरी है। मान लीजिए एक कंपनी ने $95 में 1 बैरल तेल खरीदा और उसे रिफाइन करके जो उत्पाद बेचे, उनसे उसे $105 मिले। तो यह $10 का अंतर उसका GRM है। इसी $10 में से कंपनी को अपना रिफाइनिंग खर्च, लेबर की सैलरी, ब्याज और टैक्स निकालना होता है। अंत में जो बचता है, वही कंपनी का असली मुनाफा होता है। मार्च 2026 की स्थिति में, बढ़ती ऊर्जा लागत के कारण रिफाइनिंग मार्जिन पर काफी दबाव देखा जा रहा है।

Richa Tripathi
रिचा त्रिपाठीauthor

रिचा त्रिपाठी टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में बिजनेस डेस्क पर सीनियर कॉपी एडिटर के रूप में कार्यरत हैं। मीडिया इंडस्ट्री में 7 वर्षों के अनुभव के साथ रिचा, पर्सनल फाइनेंस, स्टॉक मार्केट, टैक्स प्लानिंग और अर्थव्यवस्था से जुड़े विषयों पर मजबूत पकड़ रखती हैं। अब तक 8,000 से अधिक कंटेंट लिख चुकी रिचा की विशेषता है—जटिल वित्तीय जानकारियों को सरल, स्पष्ट और भरोसेमंद तरीके से पाठकों तक पहुंचाना। वह ऐसी स्टोरीज तैयार करती हैं जो न केवल जानकारीपूर्ण होती हैं, बल्कि आम पाठक की वित्तीय समझ को बेहतर बनाने में भी मदद करती हैं।

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