Hidden Costs of Buying a House in India: आज के समय में घर खरीदना केवल फ्लैट या मकान की बेस कीमत चुकाने तक सीमित नहीं रह गया है। प्रॉपर्टी खरीदते समय बहुत से लोग केवल रजिस्ट्री और स्टांप ड्यूटी को ही अतिरिक्त खर्च मान लेते हैं लेकिन हकीकत कुछ और होती है। एक्सपर्ट्स मानते हैं कि प्रॉपर्टी को लेकर अतिरिक्त खर्च इससे बढ़कर होता है। यहां तक कि कुछ मामलों में घर की फाइनल यानी अंतिम कीमत बेस कीमत से 25 प्रतिशत तक बढ़ जाती है। यानी घर खरीदने से पहले केवल बेस प्राइस देखकर फैसला लेना सही नहीं होगा। अगर आप भी घर खरीदने का प्लान बना रहे हैं तो कुल संभावित खर्च का पूरा हिसाब पहले से समझ लेना चाहिए। इससे बाद में वित्तीय दबाव और बजट बिगड़ने जैसी समस्याओं से बचा जा सकता है।
GST एक बड़ा अतिरिक्त खर्च

Home buying (Photo: iStock)
अंडर-कंस्ट्रक्शन प्रॉपर्टी खरीद रहे हैं तो GST एक बड़ा अतिरिक्त खर्च बन सकता है। इसके अलावा, पार्किंग फीस, क्लब मेंबरशिप चार्ज, मेंटेनेंस डिपॉजिट और प्रीफर्ड लोकेशन चार्ज जैसी रकम भी अलग से ली जाती है। कई प्रोजेक्ट्स में ऊंची मंजिल या बेहतर व्यू वाले फ्लैट्स के लिए अतिरिक्त पैसे देने पड़ते हैं।
पार्किंग चार्ज
एक्सपर्ट्स की मानें तो प्रीमियम प्रोजेक्ट्स में केवल पार्किंग चार्ज ही लाखों रुपये तक पहुंच सकता है। इसके अलावा अगर खरीदार अतिरिक्त सुविधाएं जैसे क्लब हाउस, जिम या स्पोर्ट्स एरिया चाहता है, तो उसकी कीमत भी अलग से जुड़ती है।
फ्लोर राइज और प्रीफरेंशियल लोकेशन चार्ज
विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि कई बार खरीदारों को इन अतिरिक्त चार्जेस की पूरी जानकारी शुरुआती बुकिंग के समय साफ तौर पर समझ नहीं आती। बाद में जब एग्रीमेंट या फाइनल पेमेंट की बारी आती है, तब उन्हें पता चलता है कि कुल खर्च अनुमान से काफी ज्यादा हो चुका है। खासकर फ्लोर राइज चार्ज और प्रीफरेंशियल लोकेशन चार्ज जैसी चीजें अंतिम कीमत को तेजी से बढ़ा सकती हैं।
लीगल फीस, इंटीरियर खर्च
इसके अलावा लीगल फीस, इंटीरियर खर्च, सोसायटी डिपॉजिट और कॉर्पस फंड जैसे खर्च भी होमबायर के बजट पर असर डालते हैं। कई खरीदार केवल प्रॉपर्टी की कीमत और Home Loan EMI पर ध्यान देते हैं, लेकिन इंटीरियर, फर्नीचर, बिजली फिटिंग और किचन सेटअप पर होने वाला खर्च अलग से भारी पड़ सकता है।
हालांकि, RERA के आने से प्रोजेक्ट्स में पारदर्शिता पहले के मुकाबले बढ़ी है। अब बिल्डर्स को कई चार्जेस पहले से बताने होते हैं। हालांकि अलग-अलग प्रोजेक्ट्स में फीस और अतिरिक्त शुल्क का कोई एक समान ढांचा अभी भी मौजूद नहीं है। इसी वजह से हर बिल्डर और हर प्रोजेक्ट की प्राइसिंग अलग दिखाई देती है।
