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GST 2.0: फंसा पैसा होगा अनलॉक! सुधरेगा कंपनियों का कैश फ्लो, बिना रेट कट मिलेगी राहत!

इस सप्ताह दो बड़े इवेंट हैं। एक तरफ MPC और दूसरी तरफ GST काउंसिल की बैठक होनी है। MPC जहां रेट हाइक से कारोबारियों को झटका दे सकती है। वहीं, GST काउंसिल के कुछ फैसले राहत दे सकते हैं।

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GST रेट कट के बिना मिलेगी राहत

GST 2.0: 57th GST Council Meeting : फिलहाल पूरे देश की नजर 7 अक्टूबर पर है। क्योंकि, इस दिन दो अहम बैठकों के नतीजे आने हैं। रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति (MPC) और GST काउंसिल दोनों के ही फैसले इस दिन सामने आने हैं। जहां, बाजार MPC की तरफ से रेट हाइक तय मानकर चल रहा है। वहीं, दूसरी तरफ 57वीं GST काउंसिल मीटिंग में रजिस्ट्रेशन, रिटर्न, इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC), रिफंड और टैक्स विवाद से जुड़े कई प्रक्रियात्मक सुधार (Procedural Reforms) पर विचार होना है। यानी एक तरफ जहां रिजर्व बैंक रेट हाइक से झटका दे सकता है। वहीं, GST काउंसिल बिना किसी रेट कट के कारोबारियों को राहत दे सकती है।

GST में फंसा पैसा कैसे होगा अनलॉक?

कई कंपनियों के लिए बड़ी समस्या ITC का जमा होते रहना है। खासकर उन सेक्टर में में जहां इनपुट पर टैक्स ज्यादा और फाइनल प्रोडक्ट पर टैक्स कम है। इसे इन्वर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर कहा जाता है। इससे ITC जमा होता जाता है और कंपनी का पैसा GST सिस्टम में फंसा रहता है। मसलन, फार्मा, टेक्सटाइल, फर्टिलाइजर, रिन्युएबल एनर्जी और EV जैसे सेक्टर ने इस तरह के ITC को लेकर राहत की मांग की है।

GST काउंसिल ऐसे मामलों में रिफंड और क्रेडिट मैकेनिज्म को बेहतर करने पर विचार कर सकती है। Capital Goods और Machinery पर जमा GST को फेज्ड कैश रिफंड देने का विचार भी सरकार के स्तर पर चर्चा में है, हालांकि यह अभी प्रपोजल है और फैसला नहीं हुआ है।

वास्तविक खरीदारों का ITC भी बच सकता है

GST 2.0 में वास्तविक खरीदार (Genuine Buyers) के लिए भी बड़ा बदलाव संभव है। अगर किसी कंपनी ने सही इनवॉइस के आधार पर खरीदारी की, टैक्स पेमेंट और बाकी कंप्लायंस पूरी की, लेकिन सप्लायर ने अपना GST जमा नहीं किया, तो बायर का ITC प्रभावित न हो, इस तरह का फ्रेमवर्क भी प्रस्तावित है। इसका मकसद यह है कि सप्लायर की गलती की कीमत खरीदार को नहीं चुकानी पड़े। इससे कंपनियों के वर्किंग कैपिटल पर अचानक पड़ने वाला दबाव कम हो सकता है।

रिफंड का पैसा भी जल्दी मिल सकता है

रिफंड प्रॉसेस (Refund Process) को ज्यादा ऑटोमेटेड और रिस्क बेस्ड बनाने की तैयारी है। अभी लो रिस्क केस में में जीरो रेटेड सप्लाई पर 90% प्रोविजनल रिफंड की व्यवस्था लागू है। इन्वर्टेंड ड्यूटी स्क्ट्रक्चर से जुड़े मामलों में भी वर्किंग कैपिटल ब्लॉकेट को कम करने के लिए प्रोविजनल रिफंड की व्यवस्था शुरू की जा चुकी है। आगे रिफंड क्लेम की प्रॉसेसिंग और तेज करने, इलेक्ट्रॉनिक मैचिंग और रिस्क बेस्ड असेसमेंट को बढ़ाने पर जोर हो सकता है। इसका सीधा फायदा निर्यातकों (Exporters) और ऐसे बिजनेस को मिलेगा जिनका बड़ा हिस्सा टैक्स रिफंड में अटक जाता है।

रजिस्ट्रेशन और रिटर्न होंगे आसान

GST 2.0 में कंप्लायंस बर्डन कम करने की भी कोशिश है। लो रिस्क बिजनेस के लिए ऑटोमेटेड रजिस्ट्रेशन का आसान सिसटम पहले ही लागू हो चुका है, जिसमें पात्र आवेदक को तीन दिन में रजिस्ट्रेशन मिल सकता है। ₹5 करोड़ तक टर्नओवर वाले टैक्सपेयर के लिए तिमाही रिटर्न और मंथली पेमेंट यानी QRMP विकल्प भी उपलब्ध है। अब काउंसिल रजिस्ट्रेशन और और रिटर्न फाइलिंग को और आसान बनाने वाले रिफॉर्म पर विचार कर सकती है। E-कॉमर्स सेलर्स के लिए मल्टीपल स्टेट्स में रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया सरल करने का प्रस्ताव भी है।

बिना रेट कट कैसे मिलेगी राहत?

GST काउंसिल की तरफ से उठाए जाने वाले सुधारात्मक कदम कंपनियों को ITC और रिफंड सायकल में अटके पैसे को तेजी से वापस कंपनियों तक पहुंचा देंगे, इससे कंपनियों का वर्किंग कैपिटल सुधरेगा, जिससे कंपनियों को बिना रेटकट के बेहतर लिक्विडिटी मिल पाएगी।

Yateendra Lawaniya
यतींद्र लवानियाauthor

प्रिंट और डिजिटल मीडिया में बिजनेस एवं इकोनॉमी कैटेगरी में 10 वर्षों से अधिक का अनुभव। पिछले 7 वर्षों से शेयर बाजार, कॉरपोरेट सेक्टर और आर्थिक नीतियों से जुड़ी खबरों पर विशेष पकड़। लेखन में केवल हेडलाइन तक सीमित न रहकर आंकड़ों, नीतिगत फैसलों और कॉरपोरेट दावों के पीछे की वास्तविक तस्वीर को बैलेंस्ड और आसान शब्दों में पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास। वर्तमान में Times Now Hindi के लिए बाजार की हर हलचल और आर्थिक घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं।

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