बिजनेस

Health Insurance पॉलिसीधारकों के लिए खुशखबरी, IRDAI ने क्लेम रिजेक्शन नियम बदला, होगा ये फायदा

अगर आप हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी होल्डर है तो आपके लिए अच्छी खबर है। अब कंपनियां आपके क्लेम को बिना कारण बताए रिजेक्ट नहीं कर सकती है।

Image

हेल्थ इंश्योरेंस क्लेम रिजेक्ट

कोरोना महामारी के बाद हेल्थ इंश्योरेंस लेने वालों की संख्या तेजी से बढ़ी है। महंगे इलाज से बचने के लिए लोग महंगा प्रीमियम चुकाकर हेल्थ इंश्योरेंस ले रहे हैं। वहीं, कंपनियां साल दर साल प्रीमियम महंगा भी करती जा रही है। इसके बावजूद बहुत सारे लोगों को क्लेम नहीं मिल रहा है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, FY25 में लगभग हर 12 में से एक हेल्थ इंश्योरेंस क्लेम को खारिज कर दिया गया। अब, इंश्योरेंस रेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया (IRDAI) ने कड़ा कदम उठाया है। इरडा ने साफ कहा कि कंपनियों को क्लेम रिजेक्ट करने पर ठोस कारण बताना होगा। आइए समझते हैं कि इससे पॉलिसी होल्डर्स को क्या फायदा मिलेगा?

इरडा ने क्या कहा है?

इरडा ने रेगुलेटर के नए सुधारों के तहत कहा है कि इंश्योरेंस कंपनियों से उम्मीद की जाती है कि वे क्लेम खारिज होने की विस्तार से वजह बताएं और उन खास पॉलिसी शर्तों का जिक्र करें जिनके आधार पर क्लेम रिजेक्ट का फैसला लिया गया है। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब क्लेम प्रोसेस करने के समय में सुधार के बावजूद क्लेम से जुड़ी शिकायतें बढ़ रही हैं। IRDAI की सालाना रिपोर्ट 2024-25 के मुताबिक, इंश्योरेंस कंपनियों ने साल के दौरान 3.26 करोड़ हेल्थ इंश्योरेंस क्लेम प्रोसेस किए और ₹94,248 करोड़ का भुगतान किया। हालांकि, लगभग 8% क्लेम खारिज कर दिए गए, जिसका मतलब है कि क्लेम करने वाले लगभग हर 12 पॉलिसीहोल्डर्स में से एक को भुगतान नहीं मिला।

क्लेम प्रोसेस तेज हुआ

इंश्योरेंस कंपनियां अब तेजी से क्लेम प्रोसेस कर रही हैं, लेकिन क्लेम के नतीजों को लेकर होने वाले विवाद अभी भी एक बड़ी समस्या बने हुए हैं। क्लेम से जुड़ी एक ऐसी समस्या जिसे समय-सीमा तय करके ठीक नहीं किया जा सकता है। हेल्थ इंश्योरेंस से जुड़े विवाद अक्सर वेटिंग पीरियड, कवरेज में शामिल न होने वाली चीजों (exclusions), कमरे के किराए की सीमा, सब-लिमिट, को-पेमेंट की शर्तों और जानकारी बताने से जुड़े मुद्दों के कारण होते हैं। ग्राहकों को अक्सर इन पाबंदियों के बारे में तब पता चलता है जब वे क्लेम फाइल करते हैं। इस वजह से पॉलिसीहोल्डर्स की उम्मीदों (कि उनका इंश्योरेंस क्या कवर करेगा) और इंश्योरेंस कंपनियों द्वारा असल में किए जाने वाले भुगतान के बीच का अंतर बढ़ गया है।

क्या होगा फायदा?

इराडा के इस सख्ती के बाद पॉलिसीहोल्डर्स के लिए यह पता लगाना आसान हो जाएगा कि क्लेम रिजेक्ट होना सही है या नहीं, और जरूरत पड़ने पर वे शिकायत निवारण चैनलों या इंश्योरेंस ओम्बड्समैन के जरिए इस मामले को आगे बढ़ा सकते हैं। यह सुधार रेगुलेटर द्वारा शुरू किए गए क्लेम से जुड़े कई उपायों पर आधारित है। अब इंश्योरेंस कंपनियों के लिए जरूरी है कि वे कैशलेस प्री-ऑथराइजेशन रिक्वेस्ट को एक घंटे के भीतर प्रोसेस करें और अस्पतालों से फाइनल रिक्वेस्ट मिलने के तीन घंटे के भीतर डिस्चार्ज के फ़ैसले की जानकारी दें।

Alok Kumar
आलोक कुमार author

आलोक कुमार टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में एसोसिएट एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। इलेक्ट्रॉनिक, डिजिटल और प्रिंट मीडिया में 17 वर्षों से अधिक का व्यापक अनुभव रखने वाले आलोक ने अपने पत्रकारिता करियर में कई प्रमुख कॉर्पोरेट इवेंट्स और चर्चित स्टोरीज कवर की हैं। वह बिजनेस, बैंकिंग, शेयर मार्केट और पर्सनल फाइनेंस पर गहरी समझ रखते हैं और जटिल वित्तीय जानकारियों को सरल, स्पष्ट और पाठक-केंद्रित तरीके से प्रस्तुत करने में माहिर हैं। अब तक आलोक ने लगभग 18,000 स्टोरीज लिखी हैं। उनकी लेखन शैली भरोसेमंद, विश्लेषणात्मक और व्यावहारिक जानकारी देने वाली होती है।

और पढ़ें
End of Article