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डीजल पर 55.5 और जेट फ्यूल ATF पर 42 रुपए प्रति लीटर हुई एक्सपोर्ट ड्यूटी, कंपनियों की जेब पर पड़ेगा भारी बोझ

शुक्रवार को अंतरराष्ट्रीय एयरलाइंस के लिए एविएशन टरबाइन फ्यूल (ATF) की कीमतों में 5 प्रतिशत की बढ़ोतरी की गई है। वैश्विक स्तर पर ऊर्जा की कीमतों में आ रहे उछाल को देखते हुए तेल कंपनियों ने लगातार दूसरे महीने इन दामों में इजाफा किया है।

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केंद्र सरकार ने घरेलू बाजार में ईंधन की उपलब्धता सुनिश्चित करने और वैश्विक स्तर पर तेल की बदलती कीमतों को देखते हुए एक बड़ा कदम उठाया है। सरकार ने डीजल और विमान ईंधन (ATF) के निर्यात पर लगने वाले शुल्क (Export Duty) में भारी बढ़ोतरी कर दी है। ताजा आदेश के अनुसार, डीजल पर निर्यात शुल्क को बढ़ाकर अब ₹55.5 प्रति लीटर कर दिया गया है। इसी तरह, हवाई जहाजों में इस्तेमाल होने वाले ईंधन यानी जेट फ्यूल (ATF) पर भी लेवी को बढ़ाकर ₹42 प्रति लीटर कर दिया गया है। सरकार के इस फैसले का सीधा असर उन तेल कंपनियों पर पड़ेगा जो बड़े पैमाने पर भारतीय रिफाइनरियों से विदेशों में ईंधन का निर्यात करती हैं।

दिल्ली में, जो देश का सबसे व्यस्त हवाई अड्डा है, वहां अंतरराष्ट्रीय एयरलाइंस के लिए जेट फ्यूल के दाम 76.55 डॉलर प्रति किलोलीटर (5.33%) बढ़ाकर अब 1511.86 डॉलर प्रति किलोलीटर कर दिए गए हैं।

घरेलू एयरलाइंस को मिली राहत

जहाँ अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए ईंधन महंगा हुआ है, वहीं राहत की बात यह है कि घरेलू एयरलाइंस (Domestic Airlines) के लिए ATF की कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया गया है। इससे पहले 1 अप्रैल को घरेलू एयरलाइंस के लिए दरों में 25 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी की गई थी, जिससे कीमतें 1,04,927.18 रुपये प्रति किलोलीटर तक पहुंच गई थीं।

तेल कंपनियों की लागत पर असर

निर्यात शुल्क में की गई इस भारी वृद्धि से रिलायंस इंडस्ट्रीज (RIL) और रूस समर्थित नायरा एनर्जी जैसी निजी क्षेत्र की रिफाइनरियों के मुनाफे पर दबाव बढ़ने की संभावना है। ये कंपनियां भारी मात्रा में डीजल और एटीएफ का निर्यात यूरोपीय और अन्य विदेशी बाजारों में करती हैं। ₹55.5 प्रति लीटर की दर से एक्सपोर्ट ड्यूटी लगने का मतलब है कि अब कंपनियों को विदेशी बाजारों में ईंधन बेचने के लिए सरकार को पहले से कहीं ज्यादा टैक्स देना होगा। इससे कंपनियों के मार्जिन में कमी आ सकती है और उनके वित्तीय प्रदर्शन पर इसका सीधा असर देखने को मिल सकता है।

विंडफॉल टैक्स और घरेलू बाजार की स्थिति

सरकार द्वारा ईंधन के निर्यात पर टैक्स बढ़ाने का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि देश के भीतर पेट्रोलियम उत्पादों की कोई कमी न हो। अक्सर वैश्विक बाजार में कीमतें अधिक होने पर कंपनियां घरेलू बाजार के बजाय विदेशों में तेल बेचना अधिक फायदेमंद समझती हैं। ऐसे में एक्सपोर्ट ड्यूटी बढ़ाकर सरकार निर्यात को थोड़ा हतोत्साहित करती है ताकि घरेलू पंपों पर तेल की सप्लाई बनी रहे। हालांकि, राहत की बात यह है कि इस बढ़ोतरी का असर देश के भीतर आम जनता को मिलने वाले पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर नहीं पड़ेगा। घरेलू खुदरा कीमतें फिलहाल स्थिर बनी हुई हैं।

भारत में तेल के निर्यात और उत्पादन पर लगने वाले 'विंडफॉल टैक्स' और एक्सपोर्ट ड्यूटी की समीक्षा हर 15 दिनों में की जाती है। यह फैसला अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों और रिफाइंड उत्पादों के प्रॉफिट मार्जिन के आधार पर लिया जाता है। मौजूदा समय में वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव जारी है, जिससे तेल कंपनियों के मुनाफे की स्थिति भी बदल रही है। सरकार की यह कोशिश है कि तेल कंपनियां जो 'अतिरिक्त मुनाफा' कमा रही हैं, उसका एक हिस्सा टैक्स के रूप में सरकारी खजाने में आए।

Richa Tripathi
रिचा त्रिपाठीauthor

रिचा त्रिपाठी टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में बिजनेस डेस्क पर सीनियर कॉपी एडिटर के रूप में कार्यरत हैं। मीडिया इंडस्ट्री में 7 वर्षों के अनुभव के साथ रिचा, पर्सनल फाइनेंस, स्टॉक मार्केट, टैक्स प्लानिंग और अर्थव्यवस्था से जुड़े विषयों पर मजबूत पकड़ रखती हैं। अब तक 8,000 से अधिक कंटेंट लिख चुकी रिचा की विशेषता है—जटिल वित्तीय जानकारियों को सरल, स्पष्ट और भरोसेमंद तरीके से पाठकों तक पहुंचाना। वह ऐसी स्टोरीज तैयार करती हैं जो न केवल जानकारीपूर्ण होती हैं, बल्कि आम पाठक की वित्तीय समझ को बेहतर बनाने में भी मदद करती हैं।

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