भारत के मुख्य आर्थिक सलाहकार (CEA) वी अनंत नागेश्वरन का कहना है कि 2026 में 2008 जैसे वैश्विक वित्तीय संकट की 10–20% संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। संसद में इकोनॉमिक सर्वे पेश किए जाने के बाद सर्वे रिपोर्ट पर प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान उन्होंने कहा कि मौजूदा वैश्विक माहौल अस्थिर है, जहां भू-राजनीतिक तनाव, ट्रेड फ्रैगमेंटेशन और वैश्विक वित्तीय बाजारों की नाजुकता किसी बड़े आर्थिक झटके का कारण बन सकती है। CEA का कहना है कि आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था पहले की तुलना में कहीं ज्यादा इंटरकनेक्टेड और संवेदनशील हो चुकी है, ऐसे में अगर कोई सिस्टमिक शॉक आता है तो उसका असर 2008 से भी ज्यादा गहरा हो सकता है।
विदेशी पूंजी सूखने से रुपया दबाव में
Economic Survey 2026 के मुताबिक 2025 के दौरान विदेशी पूंजी प्रवाह में कमी भारतीय रुपये के कमजोर प्रदर्शन की बड़ी वजह रही। वैश्विक निवेशकों के जोखिम से बचाव के रुख के चलते उभरते बाजारों से पूंजी निकली, जिसका सीधा असर रुपये पर पड़ा। सर्वे में कहा गया है कि भारतीय मुद्रा ने 2025 में कई एशियाई मुद्राओं की तुलना में कमजोर प्रदर्शन किया। रिपोर्ट यह भी बताती है कि मजबूत घरेलू फंडामेंटल्स, नियंत्रित महंगाई और स्थिर बैंकिंग सिस्टम के बावजूद करेंसी मूवमेंट अब बड़े पैमाने पर वैश्विक कैपिटल फ्लो से तय हो रहा है, न कि केवल घरेलू आर्थिक संकेतकों से।
रुपये की गिरावट बुरी नहीं
Economic Survey में रुपये को “punching below its weight” बताया गया है, यानी अर्थव्यवस्था की वास्तविक ताकत के अनुरूप रुपये का प्रदर्शन नहीं दिखा। हालांकि CEA ने यह भी स्पष्ट किया कि रुपये की कमजोरी पूरी तरह नकारात्मक नहीं रही है। कमजोर मुद्रा ने कुछ हद तक निर्यात को सपोर्ट दिया और वैश्विक टैरिफ दबाव के असर को सीमित किया, जबकि महंगाई पर इसका बड़ा नकारात्मक प्रभाव देखने को नहीं मिला।
क्यों हो रह रुपये की पिटाई?
सर्वे के मुताबिक रुपये की कमजोरी के पीछे भू-राजनीतिक तनाव और ‘Strategic Power Gap’ भी अहम कारण हैं। वैश्विक शक्ति संतुलन में सीमित प्रभाव के चलते उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राएं अंतरराष्ट्रीय अनिश्चितता के दौर में ज्यादा दबाव में आ जाती हैं, और भारत भी इससे अछूता नहीं रहा।
घरेलू ग्रोथ और बफर जरूरी
CEA नागेश्वरन ने साफ कहा है कि अनिश्चित वैश्विक माहौल को देखते हुए भारत को घरेलू ग्रोथ पर प्राथमिकता देनी होगी। Economic Survey के मुताबिक आगे की रणनीति में बफर और लिक्विडिटी को मजबूत करना जरूरी है, ताकि किसी वैश्विक संकट की स्थिति में अर्थव्यवस्था को झटकों से बचाया जा सके।
यूरोप के साथ FTA से उम्मीद
सर्वे में यह भी कहा गया है कि यूरोप के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) भारत की मैन्युफैक्चरिंग प्रतिस्पर्धात्मकता, निर्यात मजबूती और रणनीतिक क्षमता को बढ़ा सकता है। हालांकि, Economic Survey यह भी स्पष्ट करता है कि FTA का वास्तविक फायदा तभी मिलेगा, जब भारत लागत, गुणवत्ता और पैमाने के स्तर पर वैश्विक प्रतिस्पर्धी उत्पादन कर पाएगा।
