Health Insurance : स्वास्थ्य बीमा या हेल्थ इंश्योरेंस लेने का मुख्य मकसद यही होता है कि किसी मेडिकल इमरजेंसी के दौरान आर्थिक तंगी का सामना न करना पड़े। लेकिन जब किसी को अचानक अस्पताल में भर्ती कराना पड़ता है, तो सबसे पहला सवाल यही उठता है कि पेमेंट कैसे करें? अस्पताल में कैशलेस (Cashless claims) इलाज करवाएं या खुद पैसे देकर बाद में इंश्योरेंस कंपनी से रीइम्बर्समेंट का दावा (Reimbursement claims) करें? अक्सर लोग इन्हें दो अलग-अलग तरह के हेल्थ इंश्योरेंस समझ लेते हैं, जबकि ऐसा नहीं है। कैशलेस और रीइम्बर्समेंट क्लेम सेटल करने यानी बिल चुकाने के दो तरीके हैं। आपकी पॉलिसी कितनी रकम कवर करेगी, यह इस बात पर निर्भर करता है कि आपने कौन-सी पॉलिसी चुनी है और उसकी नियम व शर्तें क्या हैं। आइए समझते हैं वे 5 जरूरी बातें, जो हर पॉलिसीधारक को पता होनी चाहिए।
सिर्फ तरीका बदलता है, पॉलिसी का कवर नहीं
कैशलेस और रीइम्बर्समेंट, दोनों ही एक ही पॉलिसी को प्रोसेस करने के दो अलग रास्ते हैं। कैशलेस सुविधा चुनने पर इंश्योरेंस कंपनी अस्पताल के साथ मिलकर सीधे क्लेम की स्वीकृत राशि का भुगतान कर देती है, और आपको सिर्फ वही पैसे देने होते हैं जो पॉलिसी में कवर नहीं हैं। वहीं रीइम्बर्समेंट में आपको पहले अपनी जेब से पूरा बिल चुकाना पड़ता है, फिर कागजात जमा करने के बाद कंपनी पैसे वापस करती है। दोनों ही मामलों में पॉलिसी के नियम, जैसे वेटिंग पीरियड, डिडक्टिबल, को-पेमेंट और कटौती समान रूप से लागू होती हैं। कैशलेस का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि पूरा बिल कंपनी ही भरेगी।
कैशलेस का सबसे बड़ा फायदा
किसी भी गंभीर बीमारी या दुर्घटना के दौरान अस्पताल का बिल लाखों रुपये तक पहुंच सकता है। ऐसी स्थिति में अचानक भारी रकम जुटाना किसी भी परिवार के लिए बेहद तनावपूर्ण हो सकता है। कैशलेस सुविधा इसी आर्थिक दबाव को खत्म करती है। प्री-ऑथराइजेशन मिलते ही बीमा कंपनी सीधे अस्पताल को पैसे ट्रांसफर कर देती है। इरडा (IRDAI) की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में कुल क्लेम में से 58% कैशलेस के जरिए सेटल होते हैं, जो कुल भुगतान की गई राशि का करीब 66% हिस्सा हैं। इसके अलावा, अस्पताल और बीमा कंपनी के बीच सीधे तालमेल होने से मरीज के परिजनों को कागजी कार्रवाई की कम परेशानी झेलनी पड़ती है।
रीइम्बर्समेंट: जब कैशलेस की सुविधा न मिले
भले ही कैशलेस तरीका सबसे सुविधाजनक माना जाता है, लेकिन हर परिस्थिति में यह उपलब्ध हो, यह जरूरी नहीं है। अगर मरीज को किसी ऐसे अस्पताल में भर्ती कराया गया है जो बीमा कंपनी के नेटवर्क में नहीं है, या फिर किसी वजह से वक्त पर प्री-ऑथराइजेशन अप्रूवल नहीं मिल पाता है, तो रीइम्बर्समेंट ही एकमात्र विकल्प बचता है। इस स्थिति में मरीज के पास तुरंत इलाज के लिए खुद फंड की व्यवस्था होना बहुत जरूरी होता है।
'कैशलेस' का मतलब 'जीरो खर्च' नहीं होता
कैशलेस इलाज के नाम पर कई लोग यह मान लेते हैं कि उन्हें अस्पताल में एक भी रुपया नहीं देना पड़ेगा। यह एक बहुत बड़ी गलतफहमी है। हर पॉलिसी में कुछ ऐसे खर्च होते हैं जिन्हें इंश्योरेंस कंपनियां कवर नहीं करतीं, जैसे दस्ताने, सिरिंज, फाइल चार्ज, या फिर तय लिमिट से ज्यादा का कमरा (रूम रेंट) लेना। अगर 5 लाख रुपये के कुल बिल में 50,000 रुपये ऐसे खर्चों के हैं जो पॉलिसी के दायरे में नहीं आते, तो कैशलेस इलाज के बाद भी वह 50,000 रुपये मरीज को खुद अपनी जेब से ही देने होंगे।
पहला विकल्प कैशलेस, लेकिन बैकअप प्लान भी रखें
किसी भी प्लांटेड ट्रीटमेंट या सर्जरी से पहले यह सलाह दी जाती है कि मरीज अपनी पॉलिसी के नेटवर्क अस्पतालों की सूची चेक करे और कैशलेस प्रक्रिया ही अपनाए। लेकिन इसके साथ ही रीइम्बर्समेंट के नियमों और जरूरी दस्तावेजों (जैसे ओरिजिनल बिल, डिस्चार्ज समरी और टेस्ट रिपोर्ट) की जानकारी रखना भी उतना ही जरूरी है। जनरल इंश्योरेंस काउंसिल की 'कैशलेस एवरीवेयर' पहल के बाद अब गैर-नेटवर्क अस्पतालों में भी कुछ शर्तों के साथ कैशलेस इलाज संभव हो पा रहा है।
आसान शब्दों में कहें तो, कैशलेस और रीइम्बर्समेंट केवल यह तय करते हैं कि शुरुआत में अस्पताल का बिल कौन चुकाएगा। जबकि इंश्योरेंस कंपनी कुल कितना पैसा देगी, यह पूरी तरह से आपकी पॉलिसी के नियमों, कवरेज और शर्तों पर निर्भर करता है। इसलिए जब भी संभव हो कैशलेस को पहली प्राथमिकता दें, लेकिन अपनी पॉलिसी के सभी पेचीदा नियमों की जानकारी हमेशा पास रखें।
