बिजनेस

हॉर्मुज से गुजरता है 20% पेट्रोलियम, तो बाकी 80% कहां से आता है तेल?

दुनिया की जरुरत का 20 फीसदी कच्चा तेल होर्मुज से होकर गुजरता है लेकिन अगर 20 फीसदी होर्मुज से आता है तो बाकि का 80 फीसदी कहां से आता है तेल? आइए बताते हैं वो रास्ते जहां से आपके घर तक आता है तेल.

Image

Strait Of Hormuz

हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को लेकर वैश्विक तनाव चरम पर है। ईरान और अमेरिका के बीच जारी रस्साकशी ने दुनिया की चिंता बढ़ा दी है, क्योंकि वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग 20% से 25% हिस्सा इसी संकरे समुद्री रास्ते से होकर गुजरता है। ईरान द्वारा जहाजों पर टैक्स लगाने और अमेरिका द्वारा नाकाबंदी की धमकियों ने बाजार में अस्थिरता पैदा कर दी है। लेकिन एक बड़ा सवाल यह भी है कि अगर 20% तेल यहां से आता है, तो बाकी 80% तेल का रास्ता क्या है और क्या वह सुरक्षित है?

कहां से आता है बाकी 80% तेल?

दुनिया के तेल की अधिकांश सप्लाई उन रास्तों और क्षेत्रों से आती है जो हॉर्मुज पर निर्भर नहीं हैं। इसमें मलक्का जलडमरूमध्य (Strait of Malacca), स्वेज नहर (Suez Canal) और पनामा नहर जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग शामिल हैं। इसके अलावा, अमेरिका, रूस, वेनेजुएला और कई अफ्रीकी देश अपने तेल का निर्यात सीधे अपने तटों से करते हैं, जिसके लिए उन्हें फारस की खाड़ी में प्रवेश करने की आवश्यकता नहीं होती। यह विविधता ही वैश्विक अर्थव्यवस्था को किसी एक रास्ते के बंद होने पर पूरी तरह ठप होने से बचाती है।

विकल्प के तौर पर पाइपलाइन नेटवर्क

हॉर्मुज पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए खाड़ी देशों ने पिछले कुछ वर्षों में बड़े पैमाने पर पाइपलाइन इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित किया है। उदाहरण के लिए, सऊदी अरब की 'ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन' कच्चे तेल को सीधे लाल सागर तक ले जाती है। इसी तरह, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) की पाइपलाइन अबू धाबी को ओमान की खाड़ी पर स्थित फुजैरा बंदरगाह से जोड़ती है। ये पाइपलाइनें संकट के समय हर दिन लाखों बैरल तेल को हॉर्मुज के रास्ते के बजाय सीधे समुद्र तक पहुँचाने में मदद करती हैं। हालांकि, इन पाइपलाइनों की अपनी एक क्षमता है और ये हॉर्मुज से होने वाले पूरे व्यापार की भरपाई नहीं कर सकतीं।

क्या बाकी सप्लाई सुरक्षित है?

भले ही 80% तेल हॉर्मुज से नहीं गुजरता, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वह पूरी तरह सुरक्षित है। दुनिया का तेल बाजार एक मकड़जाल की तरह आपस में जुड़ा हुआ है। लाल सागर में बढ़ते हमलों और अस्थिरता के कारण स्वेज नहर से होने वाला यातायात पहले ही प्रभावित हो चुका है। जब एक रास्ता असुरक्षित होता है, तो जहाजों का दबाव मलक्का जैसे अन्य रास्तों पर बढ़ जाता है, जिससे वहां जाम जैसी स्थिति पैदा हो जाती है। अंततः, एक जगह की अशांति पूरी दुनिया की सप्लाई चेन में हलचल पैदा कर देती है।

युद्ध और बढ़ती लागत का आम आदमी पर असर

इस तनाव का सबसे बड़ा और सीधा असर शिपिंग की लागत (Freight Cost) पर पड़ा है। सुरक्षित रास्तों की तलाश में तेल के टैंकरों को अब अफ्रीका के 'केप ऑफ गुड होप' का चक्कर लगाकर लंबा रास्ता तय करना पड़ रहा है। इससे माल पहुंचने में हफ्तों की देरी हो रही है और परिवहन का खर्च 45% तक बढ़ गया है। जहाजों की मांग बढ़ने से उनकी उपलब्धता कम हो गई है, जिससे माल ढुलाई दरें आसमान छू रही हैं। इसका अंतिम बोझ आम उपभोक्ता पर पड़ता है, क्योंकि तेल महंगा होने से न केवल पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ती हैं, बल्कि माल ढुलाई महंगी होने से रोजमर्रा की हर चीज फल, सब्जी से लेकर अनाज तक महंगी हो जाती है।

Richa Tripathi
रिचा त्रिपाठीauthor

रिचा त्रिपाठी टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में बिजनेस डेस्क पर सीनियर कॉपी एडिटर के रूप में कार्यरत हैं। मीडिया इंडस्ट्री में 7 वर्षों के अनुभव के साथ रिचा, पर्सनल फाइनेंस, स्टॉक मार्केट, टैक्स प्लानिंग और अर्थव्यवस्था से जुड़े विषयों पर मजबूत पकड़ रखती हैं। अब तक 8,000 से अधिक कंटेंट लिख चुकी रिचा की विशेषता है—जटिल वित्तीय जानकारियों को सरल, स्पष्ट और भरोसेमंद तरीके से पाठकों तक पहुंचाना। वह ऐसी स्टोरीज तैयार करती हैं जो न केवल जानकारीपूर्ण होती हैं, बल्कि आम पाठक की वित्तीय समझ को बेहतर बनाने में भी मदद करती हैं।

और पढ़ें
End of Article