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गाड़ी का इंडिकेटर पीले कलर में ही क्यों आता है? क्या आप जानते हैं इसके पीछे की वजह

गाड़ी में अलग-अलग कर की लाइट होने का अपना ही अलग मतलब होता है, इंडिकेटर लाइट के येलो होने का कोई इत्तेफाक नहीं है, बल्कि इसके पीछे साइंस, सुरक्षा के नियम और अंतरराष्ट्रीय मानक छिपे हैं। आइए आपको बताते हैं कि सड़क सुरक्षा में यह छोटा सा दिखने वाला पीला रंग कितनी बड़ी भूमिका निभाता है।

Car Indicator Light

Car Indicator Light

सड़कों पर गाड़ियां चलती तो सबने देखी हैं लेकिन क्या आपने कभी सोचा है एक ही गाड़ी में अलग -अलग कलर की लाइट्स क्यों लगी होती हैं? हेडलाइट सफेद होती है और ब्रेक लाइट लाल, लेकिन इंडिकेटर के लिए हमेशा इसी एक रंग को क्यों चुना गया? अगर नहीं तो आज हम आपको बताएंगे कि आखिर गाड़ियों की इंडिकेटर लाइट हमेशा येलो ही क्यों होती है?

इंडिकेटर लाइट के येलो होने का कोई इत्तेफाक नहीं है, बल्कि इसके पीछे साइंस, सुरक्षा के नियम और अंतरराष्ट्रीय मानक छिपे हैं। आइए आपको बताते हैं कि सड़क सुरक्षा में यह छोटा सा दिखने वाला पीला रंग कितनी बड़ी भूमिका निभाता है।

पीले रंग की क्यों होती है इंडिकेटर लाइट?

पीले रंग के इंडिकेटर के पीछे सबसे बड़ा वैज्ञानिक कारण है इसकी 'विजिबिलिटी' (दृश्यता) और 'वेवलेंथ' (तरंग दैर्ध्य)। फिजिकल साइंस के अनुसार, लाल रंग के बाद पीला या नारंगी रंग ही ऐसा होता है जो हवा में मौजूद धूल, धुंध या कोहरे के कणों से टकराकर सबसे कम बिखरता है। इसका मतलब यह है कि खराब मौसम या घने कोहरे में भी दूर से आने वाले ड्राइवर को पीला इंडिकेटर साफ नजर आ जाता है। लाल रंग को रुकने के लिए रिजर्व रखा गया है, इसलिए मुड़ने का संकेत देने के लिए पीले रंग को सबसे सही पाया गया क्योंकि यह आंखों को तुरंत अपनी ओर खींचता है।

दूसरा कारण है 'कलर कंट्रास्ट'। सड़क पर चलते समय सुरक्षा इस बात पर निर्भर करती है कि पीछे वाला ड्राइवर आपके अगले कदम को कितनी जल्दी समझता है। अगर इंडिकेटर भी लाल रंग के होते, तो पीछे वाले ड्राइवर को यह समझने में भ्रम हो सकता था कि आप ब्रेक लगा रहे हैं या मुड़ना चाह रहे हैं। पीला रंग लाल और सफेद रोशनी के बीच एक स्पष्ट अंतर पैदा करता है। इस अंतर की वजह से ही हमारा दिमाग पलक झपकते ही समझ जाता है कि वाहन मुड़ने वाला है, जिससे दुर्घटना की संभावना काफी कम हो जाती है।

इंटरनेशनल स्टैंडर भी हैं वजह

इसके अलावा, इसके पीछे अंतरराष्ट्रीय मानक (International Standards) भी काम करते हैं। 1960 के दशक से ही दुनिया भर के अधिकांश देशों में 'वियना कन्वेंशन ऑन रोड ट्रैफिक' के तहत यह सहमति बनी थी कि वाहनों के मुड़ने के संकेत के लिए एम्बर (पीला-नारंगी) रंग का ही उपयोग किया जाएगा। यही कारण है कि आज वैश्विक स्तर पर ऑटोमोबाइल कंपनियां इसी स्टैंडर्ड को फॉलो करती हैं ताकि दुनिया के किसी भी कोने में ड्राइवर को संकेतों को समझने में कोई परेशानी न हो। अमेरिका जैसे कुछ देशों में पहले पीछे के इंडिकेटर लाल होते थे, लेकिन रिसर्च में पाया गया कि पीले इंडिकेटर वाली गाड़ियों में पीछे से टक्कर होने की संभावना लगभग 28% कम हो जाती है।

भारत जैसे देश में, जहां धूल और मानसून के दौरान भारी बारिश एक सामान्य बात है, पीला रंग जीवन रक्षक साबित होता है। यह रंग न केवल दिन की तेज रोशनी में साफ दिखता है, बल्कि रात के समय आंखों में चुभता भी नहीं है। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इंडिकेटर का मुख्य काम 'सावधान' करना होता है, और पीला रंग मनोवैज्ञानिक रूप से सावधानी का प्रतीक माना जाता है।

रिचा त्रिपाठी
रिचा त्रिपाठी author

रिचा त्रिपाठी टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में बिजनेस डेस्क पर सीनियर कॉपी एडिटर के रूप में कार्यरत हैं। मीडिया इंडस्ट्री में 7 वर्षों के अनुभव के साथ रिच... और देखें

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