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कोरोना से जान गंवाने वाले मुस्लिमों का जबरन किया था दाह संस्कार, अब माफी मांगेगी श्रीलंकाई सरकार

Sri Lanka: श्रीलंका की सरकार ने 2020 में कोविड-19 पीड़ितों के दाह संस्कार का अनिवार्य आदेश जारी किया गया था जिससे मुसलमानों सहित कई अन्य अल्पसंख्यक समुदायों को उनके धार्मिक अधिकारों से वंचित होना पड़ा था। इस दौरान श्रीलंका में 276 मुस्लिमों का दाह संस्कार किया गया था।

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Covid-19 Death

Photo : BCCL

Sri Lanka: श्रीलंका की सरकार ने मंगलवार को कहा कि वह कोविड-19 से जान गंवाने वाले मुस्लिम व्यक्तियों के जबरन दाह संस्कार के लिए देश के मुस्लिम समुदाय से औपचारिक रूप से माफी मांगेगी। श्रीलंकाई सरकार ने स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं के कारण कोरोना महामारी के दौरान विवादित शवदाह नीति लागू की थी। वर्ष 2020 में कोविड-19 पीड़ितों के दाह संस्कार का अनिवार्य आदेश जारी किया गया था जिससे मुसलमानों सहित कई अन्य अल्पसंख्यक समुदायों को उनके धार्मिक अधिकारों से वंचित होना पड़ा था। हालांकि, बढ़ती अंतरराष्ट्रीय आलोचना के बीच फरवरी 2021 में इस आदेश को रद्द कर दिया गया था।

एक कैबिनेट नोट के अनुसार, श्रीलंकाई मंत्रिमंडल ने सोमवार को एक बैठक में मार्च 2020 में थोपे गए आदेश के लिए मुस्लिम समुदाय से माफी मांगने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। इसमें कहा गया है कि मंत्रिमंडल ने सरकार की ओर से सभी समुदायों से माफी मांगने का फैसला किया है। बता दें, फरवरी 2021 में आदेश के रद्द किये जाने से पहले श्रीलंका में 276 मुस्लिमों का दाह संस्कार किया गया। श्रीलंका की सरकार ने स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं का हवाला देकर दफनाने की अनुमति देने की मांग का विरोध किया था। तब सरकार ने कुछ विशेषज्ञों की राय का हवाला दिया था जिसमें उन्होंने दावा किया था कि कोविड-19 पीड़ितों को दफनाने से जल स्तर प्रदूषित हो जाएगा जिससे महामारी और फैलेगी।

धर्म के आधार पर दाह संस्कार पर आएगा कानून

मंत्रिमंडल ने ऐसे विवादास्पद कदमों की पुनरावृत्ति को रोकने के लिए कानून लाने का भी निर्णय लिया। सरकार की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि मंत्रिमंडल ने धर्म के आधार पर शवों को दफनाने या दाह संस्कार पर एक प्रस्तावित कानून को भी मंजूरी दे दी है। इसमें एक कानून लाने की ओर ध्यान आकर्षित किया गया है जो किसी खास व्यक्ति या रिश्तेदारों को मृत व्यक्ति को दफनाने या उसका दाह संस्कार के चयन की अनुमति देगा।

मुस्लिम समुदाय ने किया था नीति का विरोध

मुस्लिम समुदाय ने जबरन दाह संस्कार नीति का विरोध किया था और कुछ ने तो अपने प्रियजनों के शवों को अस्पताल के मुर्दाघरों में छोड़ दिया था। समुदाय के सदस्यों ने कहा था कि या तो उन्हें शव जलाने की अनुमति देने के लिए मजबूर किया गया था या उनकी जानकारी के बिना ऐसा किया गया था। इस्लाम में शव दाह वर्जित है।

Pranjul Srivastava
प्रांजुल श्रीवास्तवauthor

<p>मैं इस वक्त टाइम्स नाउ नवभारत से जुड़ा हुआ हूं। पत्रकारिता के 8 वर्षों के तजुर्बे में मुझे और मेरी भाषाई समझ को गढ़ने और तराशने में कई वरिष्ठ पत्रकारों और संपादकों का योगदान रहा। 2016 में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से शुरू हुआ यह सफर देश की राजधानी दिल्ली में 'टाइम्स नाउ नवभारत' तक आ पहुंचा है। अखबारों में रिपोर्टिंग करते हुए शहरों की धूल फांकना और डिजिटल पत्रकारिता की बारीकियों को समझते हुए देश-विदेश की खबरों को आप तक पहुंचाने का मेरा ये सफर काफी किस्से-कहानियों से भरा हुआ है। लखनऊ की बाबा भीम राव अंबेडकर सेंट्रल यूनिवर्सिटी के क्लासरूम में प्रोफेसरों से मिले किताबी ज्ञान और पत्रकारीय सिद्धांतों को जमीन पर उतारने का मौका मुझे 2016 में ही मिल गया। पहला ब्रेक टाइम्स ग्रुप के प्रतिष्ठित अखबार 'नवभारत टाइम्स' ने दिया। यहां बतौर इंटर्न मुझे कई सामाजिक संगठनों की रिपोर्टिंग करने का मौका मिला। दिनभर शहर में घूम-घूम कर खबरों को बटोरना और शाम होते ही उन्हें लिखकर डेस्क के हवाले करना मेरी दिनचर्या का हिस्सा हो गया। इस अनुभव ने मुझे समाज के तौर तरीकों से परिचित कराया तो न्यूजरूम में सीनियर्स से मिली डांट ने पत्रकारिता की बारीकियों और भाषाई मर्यादा को समझने में मदद की। करीब 3 से 4 महीनों की इंटर्नशिप के बाद मुझे 2017 आते-आते गांधी परिवार के गढ़ रायबरेली भेजा गया। यह समय उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव और सत्ता के बदलाव का था। यहां बतौर रिपोर्टर मैं पहली बार राजनीतिक खबरों से रूबरू हुआ। रायबरेली के मिजाज को करीब 8 महीनों तक समझने के बाद नवभारत टाइम्स ने मुझे वापस लखनऊ बुलाया और शहर की रिपोर्टिंग करने का मौका दिया। यहां विज्ञान, पर्यावरण, बाजार, लखनऊ विकास प्राधिकरण, आवास विकास और मेट्रो जैसी बीट पर जमकर काम किया। यह सफर अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिले मुरादाबाद तक पहुंच गया था, जहां मुझे दैनिक जागरण जैसे प्रतिष्ठित अखबार के लिए दो वर्षों तक रिपोर्टिंग करने का अवसर मिला। करीब दो वर्षों की पत्रकारिता के बाद अब मुझे देश की राजधानी की ओर रुख करना था और यह मौका अमर उजाला (डिजिटल) ने दिया। अखबारों की रिपोर्टिंग से निकलकर डिजिटल पत्रकारिता के अनुभव से मैं पहली बार रूबरू हो रहा था। यहां पर मुझे मेन डेस्क पर जिम्मेदारी मिली। जहां सबसे आगे रहते हुए सबसे सटीक खबरें आप तक पहुंचाना चुनौती भरा काम था, लेकिन पत्रकारिता की शुरुआत में मिले अनुभवों ने मेरा काम आसान बना दिया। यहां भी करीब दो वर्षों के बाद 2023 में मुझे टाइम्स ग्रुप से दोबारा जुड़ने का मौका मिला और टाइम्स नाउ नवभारत की मेन डेस्क पर मेरा सफर अब तक जारी है।</p>

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