Piyush Goyal News: केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने जलवायु परिवर्तन और इससे निपटने के लिए विकसित देशों की वित्तीय प्रतिबद्धताओं को लेकर यूरोप पर सवाल उठाए हैं। जर्मनी की राजधानी बर्लिन में बोलते हुए गोयल ने कहा कि विकसित देशों ने दशकों तक औद्योगिक विकास का लाभ उठाया और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाया, लेकिन विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन से निपटने में मदद देने के वादे अब तक पूरे नहीं किए गए हैं।
गोयल ने COP21 का जिक्र किया
गोयल ने 2015 में पेरिस जलवायु सम्मेलन यानी COP21 का जिक्र करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ग्लोबल साउथ के देशों को एक साथ लाने और जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए साझा प्रतिबद्धता बनाने में अहम भूमिका निभाई थी। उन्होंने कहा कि उस समय विकसित देशों ने विकासशील और कम विकसित देशों के साथ-साथ प्रशांत और कैरेबियाई द्वीपीय देशों को जलवायु परिवर्तन से निपटने में सहायता देने का वादा किया था।
100 अरब डॉलर की मदद देने की थी प्रतिबद्धता
केंद्रीय मंत्री के मुताबिक, इसके तहत हर साल 100 अरब डॉलर की मदद देने की प्रतिबद्धता जताई गई थी। उन्होंने आरोप लगाया कि करीब 11 साल बीतने के बाद भी इस वादे के अनुरूप वास्तविक मदद नहीं मिली है। गोयल ने कहा कि अब तक की स्थिति वादों तक ही सीमित रही है। यूरोपीय संघ की कार्बन सीमा समायोजन व्यवस्था यानी CBAM पर सवाल उठाते हुए गोयल ने कहा कि यूरोप विकासशील और कम विकसित देशों की जरूरतों तथा उनके कार्बन उत्सर्जन घटाने के प्रयासों को पर्याप्त समर्थन देने में नाकाम रहा है।
कार्बन उत्सर्जन में यूरोपी हिस्सेदारी ज्यादा
गोयल ने कार्बन उत्सर्जन के लिए ऐतिहासिक रूप से जिम्मेदार देशों के मुद्दे को भी उठाया। उन्होंने कहा कि भारत दुनिया की करीब 17 फीसदी आबादी का प्रतिनिधित्व करता है, लेकिन वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में उसका योगदान 3 फीसदी से भी कम है। इसके विपरीत, उनके मुताबिक यूरोप की आबादी दुनिया की कुल आबादी का लगभग 3 से 4 फीसदी है, जबकि ऐतिहासिक कार्बन उत्सर्जन में उसकी हिस्सेदारी काफी अधिक रही है।
स्वच्छ ऊर्जा को तेजी से अपना रहा भारत-गोयल
उन्होंने प्रति व्यक्ति उत्सर्जन की तुलना करते हुए दावा किया कि यूरोप का प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन और पर्यावरण पर प्रभाव भारत के मुकाबले लगभग सात से आठ गुना है। गोयल ने कहा कि भारत को 1.4 अरब लोगों की ऊर्जा और खाद्य जरूरतों को पूरा करने के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा भी सुनिश्चित करनी है, इसके बावजूद देश दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते स्वच्छ ऊर्जा कार्यक्रमों में शामिल है।
