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डोनाल्ड ट्रंप या कमला हैरिस, कौन ज्यादा लोकप्रिय? सर्वे में हुआ इसका खुलासा

US Presidential Elections: क्या आप जानते हैं कि अमेरिका में इस वक्त लोग डोनाल्ड ट्रंप को ज्यादा पसंद कर रहे हैं या फिर कमला हैरिस के तरफ लोगों का ज्यादा झुकाव है? एक सर्वे में ये दावा किया गया है कि ट्रंप की तुलना में हैरिस कहीं अधिक लोकप्रिय हैं। आपको बताते हैं कि सर्वेक्षण में और क्या कुछ कहा गया।

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कमला हैरिस बनाम डोनाल्ड ट्रंप

Kamala Harris vs Donald Trump: अमेरिका में किये गए एक नये सर्वेक्षण के अनुसार, राष्ट्रपति चुनाव में एशियाई अमेरिकी, हवाई के मूल निवासी और प्रशांत द्वीप के मतदाता उपराष्ट्रपति कमला हैरिस को पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की तुलना में अधिक उपयुक्त उम्मीदवार मान रहे हैं। एएपीआई (एशियाई अमेरिकी एवं प्रशांत द्वीप वासी) मतदाताओं का यह भी मानना है कि हैरिस ऐसी उम्मीदवार हैं जो उनकी पृष्ठभूमि और नीतिगत विचारों का बेहतर प्रतिनिधित्व करती हैं।

ट्रंप या हैरिस, किसके बारे में ज्यादा नकारात्मक राय

एएपीआई डेटा और एपीआईएवोट के नये सर्वेक्षण में पाया गया है कि 10 एएपीआई मतदाताओं में से लगभग 6 हैरिस के बारे में बहुत या कुछ हद तक अनुकूल राय रखते हैं, जबकि लगभग एक तिहाई की राय कुछ हद तक या बहुत प्रतिकूल है। प्रत्येक 10 एएपीआई मतदाताओं में तीन की ट्रंप के बारे में सकारात्मक राय है और करीब दो-तिहाई की नकारात्मक राय है।

यह अक्टूबर 2023 से हैरिस के पक्ष में माहौल बेहतर होते जाने को दर्शाता है, जब एपी-एनओआरसी/एएपीआई डेटा सर्वेक्षण में पाया गया कि एएपीआई के लगभग आधे वयस्क उनके बारे में कुछ हद तक या बहुत अनुकूल राय रखते थे। हालांकि, इस समूह में ट्रंप के बारे में राय स्थिर बनी हुई है।

रिस की एशियाई भारतीय पहचान बहुत महत्वपूर्ण

हैरिस अश्वेत (ब्लैक) और दक्षिण एशियाई अमेरिकी दोनों हैं, और उन्होंने जॉर्जिया जैसे महत्वपूर्ण राज्यों में एएपीआई मतदाताओं को एकजुट किया है, जहां उनकी संख्या बढ़ रही है। लेकिन सर्वेक्षण से पता चलता है कि एएपीआई मतदाताओं को ट्रंप की तुलना में हैरिस में अपनी सांस्कृतिक पहचान के प्रतिबिंबित होते देखने की अधिक संभावना नजर आ रही है।

लगभग आधे एएपीआई मतदाताओं का कहना है कि हैरिस उनकी पृष्ठभूमि और संस्कृति का बेहतर प्रतिनिधित्व करती हैं, जबकि 10 में से केवल एक मतदाता ने ट्रंप के बारे में ऐसा कहा। हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि उम्मीदवारों के बारे में उनकी राय को यह कितना प्रभावित कर रहा है। दस में से केवल 3 एएपीआई मतदाताओं का कहना है कि हैरिस की एशियाई भारतीय पहचान उनके लिए अत्यंत या बहुत महत्वपूर्ण है।

महिला के रूप में कमला हैरिस की पहचान काफी अहम

सर्वेक्षण से संकेत मिलता है कि हैरिस का महिला होना एएपीआई मतदाताओं के लिए उनकी नस्लीय पृष्ठभूमि से अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है। हालांकि हैरिस के चुनाव प्रचार अभियान ने इस बात पर जोर देने से परहेज किया है कि वह पहली महिला राष्ट्रपति हो सकती हैं। एएपीआई महिला मतदाताओं में से लगभग आधी का कहना है कि एक महिला के रूप में हैरिस की पहचान उनके लिए अत्यंत या बहुत महत्वपूर्ण है।

सर्वेक्षण में, एएपीआई महिलाओं ने एएपीआई पुरुषों की तुलना में कहीं अधिक मुखर होकर कहा कि एशियाई या एशियाई अमेरिकी के रूप में उनकी अपनी पृष्ठभूमि उनके खुद के बारे में सोचने के तरीके के लिए 'बहुत' महत्वपूर्ण है। एपीआईएवोट की कार्यकारी निदेशक क्रिस्टीन चेन ने कहा, 'हमने युवाओं के साथ-साथ एएपीआई महिलाओं द्वारा भी कई कार्यक्रमों का आयोजन करते देखा है, जो असल में विभिन्न जातीय समूहों का नेतृत्व कर रही हैं, जैसे कि महिलाओं के लिए दक्षिण एशियाई, हैरिस के लिए दक्षिण एशियाई, हैरिस के लिए कोरियाई अमेरिकी, हैरिस के लिए चीनी अमेरिकी।'

AAPI मतदाताओं से डेमोक्रेटिक नेता कर रहे अधिक संपर्क

सर्वेक्षण से पता चलता है कि एएपीआई मतदाताओं से डेमोक्रेटिक पार्टी के नेता अधिक संपर्क कर रहे हैं। दस में से लगभग 4 एएपीआई मतदाताओं ने कहा कि पिछले साल डेमोक्रेटिक पार्टी ने उनसे संपर्क किया, जबकि 10 में से लगभग 3 ने रिपब्लिकन पार्टी के बारे में भी यही बात कही। ट्रंप और रिपब्लिकन पार्टी से उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार जेडी वेंस ने हाल में एशियाई अमेरिकियों और भोजन के बारे में पुरानी रूढ़ियों को दोहराया है। उन्होंने इन झूठी अफवाहों का जोरशोर से प्रचार किया कि स्प्रिंगफील्ड, ओहायो में हैतियाई प्रवासी पालतू जानवरों को खा रहे हैं, और सर्वेक्षण में पाया गया कि नस्लवाद का मुद्दा इस समूह के लिए व्यापक रूप से महत्वपूर्ण है।

हालांकि, सर्वेक्षण में यह भी जाहिर हुआ कि सभी एएपीआई मतदाता ट्रंप के प्रति नकारात्मक राय नहीं रखते। एएपीआई डेटा के संस्थापक और कार्यकारी निदेशक कार्तिक रामकृष्णन ने कहा, 'एक मुद्दा, जहां रिपब्लिकन पार्टी एएपीआई के समर्थन को कम कर सकती है, वह है अर्थव्यवस्था और अपराध। और मुझे लगता है कि हैरिस ने कुछ प्रस्ताव पेश कर इस संबंध में आलोचनाओं को खारिज करने की कोशिश की है।'

Ayush Sinha
आयुष सिन्हाauthor

मैं टाइम्स नाउ नवभारत (Timesnowhindi.com) से जुड़ा हुआ हूं। कलम और कागज से लगाव तो बचपन से ही था, जो धीरे-धीरे आदत और जरूरत बन गई। मुख्य धारा की पत्रकारिता से जुड़े हुए 10 साल पूरे हो चुके हैं। लोकसभा चुनाव 2014 से पहले ही मैंने पत्रकारिता की पढ़ाई के बीच में ही देश की राजधानी दिल्ली आने की ठान ली थी। उससे पहले मैंने कभी ये सोचा तक नहीं था कि मैं बनारस बोले तो वाराणसी शहर से बाहर भी जा सकता हूं। जी हां, मेरा नाता काशी से है। जन्म के साथ-साथ शिक्षा दीक्षा भी बनारस में ही हुई। राष्ट्रपिता मोहनदास करमचंद गांधी (बापू) द्वारा स्थापित किए गए विश्वविद्यालय- 'महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ' से मैंने पत्रकारिता में स्नातक किया है। ग्रेजुएशन के दौरान ही विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के अध्यापकों ने बड़ी ही सख्ती से मेरी नक्काशी करने की कोशिश की। ग्रेजुएशन के आखिरी वर्ष आते-आते मैंने दिल्ली की ट्रेन पकड़ी और यहां पहुंच गया। आव देखा न ताव, दिल्ली NCR में बड़े-बड़े मीडिया समूहों के दफ्तरों के बाहर अपना बायोडेटा डाल कर प्रयास में जुट गया। काफी धैर्य के बाद ZEE मीडिया समूह से जुड़ने का मौका मिला। मेरे पत्रकारिता के सफर की शुरुआत टेलीविजन के इनपुट डिपार्टमेंट से हुई। यहां मैं असाइनमेंट डेस्क पर था। कुछ महीनों तक खुद को इस समूह के साथ जोड़े रखने के बाद वर्ष 2015 में मैंने प्रिंट मीडिया का रुख कर लिया और ALL RIGHTS नाम की मैगज़ीन के साथ जुड़ गया। बतौर विशेष संवाददाता (Special Correspondent) मेरे कंधों पर बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई थी। मैं उन दिनों देशभर के अलग-अलग लोकसभा क्षेत्र के सांसदों, केंद्रीय मंत्रियों और दिल्ली सरकार के विधायकों और मंत्रियों का साक्षात्कार करता था। मैगज़ीन के संपादकीय पृष्ठ के लिए मैं लेख भी लिखता था। राजनीतिक खबरों से लगाव होने के चलते मैंने इस बीट को ही अपना हमसाया बना लिया। मैगजीन के बाद फिर टेलीविजन का रुख किया और इसी साल दोबारा ज़ी मीडिया से जुड़ गया। यहां साढ़े 3 सालों तक काम करने के बाद मैंने डिजिटल मीडिया में कदम रखने की ठान ली। रिपब्लिक भारत की लॉन्चिंग से पहले मुझे इसकी वेबसाइट से जुड़ने का मौका मिला। रिपब्लिक से जुड़ने के साथ ही मैंने दिल्ली छोड़कर मुंबई का रुख कर लिया। समंदर किनारे बसे इस शहर में मैंने डिजिटल पत्रकारिता के गुर को सीखा। इस संस्थान में मुझे रिपोर्टर के तौर पर मौका दिया था। कुछ ही महीने बाद मैं वापस दिल्ली आ गया और मैंने न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया में एसोसिएट प्रोड्यूसर और रिपोर्टर की भूमिका में काम किया। चंद महीने बाद ही ज़ी मीडिया समूह के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर काम करने का अवसर मिला। ज़ी हिन्दुस्तान के लिए मैंने स्पेशल खबरों पर काम किया और इस समूह का पहला डिजिटल रिपोर्टर बन गया। इसके बाद मुझे वीडियो सेक्शन का हेड बना दिया गया। मैंने चुनावी कवरेज की, ग्राउंड रिपोर्टिंग की और साथ ही साथ वीडियो सेक्शन को नए शिखर पर पहुंचाने की कोशिश की। मैं कविताएं और किस्से-कहानियां भी लिखता रहता हूं। पढ़ाई के दौरान ही मैंने दो किताबें भी लिखी, एक नॉवेल और दूसरी पोएट्री बुक। पत्रकारिता में रहते हुए मैंने कई "स्टिंग ऑपरेशन" भी किए। मेरे सफर को और भी खूबसूरत बनाने के लिए टाइम्स समूह ने मुझे मौका दिया। मैं जुलाई, 2023 में इस संस्थान से जुड़ा और मुझे मेन डेस्क पर खबरों से दो-चार होते रहने की जिम्मेदारी सौंपी गई। राजनीतिक विश्लेषण के साथ विस्तार से खबरों को परोसता हूं और अपने पाठकों को कुछ नया देने का प्रयास करता हूं।

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