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Iran Weapons Technique: ईरान अपनी तैयारी कैसे करेगा...मिसाइल और ड्रोन के उत्पादन को किस तरह से बढ़ाएगा?

अमेरिका का दावा है कि ईरान की 2/3 मिसाइल-ड्रोन उत्पादन सुविधाएं नष्ट हो चुकी हैं और लॉन्च रेट 90% कम हो गया है,पर ईरानी पक्ष और कुछ विश्लेषक कहते हैं कि 50% से ज्यादा मिसाइलें-ड्रोन अभी सुरक्षित हैं।

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Iran अपनी मिसाइल और ड्रोन के उत्पादन को किस तरह से बढ़ाएगा?

Iran Weapons Technique: ईरान की 'प्रतिरोध अर्थव्यवस्था' (Resistance Economy) की रणनीति सैंक्शंस के बावजूद आत्मनिर्भरता, छिपी हुई डक्शन/भंडारण यूनिट्स और सहयोगी देशों (चीन-रूस) के जरिए सप्लाई चेन बनाए रखने पर टिकी है। ईरान का मकसद Attrition Warfare यानि घिसावट की जंग है- सस्ते ड्रोन-मिसाइलों से दुश्मन की महंगी एयर डिफेंस (Patriot,THAAD) को थकाना। एक Shahed गिराने में अमेरिका को लाखों डॉलर खर्च होता है, जबकि बनाने में सिर्फ हजारों।

अप्रैल 2026 में चल रही जंग के बाद अमेरिका ने दावा किया है कि ईरान की 2/3 मिसाइल-ड्रोन उत्पादन सुविधाएं नष्ट हो चुकी हैं और लॉन्च रेट 90% कम हो गया है, लेकिन ईरानी पक्ष और कुछ विश्लेषक कहते हैं कि 50% से ज्यादा मिसाइलें-ड्रोन अभी भी सुरक्षित हैं, खासकर पहाड़ों के नीचे बनी 'मिसाइल सिटीज' में। लंबी जंग के लिए ईरान का फोकस सस्ते, बड़े पैमाने पर ड्रोन (Shahed-136 जैसे) पर है क्योंकि ये मिसाइलों से सस्ते और तेजी से बनाए जा सकते हैं।

ड्रोन की भरपाई जल्दी हो सकती है

मिसाइलों को पूरी तरह बहाल करने में समय लगेगा, लेकिन ड्रोन की भरपाई जल्दी हो सकती है। ईरान ने अपने मिसाइल और ड्रोन कार्यक्रम को किसी एक फैक्ट्री के भरोसे नहीं, बल्कि एक विकेंद्रीकृत और लचीले नेटवर्क के रूप में तैयार किया है। रूस द्वारा अपनाए गए 'अलाबुगा मॉडल' और यूक्रेन युद्ध के अनुभवों से सीख लेते हुए ईरान अपनी उत्पादन क्षमता को बढ़ाने के लिए निम्नलिखित रणनीतियों पर काम कर रहा है।

मिसाइल उत्पादन बढ़ाने का तरीका

'मिसाइल सिटीज' और भूमिगत नेटवर्क- ईरान ने अपनी सुरक्षा के लिए पहाड़ों के सैकड़ों मीटर नीचे 'मिसाइल सिटीज' का निर्माण किया है। कई फैक्टरियां सिविलियन कंपनियों के नाम पर चलती हैं ताकि हमले या सैंक्शंस से बच सकें।

सुरक्षा: ये ठिकाने 500 मीटर तक गहरे हो सकते हैं, जो इन्हें पारंपरिक हवाई हमलों और 'बंकर बस्टर' बमों से बचाते हैं।

उत्पादन लाइन: यहां केवल भंडारण (storage) नहीं होता, बल्कि पूरी असेंबली लाइनें होती हैं। 2026 तक की रिपोर्टों के अनुसार, ये केंद्र अब एआई-कनेक्टेड प्रणालियों से लैस हैं जो ऑटोमेटेड लॉन्च की सुविधा देते हैं।

सॉलिड-फ्यूल मिसाइलों पर फोकस: 2024-25 में ही ईरान ने इनकी उत्पादन गति बढ़ा दी थी। चीन से रॉकेट फ्यूल के केमिकल प्रीकरसर (Chemical Precursor-Sodium Perchlorate आदि) की बड़ी खेपें आ रही थीं।

Drone of Iran

Drone of Iran

महीने में 100+ बैलिस्टिक मिसाइल: ईरान का दावा है कि उसके पास 2 साल (104 हफ्ते) तक लगातार युद्ध लड़ने का स्टॉक और उत्पादन क्षमता है।

ड्रोन उत्पादन बढ़ाने का तरीका (सबसे तेज और आसान)

सस्ते Shahed ड्रोन: कीमत सिर्फ $20,000-$50,000। ये 'पुअर मैन क्रूज मिसाइल' कहलाते हैं। पहले क्षमता 10,000 ड्रोन प्रति महीना थी। सिविलियन प्लांट्स को आसानी से रीटूल किया जा सकता है।

ड्यूल-यूज प्लांट्स: कई ड्रोन सिविलियन फैक्टरियों में बनते हैं। अमेरिकी हमलों के बाद भी ये जल्दी बहाल हो जाते हैं क्योंकि ये महंगे नहीं होते।

दैनिक/साप्ताहिक उत्पादन: जंग के दौरान भी ईरान 400+ Shahed ड्रोन रोज बनाने की क्षमता रखता था। ईरान के शहीद-136 ड्रोनों का वर्तमान भंडार सार्वजनिक नहीं किया गया है। युद्ध शुरू होने से पहले, अनुमानों ने संकेत दिया था कि यह 80,000 ड्रोन तक हो सकता है।

सैंक्शंस एवेजन (Sanctions Evasion):

चीन-रूस के जरिए थर्ड कंट्रीज और शैडो फ्लीट से पार्ट्स आते रहेंगे। रूस अब ईरान को उन्नत ड्रोन टेक्नोलॉजी वापस दे रहा है।

रूस के साथ 'टेक्नोलॉजी एक्सचेंज'

रूस और ईरान के बीच अब एक 'टू-वे स्ट्रीट' (दोतरफा) साझेदारी है

रूस से क्या मिला: ईरान ने रूस को ड्रोन बनाने की तकनीक दी, और बदले में रूस से उन्नत विनिर्माण के तरीके और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध से निपटने के गुर सीखे।

बड़े पैमाने पर उत्पादन: रूस ने अलाबुगा में शाहेद-136 (गेरान-2) का उत्पादन प्रति माह 5,500 यूनिट तक पहुंचा दिया है। ईरान इसी औद्योगिक स्केलिंग तकनीक का उपयोग अपने देश में उत्पादन बढ़ाने के लिए कर रहा है।

'शेल' कंपनियों का वैश्विक जाल

अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के बावजूद ईरान कई देशों से कल-पुर्जे जुटाता है.

अप्रत्यक्ष खरीद: ईरान तुर्की, चीन और अन्य देशों में 'शेल' (मुखौटा) कंपनियों का उपयोग करता है। ये कंपनियाँ नागरिक उपयोग के नाम पर सेंसर, इंजन और जीपीएस डिवाइस खरीदती हैं, जो अंततः ईरान के सैन्य कारखानों में पहुँचते हैं।

सस्ते पुर्जे: शाहेद-136 जैसे ड्रोन में ऐसे इलेक्ट्रॉनिक पुर्जे लगे होते हैं जो अमेज़न या अलीबाबा जैसी साइटों पर आसानी से उपलब्ध हैं, जिससे उत्पादन रोकना लगभग असंभव हो जाता है।

स्थानीयकरण और 'रिवर्स इंजीनियरिंग'

ईरान की सबसे बड़ी ताकत उसकी आत्मनिर्भरता है, ईरान ने दशकों के प्रतिबंधों के कारण लगभग हर मिसाइल और ड्रोन के पुर्जे की 'रिवर्स इंजीनियरिंग' कर ली है। वे अब बाहरी आपूर्ति पर कम और घरेलू उत्पादन (जैसे कि स्थानीय इंजन और कार्बन फाइबर फ्रेम) पर ज्यादा निर्भर हैं।

प्रॉक्सी नेटवर्क और फॉरवर्ड डिप्लॉयमेंट

ईरान केवल अपने देश में उत्पादन नहीं करता, बल्कि उसने यमन (हुती), लेबनान (हिजबुल्लाह) और इराक में भी असेंबली प्लांट स्थापित किए हैं। इससे ईरान पर सीधे हमले होने की स्थिति में भी उसकी 'अटैक क्षमता' बनी रहती है।

ईरान के लिए अलाबुगा मॉडल का महत्व

ईरान की तैयारी का मुख्य आधार 'मात्रा (Quantity) बनाम गुणवत्ता (Quality)' है। ईरान जानता हैं कि एक $2 मिलियन की इंटरसेप्टर मिसाइल को गिराने के लिए $20,000 के 10 ड्रोन भेजना एक किफायती और प्रभावी रणनीति है।उनके उत्पादन में वृद्धि का लक्ष्य केवल सेना को मजबूत करना नहीं, बल्कि विरोधियों को 'आर्थिक और तकनीकी युद्ध' में थका देना है। ईरान इस मॉडल को अपने यहां और भी उन्नत तरीके से लागू कर रहा है। वह अपनी मिसाइलों और ड्रोनों को अलग-अलग छोटे हिस्सों में बांटकर पूरे देश में फैली सैकड़ों छोटी वर्कशॉप में बनवाता है और फिर उन्हें गुप्त ठिकानों पर असेंबल करता है। संक्षेप में अलाबुगा मॉडल युद्ध का वह 'अमेज़न' या 'टेस्ला' तरीका है, जहां तकनीक भले ही साधारण हो, लेकिन उसकी संख्या (Volume) इतनी अधिक होती है कि वह दुश्मन की रक्षा प्रणाली को थका देती है।

Ravi Vaish
रवि वैश्य author

रवि वैश्य टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल के न्यूज डेस्क पर कार्यरत एक सीनियर जर्नलिस्ट हैं, जिन्हें पत्रकारिता में 20 वर्षों का व्यापक अनुभव हासिल है। खबरों... और देखें

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